भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४९२* मत्स्यपुराण *

| जृम्भन्त इव शार्दूलाः प्रवान्त इव वायवः।<br>प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः॥ ९<br>प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महाबलाः।<br>युयुधुर्निश्चला भूत्वा वज्रा इव महाचलैः॥ १० | गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है॥ ९-१०॥ | | कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूवुर्दारुणा रवाः।<br>कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना॥ ११ | जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खींचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। | | आहुश्च युद्धे मा भैषीः क्व यास्यसि मृतो ह्यसि।<br>प्रहराशु स्थितोऽस्म्यत्र एहि दर्शय पौरुषम्॥ १२<br>गृहाण छिन्धि भिन्धीति खाद मारय दारय।<br>इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम्॥ १३ | युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर 'मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार डालो, फाड़ डालो'—ऐसा शब्द बोल रहे थे और पुनः शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। | | खड्गापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः।<br>केचिन्मुद्गरचूर्णांश्च केचिद् बाहुभिराहताः॥ १४<br>पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः।<br>दानवाः शरपुष्पाभाः सवना इव पर्वताः।<br>निपतन्त्यर्णवजले भीमनक्रमितिमिङ्गिले॥ १५ | उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों)-के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये। सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। | | व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गैः पतमानैः सुरेतरैः।<br>सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुदनिःस्वनः॥ १६ | दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। | | तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः।<br>मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम्॥ १७<br>परस्परेण कलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः।<br>भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानां च लोहितम्॥ १८ | उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक, तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। | | सरथान् सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान्।<br>जग्रसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान्॥ १९<br>मृधं यथासुराणां च प्रमथानां प्रवर्तते।<br>अम्बरेऽम्भसि च तथा युद्धं चक्रुर्जलेचराः॥ २० | यूथ-के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ, आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणोंसहित दैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे॥ ११-२०॥ | | यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्या-<br>  स्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनक्राः।<br>यथैव छिन्दन्ति परस्परं तु<br>  तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः॥ २१ | उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको |