मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १४२ * | ५१५ |
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एक सौ बयालीसवाँ अध्याय
युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>चतुर्युगाणि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एषां निसर्गं संख्यां च श्रोतुमिच्छामो विस्तरात्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें जिन चारों युगोंका प्रवर्तन हुआ है, उनकी सृष्टि और संख्याके विषयमें हमलोग विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>पृथिवीद्युप्रसङ्गेन मया तु प्रागुदाहृतम्।<br>एतच्चतुर्युगं त्वेवं तद् वक्ष्यामि निबोधत।<br>तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्नशः॥ २<br>लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम्।<br>तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्युगम्॥ ३<br>काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव<br>त्रिंशच्च काष्ठां गणयेत् कलां तु।<br>त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन्मुहूर्त-<br>स्तंस्त्रिशता रात्र्यहनी समेते॥ ४<br>अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके।<br>रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः॥ ५<br>पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ६<br>त्रिंशद् ये मानुषा मासाः पैत्रो मासः स उच्यते।<br>शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु।<br>पैत्रः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते॥ ७<br>मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।<br>पितॄणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै।<br>दश च द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः॥ ८<br>लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः।<br>एतद्दिव्यमहोरात्रमित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पृथ्वी और आकाशके प्रसङ्गसे मैंने पहले ही इन चारों युगोंका वर्णन कर दिया है, फिर भी (यदि आपलोगोंकी उनको सुननेकी अभिलाषा है तो) संख्यापूर्वक उनके प्रमाणको विस्तारके साथ समूचे रूपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। लौकिक प्रमाणके द्वारा मानवीय वर्षका आश्रय लेकर उसीके अनुसार गणना करके चारों युगोंका प्रमाण बतला रहा हूँ। पंद्रह निमेष (आँखके खोलने और मूँदनेका समय)-की एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला मानी जाती है। तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तके रात-दिन दोनों होते हैं। सूर्य मानवीय लोकमें दिन-रातका विभाजन करते हैं। उनमें रात्रि जीवोंके शयन करनेके लिये और दिन कर्ममें प्रवृत्त होनेके लिये है। पितरोंके रात-दिनका एक लौकिक मास होता है। उनमें रात-दिनका विभाग है। पितरोंके लिये कृष्णपक्ष दिन है और शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये रात्रि है। मनुष्योंके तीस मासका पितरोंका एक मास कहा जाता है। इस प्रकार तीन सौ साठ मानव-मासोंका एक पितृवर्ष होता है। यह गणना मानवीय गणनाके अनुसार की जाती है। मानवीय गणनाके अनुसार एक सौ वर्ष पितरोंके तीन वर्षके बराबर माने गये हैं। इस प्रकार पितरोंके बारहौं महीनोंकी संख्या बतलायी जा चुकी है। लौकिक प्रमाणके अनुसार जिसे एक मानव-वर्ष कहते हैं, वही देवताओंका एक दिन-रात होता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ २—९॥ |
| दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>अहस्तु यदुदक्चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम्।<br>एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः॥ १० | मानवीय वर्षके अनुसार जो देवताओंके रात-दिन होते हैं, उनमें भी पुनः विभाग हैं। उनमें उत्तरायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको रात्रि कहा जाता है। इस प्रकार दिव्य रात-दिनकी गणना बतलायी जा चुकी। |