मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| तेषां लोकान्तरस्थानां बान्धवैर्नामगोत्रतः।<br>भूमावसव्यं दर्भेषु दत्ताः पिण्डास्त्रयस्तु वै।<br>प्राप्तांस्तु तर्पयन्त्येव प्रेतस्थानेष्वधिष्ठितान्॥ ७२<br>अप्राप्ता यातनास्थानं प्रभ्रष्टा ये च पञ्चधा।<br>पश्चाद्ये स्थावरान्ते वै भूतानीके स्वकर्मभिः॥ ७३<br>नानारूपासु जातीनां तिर्यग्योनिषु मूर्तिषु।<br>यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्विह योनिषु॥ ७४<br>तस्मिंस्तस्मिंस्तदाहारे श्राद्धे दत्तं तु प्रीणयेत्।<br>काले न्यायागतं पात्रे विधिना प्रतिपादितम्।<br>प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र यत्रावतिष्ठति॥ ७५<br>यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो बिन्दति मातरम्।<br>तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्रः प्रापयते तु तम्॥ ७६<br>एवं ह्यविकलं श्राद्धं श्रद्धादत्तं मनुर्ब्रवीत्।<br>सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुषा॥ ७७<br>गतागतज्ञः प्रेतानां प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ७८<br>इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितरश्च वै।<br>अन्योन्यपितरो ह्येते देवाश्च पितरो दिवि॥ ७९<br>एते तु पितरो देवा मनुष्याः पितरश्च ये।<br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः॥ ८०<br>इत्येष विषयः प्रोक्तः पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत्पितृमहत्त्वं हि पुराणे निश्चयं गतम्॥ ८१<br>इत्येष सोमसूर्याभ्यामैलस्य च समागमः।<br>अवाप्तिं श्रद्धया चैव पितॄणां चैव तर्पणम्॥ ८२<br>पर्वणां चैव यः कालो यातनास्थानमेव च।<br>समासात्कीर्तितस्तुभ्यं सर्ग एष सनातनः॥ ८३<br>वैरूप्यं येन तत्सर्वं कथितं त्वेकदेशिकम्।<br>अशक्यं परिसंख्यातुं श्रद्धेयं भूतिमिच्छता॥ ८४<br>स्वायम्भुवस्य देवस्य एष सर्गो मयेरितः।<br>विस्तरेणानुपूर्वाच्च भूयः किं कथयामि वः॥ ८५ | उन लोकान्तरमें स्थित जीवोंके लिये उनके भाई-बन्धुओंद्वारा यहाँ भूतलपर जब उनका नाम-गोत्र उच्चारण कर अपसव्य होकर कुशोंपर तीन पिण्ड प्रदान किये जाते हैं तब प्रेतस्थानोंमें स्थित होनेपर भी वे पिण्ड उन्हें प्राप्त होकर तृप्त करते हैं॥ ५८—७२॥<br><br>जो नरकोंमें न जाकर पाँच प्रकारसे विभक्त होकर भ्रष्ट हो चुके हैं अर्थात् जो मृत्युके उपरान्त अपने कर्मोंके अनुसार स्थावर, भूत-प्रेत, अनेकों प्रकारकी जातियों, तिर्यग्योनियों एवं अन्य जन्तुओंमें जन्म ले चुके हैं, वहाँ उन-उन योनियोंमें वे जैसे आहारवाले होते हैं, उन्हीं-उन्हीं योनियोंमें उसी आहारके रूपमें परिणत होकर श्राद्धमें दिया गया पिण्ड उन्हें तृप्त करता है। यदि श्राद्धोपयुक्त कालमें न्यायोपार्जित अन्न (मृतकोंके निमित्त) विधिपूर्वक सत्पात्रको दान किया जाता है तो वह अन्न वे मृतक जहाँ-कहीं भी रहते हैं, उन्हें प्राप्त होता है। जैसे बछड़ा गौओंमें विलीन हुई अपनी माँको ढूँढ़ निकालता है उसी प्रकार श्राद्धोंमें प्रयुक्त हुआ मन्त्र (दानकी वस्तुओंको) उस जीवके पास पहुँचा देता है। इस प्रकार विधानपूर्वक श्रद्धासहित दिया गया श्राद्ध-दान उस जीवको प्राप्त होता है—ऐसा मनुने कहा है। साथ ही महर्षि सनत्कुमारने भी, जो प्रेतोंके गमनागमनके ज्ञाता हैं, दिव्य चक्षुसे देखकर श्राद्धकी प्राप्तिके विषयमें ऐसा ही बतलाया है। कृष्णपक्ष उन पितरोंका दिन है तथा शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये उनकी रात्रि है। इस प्रकार ये पितृदेव और देवपितर स्वर्गलोकमें परस्पर एक-दूसरेके देवता और पितर हैं। यह तो स्वर्गीय देवों और पितरोंकी बात हुई। मनुष्योंके पितर पिता, पितामह और प्रपितामह हैं। इस प्रकार मैंने सोमपायी पितरोंके विषयमें वर्णन कर दिया। पितरोंका यह महत्त्व पुराणोंमें निश्चित किया गया है। इस प्रकार मैंने इला-नन्दन पुरूरवाका चन्द्रमा और सूर्यके साथ समागम, पितरोंको श्रद्धापूर्वक दी गयी वस्तुकी प्राप्ति, पितरोंका तर्पण, पर्व-काल और यातनास्थान (नरक)-का संक्षिप्त वर्णन आपको सुना दिया, यही सनातन सर्ग है। इसका विस्तार बहुत बड़ा है। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है; क्योंकि पूर्णरूपसे वर्णन करना तो असम्भव है। इसलिये कल्याणकामीको इसपर श्रद्धा रखनी चाहिये। मैंने स्वायम्भुव मनुके इस सर्गका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर दिया। अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ ?॥ ७३—८५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तने श्राद्धानुकीर्तनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकीर्तनके प्रसङ्गमें श्राद्धानुकीर्तन नामक एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४१॥