भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५३४* मत्स्यपुराण *

| वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो ह्यदाम्भिकाः ।<br>सम्यग्विनीता मृदवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते ॥ २९<br><br>धर्मज्ञैर्विहितो धर्मः श्रौतस्मार्तो द्विजातिभिः ।<br>दाराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम् ॥ ३०<br>स्मार्तो वर्णाश्रमाचारो यमैश्च नियमैर्युतः । | जो वृद्ध, निर्लोभ, आत्मज्ञानी, निष्कपट, अत्यन्त विनम्र तथा मृदुल स्वभाववाले होते हैं, उन्हें आचार्य कहा जाता है। धर्मके ज्ञाता द्विजातियोंद्वारा श्रौत एवं स्मार्त-धर्मका विधान किया गया है। इनमें दारसम्बन्ध (विवाह), अग्निहोत्र और यज्ञ—ये श्रौत-धर्मके लक्षण हैं तथा यम और नियमोंसे युक्त वर्णाश्रमका आचरण स्मार्त-धर्म कहलाता है॥ २९—३० १/२ ॥ | | पूर्वेभ्यो वेदयित्वेह श्रौतं सप्तर्षयोऽब्रुवन् ॥ ३१<br>ऋचो यजूंषि सामानि ब्रह्मणोऽङ्गानि वै श्रुतिः ।<br>मन्वन्तरस्यातीतस्य स्मृत्वा तन्मनुरब्रवीत् ॥ ३२<br>तस्मात्स्मार्तः स्मृतो धर्मो वर्णाश्रमविभागशः ।<br>एवं वै द्विविधो धर्मः शिष्टाचारः स उच्यते ॥ ३३<br>शिषेर्धातोरच निष्ठान्ताच्छिष्टशब्दं प्रचक्षते ।<br>मन्वन्तरेषु ये शिष्टा इह तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥ ३४<br>मनुः सप्तर्षयश्चैव लोकसन्तानकारिणः ।<br>तिष्ठन्तीह च धर्मार्थं ताञ्छिष्टान् सम्प्रचक्षते ॥ ३५<br>तैः शिष्टैश्चलितो धर्मः स्थाप्यते वै युगे युगे ।<br>त्रयी वार्ता दण्डनीतिः प्रजावर्णाश्रमेप्सया ॥ ३६<br>शिष्टैराचर्यते यस्मात्पुनश्चैव मनुक्षये ।<br>पूर्वैः पूर्वैर्मतत्वाच्च शिष्टाचारः स शाश्वतः ॥ ३७<br>दानं सत्यं तपोऽलोभो विद्येज्या पूजनं दमः ।<br>अष्टौ तानि चरित्राणि शिष्टाचारस्य लक्षणम् ॥ ३८<br>शिष्टा यस्माच्चरन्त्येनं मनुः सप्तर्षयश्च ह ।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु शिष्टाचारस्ततः स्मृतः ॥ ३९<br>विज्ञेयः श्रवणाच्छ्रौतः स्मरणात् स्मार्त उच्यते ।<br>इज्यावेदात्मकः श्रौतः स्मार्तो वर्णाश्रमात्मकः ॥ ४० | सप्तर्षियोंने पूर्ववर्ती ऋषियोंसे श्रौत-धर्मका ज्ञान प्राप्त करके पुनः उसका उपदेश किया था। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये ब्रह्माके अङ्ग हैं। व्यतीत हुए मन्वन्तरके धर्मोंका स्मरण करके मनुने उनका उपदेश किया है। इसलिये वर्णाश्रमके विभागानुसार प्रयुक्त हुआ धर्म स्मार्त कहलाता है। इस प्रकार श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्मको शिष्टाचार कहते हैं। ‘शिष्’ धातुसे निष्ठासंज्ञक ‘क्त’ प्रत्ययका संयोग होनेसे ‘शिष्ट’ शब्द निष्पन्न होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें इस भूतलपर जो धार्मिकलोग वर्तमान रहते हैं, उन्हें शिष्ट कहा जाता है। इस प्रकार लोककी वृद्धि करनेवाले सप्तर्षि और मनु इस भूतलपर धर्मका प्रचार करनेके लिये स्थित रहते हैं, अतः वे शिष्ट शब्दसे अभिहित होते हैं। वे शिष्टगण प्रत्येक युगमें मार्ग-भ्रष्ट हुए धर्मकी पुनः स्थापना करते हैं। इसीलिये शिष्टगण दूसरे मन्वन्तरमें प्रजाओंके वर्णाश्रम-धर्मकी सिद्धिके लिये पुनः वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषिव्यापार) और दण्डनीतिका आचरण करते हैं। इस प्रकार पूर्वके युगोंमें उपस्थित पूर्वजोंद्वारा अभिमत होनेके कारण यह शिष्टाचार सनातन होता है। दान, सत्य, तपस्या, निर्लोभता, विद्या, यज्ञानुष्ठान, पूजन और इन्द्रियनिग्रह—ये आठ आचरण शिष्टाचारके लक्षण हैं। चूँकि मनु और सप्तर्षि आदि शिष्टगण सभी मन्वन्तरोंमें इस लक्षणके अनुसार आचरण करते हैं, इसलिये इसे शिष्टाचार कहा जाता है। इस प्रकार पूर्वानुक्रमसे श्रवण किये जानेके कारण श्रुतिसम्बन्धी धर्मको श्रौत जानना चाहिये और स्मरण होनेके कारण स्मृति-प्रतिपादित धर्मको स्मार्त कहा जाता है। श्रौतधर्म यज्ञ और वेदस्वरूप है तथा स्मार्तधर्म वर्णाश्रमधर्म-नियामक है॥ ३१—४०॥ | | प्रत्यङ्गानि प्रवक्ष्यामि धर्मस्येह तु लक्षणम् ॥ ४१ | अब मैं धर्मके प्रत्येक अङ्गका लक्षण बतला रहा हूँ। | | दृष्टानुभूतमर्थं च यः पृष्टो न विगूहते ।<br>यथाभूतप्रवादस्तु इत्येतत् सत्यलक्षणम् ॥ ४२ | देखे तथा अनुभव किये हुए विषयके पूछे जानेपर उसे न छिपाना, अपितु घटित हुएके अनुसार यथार्थ कह देना—यह सत्यका लक्षण है। |