मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५१० * मत्स्यपुराण *
| सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्ता इति त्रिधा।<br>गृहस्था ये तु यज्वानो हविर्यज्ञार्तवाश्च ये।<br>स्मृता बर्हिषदस्ते वै पुराणे निश्चयं गताः॥ १६<br>गृहमेधिनश्च यज्वानो अग्निष्वात्तार्तवाः स्मृताः।<br>अष्टकापतयः काव्याः पञ्चाब्दांस्तु निबोधत॥ १७<br>तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः।<br>सोमस्त्विड्वत्सरश्चैव वायुश्चैवानुवत्सरः॥ १८<br>रुद्रस्तु वत्सरस्तेषां पञ्चाब्दा ये युगात्मकाः।<br>कालेनाधिष्ठितस्तेषु चन्द्रमाः स्रवते सुधाम्॥ १९<br>एते स्मृता देवकृत्याः सोमपाश्चोष्मपाश्च ये।<br>तांस्तेन तर्पयामास यावदासीत् पुरूरवाः॥ २०<br>यस्मात्प्रसूयते सोमो मासि मासि विशेषतः।<br>ततः स्वधामृतं तद्वै पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत् तदमृतं सोममवाप मधु चैव हि॥ २१<br>ततः पीतसुधं सोमं सूर्योऽसावेकरश्मिना।<br>आप्यायते सुषुम्णेन सोमं तु सोमपायिनम्॥ २२<br>निःशेषं वै कलाः पूर्वा युगपद्ध्यापयन्पुरा।<br>सुषुम्णाऽऽप्यायमानस्य भागं भागमहःक्रमात्॥ २३<br>कलाः क्षीयन्ति कृष्णास्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ २४<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः।<br>एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेऽप्यहःक्रमात्।<br>देवैः पीतसुधं सोमं पुरा पश्चात्पिबेद् रविः॥ २५<br>पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः।<br>आप्यायत्सुषुम्णेन भागं भागमहःक्रमात्॥ २६<br>सुषुम्णाप्यायमानस्य शुक्ला वर्धयन्ति वै कलाः।<br>तस्माद्घ्रसन्ति वै कृष्णाः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च॥ २७<br>एवमाप्यायते सोमः क्षीयते च पुनः पुनः।<br>समृद्धिरेवं सोमस्य पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ २८<br>इत्येष पितृमान् सोमः स्मृतस्तद्वत्सुधात्मकः।<br>कान्तः पञ्चदशैः सार्धं सुधामृतपरिस्त्रवैः॥ २९ | सौम्य, बर्हिषद्, काव्य और अग्निष्वात्त—पितरोंके ये तीन भेद हैं। इनमें जो गृहस्थ, यज्ञकर्ता और हवन करनेवाले हैं, वे आर्तव पितर पुराणमें बर्हिषद् नामसे निश्चित किये गये हैं। गृहस्थाश्रमी और यज्ञकर्ता आर्तव पितर अग्निष्वात्त कहलाते हैं। अष्टकापति आर्तव पितरोंको काव्य कहा जाता है। अब पञ्चाब्दोंको सुनिये। इनमें, अग्नि संवत्सर, सूर्य परिवत्सर, सोम इड्वत्सर, वायु अनुवत्सर और रुद्र वत्सर हैं। ये पञ्चाब्द युगात्मक होते हैं। समयानुसार इनपर स्थित हुए चन्द्रमा अमृतका क्षरण करते हैं। ये देवकर्म कहे जाते हैं। जबतक पुरूरवा वहाँ रहता था तबतक वह जो सोमप और ऊष्मप पितर हैं, उनको भी उसी अमृतसे तृप्त करता था। चूँकि चन्द्रमा प्रत्येक मासमें विशेषरूपसे अमृतका क्षरण करते हैं और वह सोमपायी पितरोंको स्वधामृतरूपसे प्राप्त होता है। इसीलिये वह अमृतस्वरूप मधु सोमको प्राप्त होता है। इस प्रकार पितरोंद्वारा चन्द्रमाका अमृत पी लिये जानेपर सूर्यदेव अपनी एकमात्र सुषुम्णा नामकी किरणद्वारा उन सोमपायी चन्द्रमाको पुनः परिपूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार सूर्य सुषुम्णाद्वारा पूर्ण किये जाते हुए चन्द्रमाकी पहलेकी सम्पूर्ण कलाओंको दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा करके पूर्ण करते हैं। चन्द्रमाकी कलाएँ कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं और शुक्लपक्षमें वे पुनः पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे चन्द्रमाका शरीर पूर्ण होता रहता है। इसी कारण शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे परिपूर्ण किये गये चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल पूर्णिमा तिथिको श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। पहले देवगण चन्द्रमासे स्रवित हुए अमृतको पीते हैं, उसके बाद सूर्य भी सोमका पान करते हैं। सूर्य अपनी एक किरणसे पंद्रह दिनोंतक सोमको पीते हैं और पुनः दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा कर सुषुम्णा किरणद्वारा उसे पूर्ण कर देते हैं। इसी कारण शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्षमें वे क्षीण होती हैं, यही इनका क्रम है। इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह दिनोंतक बढ़ते हैं और पुनः पंद्रह दिनतक क्षीण होते रहते हैं। चन्द्रमाकी इस प्रकारकी समृद्धि और ह्रास शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्षके आश्रयसे होते हैं। इस प्रकार सुधामृतस्रावी पंद्रह किरणोंसे सुशोभित ये चन्द्रमा सुधात्मक एवं पितृमान् कहे जाते हैं॥ १६—२९॥ |