मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 501, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 501
| * अध्याय १३८ * | ४९१ |
|---|
| अहमपि रथवर्यमास्थितः<br>सुरवरवर्य भवेय पृष्ठतः ।<br>असुरवरवधार्थमुद्यतानां<br>प्रतिविदधामि सुखाय तेऽनघ ॥ ३५<br>इति भववचनप्रचोदितो<br>दशशतनयनवपुः समुद्यतः ।<br>त्रिपुरपुरजिघांसया हरिः<br>प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥ ३६ | सुरश्रेष्ठ ! उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ ! मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे उद्यत होकर आगे बढ़े ॥ २४—३६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥
एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय
देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध
| सूत उवाच<br>मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमनेश्वरः ।<br>लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥ १<br>ईश्वरेणोर्जिताः सर्व उत्पेतुरश्चाम्बरे तदा ।<br>खगतास्तु विरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ २<br>प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः ।<br>शङ्खाडम्बरनिर्घोषैः पणवान् पटहानपि ।<br>नादयन्तः पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥ ३<br>हरः प्राप्त इतीवोक्त्वा बलिनस्ते महासुराः ।<br>आजग्मुः परं क्षोभमत्येयेष्विव सागराः ॥ ४<br>सुरतूर्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शनाः ।<br>निनेदुर्वादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकशः ॥ ५<br>भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः ।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥ ६<br>आक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषां देहनिकृन्तनम् ।<br>प्रवृत्तं युद्धमतुलं प्रहारकृतनिःस्वनम् ॥ ७<br>निष्यतन्त इवादित्याः प्रज्वलन्त इवाग्नयः ।<br>शंसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इव पक्षिणः ।<br>गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः ॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। आकाशमें पहुँचकर वे पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्ख और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये'—ऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव देवताओंकी तुरहियोंका शब्द सुनकर नाना प्रकारके बाजे बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ-साथ अनुपम युद्ध छिड़ गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नयाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल |