मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| निःशेषेष्वथ सर्वेषु मत्स्यपक्षिपशुष्वथ।<br>संध्यांशे प्रतिपन्ने तु निःशेषास्तु तदा कृताः ॥ ८१<br>ततः प्रजास्तु सम्भूय कन्दमूलमथोऽखनन्।<br>फलमूलाशनः सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥ ८२<br>वल्कला्न्यथ वासांसि अधःशय्याश्च सर्वशः।<br>परिग्रहो न तेष्वस्ति धनं शुद्धिस्तथापि वा ॥ ८३ | खा डालते हैं। इस प्रकार जब संध्यांशके प्रवृत्त होनेपर सारे मछली, पक्षी और पशु मारकर निःशेष कर दिये जाते हैं, तब पुनः लोग कन्द-मूल खोदकर खाने लगते हैं। उस समय वे सभी गृहरहित होकर फल-मूलपर ही जीवन-निर्वाह करते हैं। वल्कल ही उनका वस्त्र होता है। वे सर्वत्र भूमिपर ही शयन करते हैं। उनके परिग्रह (स्त्री-परिवार आदि), अर्थशुद्धि और शौचाचार आदि सब नष्ट हो जाते हैं॥ ७२—८३॥ | | एवं क्षयं गमिष्यन्ति ह्यल्पशिष्टाः प्रजास्तदा।<br>तासामल्पावशिष्टानामाहाराद् वृद्धिरिष्यते ॥ ८४<br>एवं वर्षशतं दिव्यं संध्यांशस्तस्य वर्तते।<br>ततो वर्षशतस्यान्ते अल्पशिष्टाः स्त्रियः सुताः ॥ ८५<br>मिथुनानि तु ताः सर्वा ह्यन्योन्यं सम्प्रजज्ञिरे।<br>ततस्तास्तु म्रियन्ते वै पूर्वोत्पन्नाः प्रजास्तु याः ॥ ८६<br>जातमात्रेष्वपत्येषु ततः कृतमवर्तत।<br>यथा स्वर्गे शरीराणि नरके चैव देहिनाम् ॥ ८७<br>उपभोगसमर्थानि एवं कृतयुगादिषु।<br>एवं कृतस्य संतानः कलेश्चैव क्षयस्तथा ॥ ८८<br>विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा।<br>ततश्चैवात्मसम्बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता ॥ ८९<br>कलिशिष्टेषु तेष्वेवं जायन्ते पूर्ववत् प्रजाः।<br>भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत ॥ ९०<br>अतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेष्विह।<br>एते युगस्वभावास्तु मयोक्तास्तु समासतः ॥ ९१ | इस प्रकार उस समय थोड़ी बची हुई प्रजाएँ नष्ट हो जाती हैं। उनमें भी जो थोड़ी शेष रह जाती हैं, उनकी आहार-शुद्धिके कारण वृद्धि होती है। इस प्रकार कलियुगका संध्यांश एक सौ दिव्य वर्षोंका होता है। उन सौ वर्षोंके बीत जानेपर जो अल्पजीवी संतानोत्पत्ति होती है और इसके पूर्व जो प्रजाएँ उत्पन्न हुई थीं, वे सभी मर जाती हैं। उन संतानोंके उत्पन्न होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है। जैसे (मृत्युके पश्चात् प्राप्त हुए) प्राणियोंके शरीर स्वर्ग और नरकमें उपभोगके योग्य होते हैं, उसी तरह कृतयुग आदि युगोंमें भी होता है। उसी प्रकार वह नूतन संतान कृतयुगकी वृद्धि और कलियुगके विनाशका कारण होता है। आत्माकी साम्यावस्थाके विचारसे विरक्ति उत्पन्न होती है, उससे आत्मज्ञान होता है और ज्ञानसे धर्म-बुद्धि होती है। इसी कारण कलियुगके अन्तमें बचे हुए लोगोंमें भावी प्रयोजनके प्रभावसे पुनः पूर्ववत् प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। तदनन्तर कृतयुगका आरम्भ होता है। उस समय मन्वन्तरोंमें जो भूत एवं भावी कर्म होते रहे हैं, वे सभी आवृत्त होने लगते हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेपसे युगोंके स्वभावका वर्णन कर दिया॥ ८४—९१॥ | | विस्तरेणानुपूर्व्याच्च नमस्कृत्य स्वयम्भुवे।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै ॥ ९२<br>उत्पन्नाः कलिशिष्टेषु प्रजाः कार्त्तयुगास्तथा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विहरन्ति च ॥ ९३<br>सह सप्तर्षिभिर्ये तु तत्र ये च व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थे य इह स्मृताः ॥ ९४<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीह तेषु च॥<br>वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतस्मार्तविधानतः।<br>एवं तेषु क्रियावत्सु प्रवर्त्तन्तीह वै कृते ॥ ९५ | अब मैं पुनः कृतयुगके प्रवृत्त होनेपर ब्रह्माको नमस्कार करके उसका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ। कलियुगके अन्तमें बचे हुए लोगोंमें कृतयुगकी तरह ही संतानोत्पत्ति होती है। उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियोंके बीजकी रक्षाके लिये जो सिद्धगण अदृष्टरूपसे विचरण करते हुए वर्तमान रहते हैं, वे सभी तथा सप्तर्षियोंके साथ जो अन्य लोग स्थित रहते हैं, वे सभी मिलकर कृतयुगमें क्रियाशील संततियोंके प्रति व्यवस्थाका विधान करते हैं और सप्तर्षिगण उन्हें श्रौत एवं स्मार्त विधिके अनुसार वर्ण एवं आश्रमके आचारसे सम्पन्न |