मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १४४ * | ५२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाखण्डानां प्रवर्तकाः।<br>काषायिणश्च निष्कच्छास्तथा कापालिनश्च ह॥ ४०<br><br>ये चान्ये देवव्रतिनस्तथा ये धर्मदूषकाः।<br>दिव्यवृत्ताश्च ये केचिद् वृत्त्यर्थं श्रुतिलिङ्गिनः॥ ४१<br><br>एवंविधाश्च ये केचिद्भवन्तीह कलौ युगे।<br>अधीयन्ते तदा वेदाञ्शूद्रान् धर्मार्थकोविदाः॥ ४२<br><br>यजन्ति ह्याश्वमेधैस्तु राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४३<br><br>उपहृत्य तथान्योन्यं साधयन्ति तथा प्रजाः।<br>दुःखप्रचुरताल्पायुर्देशोत्सादः सरोगता॥ ४४<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वं तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>भ्रूणहत्या प्रजानां च तदा ह्येवं प्रवर्तते॥ ४५<br><br>तस्मादायुर्बलं रूपं प्रहीयन्ते कलौ युगे।<br>दुःखेनाभिप्लुतानां परमायुः शतं नृणाम्॥ ४६<br><br>भूत्वा च न भवन्तीह वेदाः कलियुगेऽखिलाः।<br>उत्सीदन्ते तथा यज्ञाः केवलं धर्महेतवः॥ ४७<br><br>एषा कलियुगावस्था संध्यांशौ तु निबोधत।<br>युगे युगे तु हीयन्ते त्रींस्त्रीन्पादांश्च सिद्धयः॥ ४८<br><br>युगस्वभावाः संध्यासु अवतिष्ठन्ति पादतः।<br>संध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादेनैवावतस्थिरे॥ ४९ | शूद्र ही अधिकतर राजा होते हैं। पाखण्डका प्रचार बढ़ जाता है। शूद्रलोग गेरुआ वस्त्र धारण कर हाथमें नारियलका कपाल लेकर काछ खोले हुए (संन्यासीके वेषमें) घूमते रहते हैं॥ २९—४०॥<br><br>कुछ लोग देवताओंकी पूजा करते हैं तो कुछ लोग धर्मको दूषित करते हैं। कुछ लोगोंके आचार-विचार दिव्य होते हैं तो कुछ लोग जीविकोपार्जनके लिये साधुका वेष बनाये रहते हैं। कलियुगमें अधिकतर इसी प्रकारके लोग होते हैं। उस समय शूद्रलोग धर्म और अर्थके ज्ञाता बनकर वेदोंका अध्ययन करते हैं। शूद्रयोनिमें उत्पन्न नृपतिगण अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उस समय लोग स्त्री, बालक और गौओंकी हत्या कर, परस्पर एक-दूसरेको मारकर तथा अपहरण कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। कलियुगमें कष्टका बाहुल्य हो जाता है। प्राणियोंकी आयु थोड़ी हो जाती है। देशोंमें उथल-पुथल होता रहता है। व्याधिका प्रकोप बढ़ जाता है। अधर्मकी ओर लोगोंकी विशेष रुचि हो जाती है। सभीके आचार-विचार तामसिक हो जाते हैं। प्रजाओंमें भ्रूणहत्याकी प्रवृत्ति हो जाती है। इसी कारण कलियुगमें आयु, बल और रूपकी क्षीणता हो जाती है। दुःखोंसे संतप्त हुए लोगोंकी परमायु सौ वर्षकी होती है। कलियुगमें सम्पूर्ण वेद विद्यमान रहते हुए भी नहींके बराबर हो जाते हैं तथा धर्मके एकमात्र कारण यज्ञोंका विनाश हो जाता है। यह तो कलियुगकी दशा बतलायी गयी, अब उसकी संध्या और संध्यांशका वर्णन सुनिये। प्रत्येक युगमें तीन-तीन चरण व्यतीत हो जानेके बाद सिद्धियाँ घट जाती हैं, अर्थात् धर्मका ह्रास हो जाता है। उनकी संध्याओंमें युगका स्वभाव चतुर्थांश मात्र रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशोंमें संध्याका स्वभाव भी चतुर्थांश ही शेष रहता है॥ ४१—४९॥ |
| एवं संध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषामधर्मिणां शास्ता भृगूणां च कुले स्थितः॥ ५०<br><br>गोत्रेण वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमतिरुच्यते।<br>कलिसंध्यांशभागेषु मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१<br><br>समास्त्रिंशत् सम्पूर्णाः पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अस्त्रकर्मा स वै सेनां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्॥ ५२ | इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें कलियुगके अन्तिम समयमें प्राप्त हुए संध्यांशकालमें उन अधर्मियोंका शासन करनेके लिये भृगुवंशमें चन्द्रगोत्रीय प्रमति* नामक राजा उत्पन्न होता है। वह अस्त्रधारी नरेश हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई सेनाको साथ लेकर तीस वर्षोतक पृथ्वीपर |
* श्रीविष्णुधर्मोत्तर महापुराणमें भी इस राजाकी विस्तृत महिमा निरूपित है। वासुदेवशरण अग्रवाल आदि इतिहासके अनेक विद्वान् इसे राजा विक्रमादित्यका अपर नाम मानते हैं।