मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १४५ * ५३३
| तल्लक्षणं तु देवानां दृश्यतेऽन्वयदर्शनात्।<br>बुद्ध्यातिशयसंयुक्तो देवानां काय उच्यते॥ १५<br>तथा नातिशयश्चैव मानुषः काय उच्यते।<br>इत्येव हि परिक्रान्ता भावा ये दिव्यमानुषाः॥ १६<br>पशूनां पक्षिणां चैव स्थावराणां च सर्वशः।<br>गावोऽजाश्वाश्च विज्ञेया हस्तिनः पक्षिणो मृगाः॥ १७<br>उपयुक्ताः क्रियास्वेते यज्ञियास्तिवह सर्वशः।<br>यथाक्रमोपभोगाश्च देवानां पशुमूर्तयः॥ १८<br>तेषां रूपानुरूपैश्च प्रमाणैः स्थिरजङ्गमाः।<br>मनोज्ञैस्तत्र तैर्भोगैः सुखिनो ह्युपपेदिरे॥ १९ | वही लक्षण वंशपरम्परावश देवताओंमें भी देखा जाता है। देवताओंका शरीर केवल बुद्धिकी अतिशयतासे युक्त बतलाया जाता है। मानव-शरीरमें बुद्धिकी उतनी अधिकता नहीं रहती। इस प्रकार देवताओं और मानवोंके शरीरोंमें उत्पन्न हुए जो भाव हैं, वे पशुओं, पक्षियों और स्थावर प्राणियोंके शरीरोंमें भी पाये जाते हैं। गौ, बकरा, घोड़ा, हाथी, पक्षी और मृग—इनका सर्वत्र यज्ञीय कर्मोंमें उपयोग होता है तथा ये पशुमूर्तियाँ क्रमशः देवताओंके उपभोगमें प्रयुक्त होती हैं। उन उपभोक्ता देवताओंके रूप और प्रमाणके अनुरूप ही उन चर-अचर प्राणियोंकी मूर्तियाँ होती हैं। वे उन मनोज्ञ भोगोंका उपभोग करके सुखका अनुभव करते हैं॥ १०—१९॥ |
| अथ सन्तः प्रवक्ष्यामि साधूनथ ततश्च वै।<br>ब्राह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च देवानां व्यक्तमूर्तयः।<br>सम्पूज्या ब्रह्मणा होतास्तेन सन्तः प्रचक्षते॥ २० | अब मैं संतों तथा साधुओंका वर्णन कर रहा हूँ। ब्राह्मण ग्रन्थ और श्रुतियोंके शब्द—ये भी देवताओंकी निर्देशिका-मूर्तियाँ हैं। अन्तःकरणमें इनके तथा ब्रह्मका संयोग बना रहता है, इसलिये ये संत कहलाते हैं। |
| सामान्येषु च धर्मेषु तथा वैशेषिकेषु च।<br>ब्रह्मक्षत्रविशो युक्ताः श्रौतस्मार्तेन कर्मणा॥ २१<br>वर्णाश्रमेषु युक्तस्य सुखोदर्कस्य स्वर्गंतौ।<br>श्रौतस्मार्तो हि यो धर्मो ज्ञानधर्मः स उच्यते॥ २२ | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सामान्य एवं विशेष धर्मोंमें सर्वत्र श्रौत एवं स्मार्त विधिके अनुसार कर्मका आचरण करते हैं। वर्णाश्रम-धर्मोंके पालनमें तत्पर तथा स्वर्ग-प्राप्तिमें सुख माननेवाले लोगोंद्वारा आचरित जो श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी धर्म है, उसे ज्ञानधर्म कहा जाता है। |
| दिव्यानां साधनात् साधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः।<br>कारणात् साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते॥ २३<br>तपसश्च तथारण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः।<br>यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात्॥ २४ | दिव्य सिद्धियोंकी साधनामें संलग्न तथा गुरुका हितैषी होनेके कारण ब्रह्मचारीको साधु कहते हैं। (अन्य आश्रमोंकी जीविकाका) निमित्त तथा स्वयं साधनामें निरत होनेके कारण गृहस्थ भी साधु कहलाता है। वनमें तपस्या करनेवाला साधु वैखानस नामसे अभिहित होता है। योगकी साधनामें प्रयत्नशील संन्यासीको भी साधु कहते हैं। |
| धर्मो धर्मगतिः प्रोक्तः शब्दो ह्येष क्रियात्मकः।<br>कुशलाकुशलौ चैव धर्माधर्मौ ब्रवीत् प्रभुः॥ २५<br>अथ देवाश्च पितरः ऋषयश्चैव मानुषाः।<br>अयं धर्मो ह्ययं नेति ब्रुवते मौनमूर्तयः॥ २६<br>धर्मेति धारणे धातुर्महत्त्वे चैव उच्यते।<br>अधारणेऽमहत्त्वे वाधर्मः स तु निरुच्यते॥ २७<br>तत्रेष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते।<br>अधर्मश्चानिष्टफलं आचार्यैर्नोपदिश्यते॥ २८ | 'धर्म' शब्द क्रियात्मक है और यह धर्माचरणमें ही प्रयुक्त होनेवाला कहा गया है। सामर्थ्यशाली भगवान्ने धर्मको कल्याणकारक और अधर्मको अनिष्टकारक बतलाया है तथा देवता, पितर, ऋषि और मानव 'यह धर्म है और यह धर्म नहीं है' ऐसा कहकर मौन धारण कर लेते हैं। 'धृ' धातु धारण करने तथा महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। अधारण एवं अधर्म शब्दका अर्थ इसके विपरीत है। आचार्यलोग इष्टकी प्राप्ति करानेवाले धर्मका ही उपदेश करते हैं। अधर्म अनिष्ट-फलदायक होता है, इसलिये आचार्यगण उसका उपदेश नहीं करते। |