मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १४४ * | ५२९ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्याकुलास्ताः परावृत्तास्त्यक्त्वा देवगृहाणि तु।<br>स्वान् स्वान् प्राणानवेक्षन्तो निष्कारुण्यात्सुदुःखिताः॥ ६८<br><br>नष्टे श्रौतस्मृते धर्मे कामक्रोधवशानुगाः।<br>निर्मर्यादा निरानन्दा निःस्नेहा निरपत्रपाः॥ ६९<br><br>नष्टे धर्मे प्रतिहता ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः।<br>हित्वा दारांश्च पुत्रांश्च विषाद्व्याकुलप्रजाः॥ ७०<br><br>अनावृष्टिहतास्ते वै वार्तामुत्सृज्य दुःखिताः।<br>आश्रयन्ति स्म प्रत्यन्तान् हित्वा जनपदान् स्वकान्॥ ७१<br><br>सरितः सागरानूपान् सेवन्ते पर्वतानपि।<br>चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७२<br><br>वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः संकरं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता ह्यल्पशेषाः प्रजास्ततः॥ ७३<br><br>जन्तवश्च क्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमागमन्।<br>संश्रयन्ति च देशांस्तांश्चक्रवत् परिवर्तनाः॥ ७४<br><br>ततः प्रजास्तु ताः सर्वा मांसाहारा भवन्ति हि।<br>मृगान् वराहान् वृषभान् ये चान्ये वनचारिणः॥ ७५<br><br>भक्ष्यांश्चैवाप्यभक्ष्यांश्च सर्वांस्तान् भक्षयन्ति ताः।<br>समुद्रसंश्रिता यास्तु नदीश्चैव प्रजास्तु ताः॥ ७६<br><br>तेऽपि मत्स्यान् हरन्तीह आहारार्थं च सर्वशः।<br>अभक्ष्याहारदोषेण एकवर्णगताः प्रजाः॥ ७७<br><br>यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल।<br>तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा* ॥ ७८<br><br>एवं वर्षशतं पूर्णं दिव्यं तेषां न्यवर्तत।<br>षट्त्रिंशच्च सहस्त्राणि मानुषाणि तु तानि वै॥ ७९<br><br>अथ दीर्घेण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा।<br>मत्स्याश्चैव हताः सर्वैः क्षुधाविष्टैश्च सर्वशः॥ ८० | लोग व्याकुल होकर देवताओं और गृहोंको छोड़कर उनसे मुख मोड़ लेते हैं। सभीको अपने-अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता लगी रहती है। क्रूरताका बोलबाला होनेके कारण लोग अत्यन्त दुःखी रहते हैं। श्रौत एवं स्मार्त धर्म नष्ट हो जाता है। सभी लोग काम और क्रोधके वशीभूत हो जाते हैं। वे मर्यादा, आनन्द, स्नेह और लज्जासे रहित हो जाते हैं। धर्मके नष्ट हो जानेपर वे भी विनष्ट हो जाते हैं। उनका कद छोटा हो जाता है और उनकी आयु पचीस वर्षकी हो जाती है। विषादसे व्याकुल हुए लोग अपनी पत्नी और पुत्रोंको भी छोड़ देते हैं। वे अकालसे पीड़ित होनेके कारण जीविकाके साधनोंका परित्याग कर कष्ट झेलते हैं तथा अपने जनपदोंको छोड़कर निकटवर्ती देशोंकी शरण लेते हैं॥ ६९-७१॥<br><br>कुछ लोग भागकर नदियों, समुद्र-तटवर्ती भागों तथा पर्वतोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। वल्कल और काला मृगचर्म ही उनका परिधान होता है। वे क्रियाहीन और परिग्रहरहित हो जाते हैं तथा वर्णाश्रमधर्मसे भ्रष्ट होकर घोर संकर-धर्ममें आस्था करने लगते हैं। उस समय स्वल्प मात्रामें बची हुई प्रजा इस प्रकार कष्ट झेलती है। क्षुधासे पीड़ित जीव-जन्तु दुःखके कारण अपने जीवनसे ऊब जाते हैं, किंतु चक्रकी तरह घूमते हुए पुनः उन्हीं देशोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। तदनन्तर वे सारी प्रजाएँ मांसाहारी हो जाती हैं। उनमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार लुप्त हो जाता है। वे मृगों, सूकरों, वृषभों तथा अन्यान्य सभी वनचारी जीवोंको खाने लगती हैं। जो प्रजाएँ नदियों और समुद्रोंके तटपर निवास करती हैं, वे भी भोजनके लिये सर्वत्र मछलियोंको पकड़ती हैं। इस प्रकार अभक्ष्य भोजनके दोषके कारण सारी प्रजा एक वर्णकी हो जाती हैं, अर्थात् वर्णधर्म नष्ट हो जाता है। जैसे पहले कृतयुगमें एक ही (हंसनामका) वर्ण था, उसी तरह कलियुगके अन्तमें सारी प्रजाएँ शूद्रवर्णकी हो जाती हैं। इस प्रकार उन प्रजाओंके पूरे एक सौ दिव्य वर्ष तथा मानुष गणनाके अनुसार छत्तीस हजार वर्ष व्यतीत होते हैं। इतने लम्बे समयमें क्षुधासे पीड़ित वे सभी लोग सर्वत्र पशुओं, पक्षियों और मछलियोंको मारकर |
* कलियुगका वर्णन अन्य पुराणों, सुभाषितों, गोस्वामीजीके मानसादि काव्यों तथा समर्थरामदासजीके दासबोध आदिमें भी बड़े आकर्षक ढंगसे हुआ है, जिनके अध्ययनसे लोग दोषोंसे बचते हैं। पर मत्स्यपुराण-जितना विस्तृत वर्णन वायु, ब्रह्माण्डादि पुराणों एवं महाभारत-वनपर्वमें भी नहीं हुआ है। तथापि वहाँ भी यह प्रसङ्ग प्रायः कुछ कम इन्हीं श्लोकोंमें मिलता है।