भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 531
* अध्याय १४३ *५२१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अन्तर्हितायां संध्यायां सार्धं कृतयुगेन हि।<br>कालाख्यायां प्रवृत्तायां प्राप्ते त्रेतायुगे तदा॥ २<br><br>ओषधीषु च जातासु प्रवृत्ते वृष्टिसर्जने।<br>प्रतिष्ठितायां वार्तायां ग्रामेषु च पुरेषु च॥ ३<br><br>वर्णाश्रमप्रतिष्ठानं कृत्वन्तश्च वैः पुनः।<br>संहितास्तु सुसंहत्य कथं यज्ञः प्रवर्तितः।<br>एतच्छ्रुत्वाब्रवीत् सूतः श्रूयतां तत्प्रचोदितम्॥ ४<br><br>सूत उवाच<br><br>मन्त्रान् वै योजयित्वा तु इहामुत्र च कर्मसु।<br>तथा विश्वभुगिन्द्रस्तु यज्ञं प्रावर्तयत् प्रभुः॥ ५<br><br>दैवतैः सह संहृत्य सर्वसाधनसंवृतः।<br>तस्याश्वमेधे वितते समाजग्मुर्महर्षयः॥ ६<br><br>यज्ञकर्मण्यवर्तन्त कर्मण्यग्रे तथर्त्विजः।<br>हूयमाने देवहोत्रे अग्नौ बहुविधं हविः॥ ७<br><br>सम्प्रीतितेषु देवेषु सामगेषु च सुस्वरम्।<br>परिक्रान्तेषु लघुषु अध्वर्युपुरुषेषु च॥ ८<br><br>आलब्धेषु च मध्ये तु तथा पशुगणेषु वै।<br>आहूतेषु च देवेषु यज्ञभुक्षु ततस्तदा॥ ९<br><br>य इन्द्रियात्मका देवा यज्ञभागभुजस्तु ते।<br>तान् यजन्ति तदा देवाः कल्पादिषु भवन्ति ये॥ १०<br><br>अध्वर्यवः प्रैषकाले व्युत्थिता ऋषयस्तथा।<br>महर्षयश्च तान् दृष्ट्वा दीनान् पशुगणांस्तदा।<br>विश्वभुजं ते त्वपृच्छन् कथं यज्ञविधिस्तव॥ ११<br><br>अधर्मो बलवानेष हिंसा धर्मेप्सया तव।<br>नव पशुविधिस्त्विष्टस्तव यज्ञे सुरोत्तम॥ १२<br><br>अधर्मो धर्मघाताय प्रारब्धः पशुभिस्त्वया।<br>नायं धर्मो ह्यधर्मोऽयं न हिंसा धर्म उच्यते।<br>आगमेन भवान् धर्मं प्रकरोतु यदीच्छति॥ १३<br><br>विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मेणाव्यसनेन तु।<br>यज्ञबीजैः सुरश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिमोषितैः॥ १४हुई थी? जब कृतयुगके साथ उसकी संध्या (तथा संध्यांश) दोनों अन्तर्हित हो गये, तब कालक्रमानुसार त्रेतायुगकी संधि प्राप्त हुई। उस समय वृष्टि होनेपर ओषधियाँ उत्पन्न हुईं तथा ग्रामों एवं नगरोंमें वार्ता-वृत्तिकी स्थापना हो गयी। उसके बाद वर्णाश्रमकी स्थापना करके परम्परागत आये हुए मन्त्रोंद्वारा पुनः संहिताओंको एकत्रकर यज्ञकी प्रथा किस प्रकार प्रचलित हुई? हमलोगोंके प्रति इसका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये। यह सुनकर सूतजीने कहा—'आपलोगोंके प्रश्नानुसार कह रहा हूँ, सुनिये'॥ १-४॥<br><br>सूतजी कहते हैं— ऋषियो! विश्वभोक्ता सामर्थ्यशाली इन्द्रने ऐहलौकिक तथा पारलौकिक कर्मोंमें मन्त्रोंको प्रयुक्तकर देवताओंके साथ सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न हो यज्ञ प्रारम्भ किया। उनके उस अश्वमेध-यज्ञके आरम्भ होनेपर उसमें महर्षिगण उपस्थित हुए। उस यज्ञकर्ममें ऋत्विग्वगण यज्ञक्रियाको आगे बढ़ा रहे थे। उस समय सर्वप्रथम अग्निमें अनेकों प्रकारके हवनीय पदार्थ डाले जा रहे थे, सामगान करनेवाले देवगण विश्वासपूर्वक ऊँचे स्वरसे सामगान कर रहे थे, अध्वर्युगण धीमे स्वरसे मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे। पशुओंका समूह मण्डपके मध्यभागमें लाया जा रहा था, यज्ञभोक्ता देवोंका आवाहन हो चुका था। जो इन्द्रियात्मक देवता तथा जो यज्ञभागके भोक्ता थे और जो प्रत्येक कल्पके आदिमें उत्पन्न होनेवाले आजानदेव थे, देवगण उनका यजन कर रहे थे। इसी बीच जब यजुर्वेदके अध्येता एवं हवनकर्ता ऋषिगण पशु-बलिका उपक्रम करने लगे, तब यूथ-के-यूथ ऋषि तथा महर्षि उन दीन पशुओंको देखकर उठ खड़े हुए और वे विश्वभुग् नामके विश्वभोक्ता इन्द्रसे पूछने लगे—'देवराज! आपके यज्ञकी यह कैसी विधि है? आप धर्म-प्राप्तिकी अभिलाषासे जो जीव-हिंसा करनेके लिये उद्यत हैं, यह महान् अधर्म है। सुरश्रेष्ठ! आपके यज्ञमें पशु-हिंसाकी यह नवीन विधि दीख रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप पशु-हिंसाके व्याजसे धर्मका विनाश करनेके लिये अधर्म करनेपर तुले हुए हैं। यह धर्म नहीं है। यह सरासर अधर्म है। जीव-हिंसा धर्म नहीं कही जाती। इसलिये यदि आप धर्म करना चाहते हैं तो वेदविहित धर्मका अनुष्ठान कीजिये। सुरश्रेष्ठ! वेदविहित विधिके अनुसार किये हुए यज्ञ और दुर्व्यसनरहित धर्मके पालनसे यज्ञके बीजभूत त्रिवर्ग (नित्य धर्म, अर्थ, काम)-की प्राप्ति होती है।