भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५२६ * मत्स्यपुराण *

| द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशः परः स्मृतः।<br>लोभोऽधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः॥ २५<br>वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा।<br>वर्णाश्रमपरिव्ध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च॥ २६<br>पूर्णे वर्षसहस्रे द्वे परमायुस्तदा नृणाम्।<br>निःशेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य संध्या तु पादतः॥ २७<br>प्रतिष्ठिते गुणैर्हीना धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु।<br>तथैव संध्यापादेन अंशस्तस्यां प्रतिष्ठितः॥ २८<br>द्वापरस्य तु पर्याये पुष्यस्य च निबोधत।<br>द्वापरस्यांशशेषे तु प्रतिपत्तिः कलेरथ॥ २९<br>हिंसा स्तेयानृतं माया वधश्चैव तपस्विनाम्।<br>एते स्वभावाः पुष्यस्य साधयन्ति च ताः प्रजाः॥ ३०<br>एष धर्मः स्मृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते।<br>मनसा कर्मणा वाचा वार्ता सिद्ध्यति वा न वा॥ ३१<br>कलौ प्रमारको रोगः सततं चापि क्षुद्भयम्।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः॥ ३२<br>न प्रमाणं स्मृतश्चास्ति पुष्ये घोरे युगे कलौ।<br>गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथापरः॥ ३३<br>स्थविरे मध्यकौमारे म्रियन्ते च कलौ प्रजाः।<br>अल्पतेजोबलाः पापा महाकोपा ह्यधार्मिकाः॥ ३४<br>अनृतव्रतलुब्धाश्च पुष्ये चैव प्रजाः स्थिताः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ३५<br>विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्।<br>हिंसमानस्तथैर्ष्या च क्रोधोऽसूयाक्षमः कृतम्॥ ३६<br>पुष्ये भवन्ति जन्तूनां लोभो मोहश्च सर्वशः।<br>संक्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम्॥ ३७<br>नाधीयन्ते तथा वेदा न यजन्ते द्विजातयः।<br>उत्सीदन्ति तथा चैव वैश्यैः सार्धं तु क्षत्रियाः॥ ३८<br>शूद्राणां मन्त्रयोनिस्तु सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।<br>भवतीह कलौ तस्मिञ्शयनासनभोजनैः॥ ३९ | इस प्रकार द्वापरयुगमें सभी प्राणियोंका जीवन भी कष्टसे ही चल पाता है। उस समय जनतामें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य-व्यवसाय, युद्ध, तत्त्वोंकी अनिश्चितता, वेदों एवं शास्त्रोंकी मनःकल्पित रचना, धर्मसंकरता, वर्णाश्रम-धर्मका विनाश तथा काम और द्वेषकी भावना आदि दुर्गुणोंका प्राबल्य हो जाता है। उस समय लोगोंकी दो हजार वर्षोंकी पूर्णायु होती है। द्वापरकी समाप्तिके समय उसके चतुर्थांशमें उसकी संध्याका काल आता है। उस समय लोग धर्मके गुणोंसे हीन हो जाते हैं। उसी प्रकार संध्याके चतुर्थ चरणमें संध्यांशका समय उपस्थित होता है॥ २१—२८॥<br><br>अब द्वापरयुगके बाद आनेवाले कलियुगका वृत्तान्त सुनिये। द्वापरकी समाप्तिके समय जब अंशमात्र शेष रह जाता है, तब कलियुगकी प्रवृत्ति होती है। जीव-हिंसा, चोरी, असत्यभाषण, माया (छल-कपट-दम्भ) और तपस्वियोंकी हत्या—ये कलियुगके स्वभाव (स्वाभाविक गुण) हैं। वह प्रजाओंको भलीभाँति चरितार्थ कर देता है। यही उसका अविकल धर्म है। यथार्थ धर्मका तो विनाश हो जाता है। उस समय मन-वचन-कर्मसे प्रयत्न करनेपर भी यह संदेह बना रहता है कि जीविकाकी सिद्धि होगी या नहीं। कलियुगमें विसूचिका, प्लेग आदि महामारक रोग होते हैं। इस घोर कलियुगमें भुखमरी और अकालका सदा भय बना रहता है। देशोंका उलट-फेर तो होता ही रहता है। किसी प्रमाणमें स्थिरता नहीं रहती। कोई गर्भमें ही मर जाता है तो कोई नौजवान होकर, कोई मध्य जवानीमें तो कोई बुढ़ापामें। इस प्रकार लोग कलियुगमें अकालमें ही कालके शिकार बन जाते हैं। उस समय लोगोंका तेज और बल घट जाता है। उनमें पाप, क्रोध और धर्महीनता बढ़ जाती है। वे असत्यभाषी और लोभी हो जाते हैं। ब्राह्मणोंके अनिष्ट-चिन्तन, अल्पाध्ययन, दुराचार और शास्त्र-ज्ञान-हीनता-रूप कर्मदोषोंसे प्रजाओंको सदा भय बना रहता है। कलियुगमें जीवोंमें हिंसा, अभिमान, ईर्ष्या, क्रोध, असूया, असहिष्णुता, अधीरता, लोभ, मोह और संक्षोभ आदि दुर्गुण सर्वथा अधिक मात्रामें बढ़ जाते हैं। कलियुगके आनेपर ब्राह्मण न तो वेदोंका अध्ययन करते हैं और न यज्ञानुष्ठान ही करते हैं। क्षत्रिय भी वैश्योंके साथ (कर्मभ्रष्ट होकर) विनष्ट हो जाते हैं। कलियुगमें शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जाते हैं और उनका शयन, आसन एवं भोजनके समय ब्राह्मणोंके साथ सम्पर्क होता है। |