मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १४१ * ५०९
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! मैं इलापुत्र पुरूरवाका |
|---|---|
| तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभावं विस्तरेण तु।<br>ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता॥ ३ | प्रभाव, स्वर्गलोकमें उसका बुद्धिमान् चन्द्रमाके साथ संयोग, उन चन्द्रमासे अमृतकी उपलब्धि तथा पितृतर्पणकी बात विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। सौम्य, बर्हिषद्, काव्य |
| सोमाच्चैवामृतप्राप्तिः पितॄणां तर्पणं तथा।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ ४ | तथा अग्निष्वात्तसंज्ञक पितरों तथा नक्षत्रोंपर विचरण करते हुए सूर्य और चन्द्रमा जिस समय अमावास्या |
| यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागतौ।<br>अमावास्यां निवसतः एकस्मिन्नथ मण्डले॥ ५ | तिथिको एक मण्डल अर्थात् एक राशिपर स्थित होते हैं, उस समय वह प्रत्येक अमावास्याको सूर्य और चन्द्रमाका |
| तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाकरौ।<br>अमावास्याममावास्यां मातामहपितामहौ॥ ६ | दर्शन करनेके लिये स्वर्गमें जाता है और वहाँ मातामह (नाना) और पितामह (बाबा)—दोनोंको अभिवादन कर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ कुछ दिनतक ठहरा |
| अभिवाद्य तु तौ तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति।<br>प्रचस्कन्द ततः सोममर्चयित्वा परिश्रमत्॥ ७ | रहता है। चन्द्रमासे अमृतके क्षरण होनेपर उससे परिश्रमपूर्वक पितरोंकी पूजा करके लौटता है। किसी महीनेमें श्राद्ध |
| ऐलः पुरूरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया।<br>ततः स दिवि सोमं वै ह्युपतस्थे पितॄनपि॥ ८ | करनेकी इच्छासे इलानन्दन विद्वान् पुरूरवा स्वर्गलोकमें चन्द्रमा और पितरोंके निकट गया और दो लवमात्र कुहू |
| द्विलवं कुहुमात्रं च तावुभौ तु निधाय सः।<br>सिनीवालीप्रमाणाल्यकुहूमात्रव्रतोदये ॥ ९ | अमावास्यामें उसने दोनोंको स्थापित किया; क्योंकि पितृ-व्रतमें जब सिनीवालीका प्रमाण थोड़ा तथा कुहू (अमावास्या) प्रशस्त मानी गयी है। अतः कुहूका समय प्राप्त हुआ |
| कुहूमात्रं पितॄद्देशं ज्ञात्वा कुहूमुपासते।<br>तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते॥ १० | जानकर वह पितरोंके उद्देश्यसे कुहूकी उपासना करता है। उसकी उपासना करनेके पश्चात् वह कालकी प्रतीक्षा |
| स्वधामृतं तु सोमाद् वै वसंस्तेषां च तृप्तये।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधामृतपरिस्त्रवैः।<br>कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ ११ | करता हुआ चन्द्रमाकी भी प्रतीक्षा करता है। वहाँ रहते हुए उसे पितरोंकी तृप्तिके लिये चन्द्रमासे स्वधारूप अमृत प्राप्त होता है। चन्द्रमाकी पंद्रह किरणोंसे स्वधामृतका क्षरण होता है। कृष्णपक्षमें श्राद्धभोजी पितरोंका उन श्रेष्ठ |
| सद्योऽभिक्षरता तेन सौम्येन मधुना च सः।<br>निवापेष्वथ दत्तेषु पित्र्येण विधिना तु वै॥ १२ | किरणोंसे बड़ा प्रेम रहता है तथा अन्य पितर उनसे द्वेष करते हैं। पुरूरवा तुरंत अभिक्षरित हुए उस उत्तम मधुको पितृ-श्राद्धकी विधिके अनुसार श्राद्धके समय पितरोंको |
| स्वधामृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन्।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ १३ | प्रदान करता है। इस प्रकार वह उत्तम स्वधामृतसे सौम्य, बर्हिषद्, काव्य तथा अग्निष्वात्त पितरोंको तृप्त करता |
| ऋतुरग्निः स्मृतो विप्रैर्ऋतुं संवत्सरं विदुः।<br>जज्ञिरे ऋतवस्तस्मादृर्तुभ्यो ह्यार्तवाऽभवन्॥ १४ | रहता है। महर्षियोंने ऋतुको अग्नि बतलाया है और ऋतुको संवत्सर भी कहते हैं। उस संवत्सरसे ऋतुकी उत्पत्ति होती है और ऋतुओंसे उत्पन्न हुए पितर आर्तव |
| पितरोऽर्तवोऽर्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः।<br>पितामहास्तु ऋतवो ह्यमावास्याब्दसूनवः।<br>प्रपितामहाः स्मृता देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः सुताः॥ १५ | कहलाते हैं। आर्तव और अर्धमास पितरोंको ऋतुका पुत्र तथा ऋतुस्वरूप पितामह और अमावास्याको संवत्सरका पुत्र जानना चाहिये। प्रपितामह और पञ्च संवत्सररूप देवगण ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं॥३—१५॥ |