मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५२० * मत्स्यपुराण *
| ऐश्वर्येणाणिमाद्येन प्रभुशक्तिबलान्विताः।<br>श्रुतेन तपसा चैव ऋषींस्तेऽभिभवन्ति हि॥ ६९<br>बलेनाभिभवन्त्येते देवदानवमानवान्।<br>लक्षणैश्चैव जायन्ते शरीरस्थैर्मानुषैः॥ ७०<br>केशाः स्थिता ललाटोर्णा जिह्वा चास्य प्रमार्जनी।<br>ताम्रप्रभाश्चतुर्दंष्ट्राः सुवंशाश्चोर्ध्वरेतसः॥ ७१<br>आजानुबाहवश्चैव जालहस्ता वृषाङ्किताः।<br>परिणाहप्रमाणाभ्यां सिंहस्कन्धाश्च मेधिनः॥ ७२<br>पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपद्मे च हस्तयोः।<br>पञ्चाशीतिसहस्राणि जीवन्ति ह्यजरामयाः॥ ७३<br>असङ्गा गतयस्तेषां चतस्रश्चक्रवर्तिनाम्।<br>अन्तरिक्षे समुद्रेषु पाताले पर्वतेषु च॥ ७४<br>इज्या दानं तपः सत्यं त्रेताधर्मास्तु वै स्मृताः।<br>तदा प्रवर्तते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः।<br>मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्तते॥ ७५<br>हृष्टपुष्टा जनाः सर्वे अरोगाः पूर्णमानसाः।<br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायां तु विधिः स्मृतः।<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि जीवन्ते तत्र ताः प्रजाः॥ ७६<br>पुत्रपौत्रसमीकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ताः।<br>एष त्रेतायुगे भावस्त्रेतासंध्यां निबोधत॥ ७७<br>त्रेतायुगस्वभावेन संध्यापादेन वर्तते।<br>संध्यापादः स्वभावाच्च योंऽशः पादेन तिष्ठति॥ ७८। | प्रभुशक्ति और बलसे सम्पन्न वे नृपतिगण ऐश्वर्य, अणिमा आदि सिद्धि, शास्त्रज्ञान और तपस्यामें ऋषियोंसे भी बढ़-चढ़कर होते हैं। इसलिये वे सम्पूर्ण देव-दानवों और मानवोंको बलपूर्वक पराजित कर देते हैं। उनके शरीरमें स्थित सभी लक्षण दिये होते हैं। उनके सिरके बाल ललाटतक फैले रहते हैं। उनकी जीभ बड़ी स्वच्छ और स्निग्ध होती है। उनकी अङ्गकान्ति लाल होती है। उनके चार दाढ़ें होते हैं। वे उत्तम वंशमें उत्पन्न, ऊर्ध्वरेता, आजानुबाहु, जालहस्त हाथोंमें जालचिह्न तथा बैल आदि श्रेष्ठ चिह्नयुक्त परिणाहमात्र लम्बे होते हैं। उनके कंधे सिंहके समान मांसल और वे यज्ञपरायण होते हैं। उनके पैरोंमें चक्र और मत्स्यके तथा हाथोंमें शङ्ख और पद्मके चिह्न होते हैं। वे बुढ़ापा और व्याधिसे रहित होकर पचासी हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। वे चक्रवर्ती सम्राट् अन्तरिक्ष, समुद्र, पाताल और पर्वत—इन चारों स्थानोंमें एकाकी एवं स्वच्छन्दरूपसे विचरण करते हैं। यज्ञ, दान, तप और सत्यभाषण—ये त्रेतायुगके प्रधान धर्म कहे गये हैं। ये धर्म वर्ण एवं आश्रमके विभागपूर्वक प्रवृत्त होते हैं। इनमें मर्यादाकी स्थापनाके निमित्त दण्डनीतिका प्रयोग किया जाता है। त्रेतायुगमें एक वेद चार भागोंमें विभक्त होकर विधान करता है। उस समय सभी लोग हृष्ट-पुष्ट, नीरोग और सफल-मनोरथ होते हैं। वे प्रजाएँ तीन हजार वर्षोंतक जीवित रहती हैं और पुत्र-पौत्रसे युक्त होकर क्रमशः मृत्युको प्राप्त होती हैं। यही त्रेतायुगका स्वभाव है। अब उसकी संध्याके विषयमें सुनिये। इसकी संध्यामें युग-स्वभावका एक चरण रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशमें संध्याका चतुर्थांश शेष रहता है अर्थात् उत्तरोत्तर परिवर्तन होता जाता है॥ ६६-७८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पो नाम द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकल्प नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४२ ॥
एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिक वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं त्रेतायुगमुखे यज्ञस्यासीत् प्रवर्तनम्।<br>पूर्वे स्वायम्भुवे सर्गे यथावत् प्रब्रवीहि नः॥ १॥ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुवमनुके कार्य-<br><br>कालमें त्रेतायुगके प्रारम्भमें किस प्रकार यज्ञकी प्रवृत्ति |