भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 521
* अध्याय १४१ *५११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अतः परं प्रवक्ष्यामि पर्वाणां संधयश्च याः।<br>यथा ग्रथ्नन्ति पर्वाणि आवृत्तादिक्षुवेणुवत्॥ ३०<br>तथाब्दमासाः पक्षाश्च शुक्लाः कृष्णास्तु वै स्मृताः।<br>पौर्णमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थयः संधयस्तथा॥ ३१<br>अर्धमासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च।<br>अग्न्याधानक्रिया यस्तान्नीयन्ते पर्वसंधिषु॥ ३२<br>तस्मात्तु पर्वणो ह्यादौ प्रतिपद्यादिसंधिषु।<br>सायाह्ने अनुमत्याश्च द्वौ लवौ काल उच्यते।<br>लवौ द्वावेव राकायाः कालो ज्ञेयोऽपराह्निकः॥ ३३<br>प्रकृतिः कृष्णपक्षस्य कालेऽतीतेऽपराह्रिके।<br>सायाह्ने प्रतिपद्येष स कालः पौर्णमासिकः॥ ३४<br>व्यतीपाते स्थिते सूर्ये लेखादूर्ध्वं युगान्तरम्।<br>युगान्तरोदिते चैव चन्द्रे लेखोपरि स्थिते॥ ३५<br>पूर्णमासव्यतीपातो यदा पश्येत्परस्परम्।<br>तौ तु वै प्रतिपद्यावत्तस्मिन्काले व्यवस्थितौ॥ ३६<br>तत्कालं सूर्यमुद्दिश्य दृष्ट्वा संख्यातुमर्हसि।<br>स चैव सत्क्रियाकालः षष्ठः कालोऽभिधीयते॥ ३७<br>पूर्णेन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसंधिषु पूर्णिमा।<br>तस्मादाप्यायते नक्तं पौर्णमास्यां निशाकरः॥ ३८<br>यदान्योन्यवतो पाते पूर्णिमा प्रेक्षते दिवा।<br>चन्द्रादित्यौऽपराह्ने तु पूर्णत्वात्पूर्णिमा स्मृता॥ ३९<br>यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।<br>तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता॥ ४०<br>अत्यर्थं राजते यस्मात्पौर्णमास्यां निशाकरः।<br>रञ्जनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः॥ ४१<br>अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरौ।<br>एका पञ्चदशी रात्रिरमावास्या ततः स्मृता॥ ४२इसके बाद अब मैं पर्वोंकी जो संधियाँ हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ। जैसे गन्ने और बाँसमें गोलाकार गाँठें बनी रहती हैं वैसे ही वर्ष, मास, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, अमावास्या और पूर्णिमाके भेद—ये सभी पर्वकी ग्रन्थियाँ और संधियाँ हैं। (प्रत्येक पक्षमें) प्रतिपद्-द्वितीया आदि पंद्रह तिथियाँ होती हैं। चूँकि अग्न्याधान आदि क्रियाएँ पर्वसंधियोंमें सम्पन्न की जाती हैं, अतः उन्हें (अमा, पूर्णिमा) पर्वकी तथा प्रतिपदाकी संधियोंमें करना चाहिये। चतुर्दशी और पूर्णिमा आदिके दो लवको पर्वकाल कहा जाता है तथा राकाके दूसरे दिनमें आनेवाले दो लवको पर्वकाल जानना चाहिये। कृष्णपक्षके अपराह्निक कालके व्यतीत हो जानेपर सायंकालमें प्रतिपदाके योगमें जो काल आता है उसे पौर्णमासिक कहते हैं। सूर्यके लेखा (विषुव)-के ऊपर व्यतीपातमें स्थित होनेपर युगान्तर कहलाता है। उस समय चन्द्रमा लेखाके ऊपर स्थित युगान्तरमें उदित होते हैं। इस प्रकार जब चन्द्रमा और व्यतीपात परस्पर एक-दूसरेको देखें और प्रतिपदा तिथितक उसी अवस्थामें स्थित रहें तो उस समय सूर्यके उद्देश्यसे उस समयको देखकर गणना करनी चाहिये। उसे सत्क्रियाकाल नामक छठा काल कहते हैं। शुक्लपक्षके पूर्ण होनेपर रात्रिकी संधिमें जब पूर्णचन्द्र उदय होते हैं, तब उसे पूर्णिमा कहते हैं। इसीलिये चन्द्रमा पूर्णिमाकी रातमें अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमा तिथिकी ह्रास-वृद्धि होती रहती है, अतः यदि वृद्धिके समय दूसरे दिन सूर्य और चन्द्र दिनमें पूर्णिमामें दीखते हैं तो वह तिथि पूर्ण होनेके कारण पूर्णिमा कहलाती है। यदि दूसरे दिन प्रतिपदाका योग होनेमें चन्द्रमाकी एक कला हीन हो गयी तो उस पूर्णिमाको अनुमति कहते हैं। यह अनुमति देवताओंसहित पितरोंको परम प्रिय है। चूँकि पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा अत्यन्त सुशोभित होते हैं, इसलिये चन्द्रमाको प्रिय होनेके कारण उस पूर्णिमाको विद्वानोंने राका नामसे अभिहित किया है। कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं रात्रिको जब सूर्य और चन्द्र एक साथ एक नक्षत्रपर स्थित होते हैं, तब उसे अमावास्या कहा जाता है॥ ३०-४२॥
उद्दिश्य ताममावास्यां यदा दर्श समागतौ।<br>अन्योन्यं चन्द्रसूर्यौ तु दर्शनाद् दर्श उच्यते॥ ४३उस अमावास्याको लक्ष्य कर जब सूर्य और चन्द्रमा दर्शपर आ जाते हैं और परस्पर एक-दूसरेको देखते हैं, तब उसे दर्श कहते हैं।