मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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- अध्याय १४५ * <div align="right">५३५</div>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मचर्यं तपो मौनं निराहारत्वमेव च।<br>इत्येतत् तपसो रूपं सुघोरं तु दुरासदम्॥ ४३<br><br>पशूनां द्रव्यहविषामृक्सामयजुषां तथा।<br>ऋत्विजां दक्षिणायाश्च संयोगो यज्ञ उच्यते॥ ४४<br><br>आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हिताय शुभाय च।<br>वर्तते सततं हृष्टः क्रिया श्रेष्ठा दया स्मृता॥ ४५<br><br>आक्रुष्टोऽभिहतो यस्तु नाक्रोशेत्प्रहरेदपि।<br>अदुष्टो वाङ्मनःकायैस्तितिक्षा सा क्षमा स्मृता॥ ४६<br><br>स्वामिना रक्ष्यमाणानामुत्सृष्टानां च सम्भ्रमे।<br>परस्वानामनादानमलोभ इति संज्ञितः॥ ४७<br><br>मैथुनस्यासमाचारो जल्पनाच्चिन्तनात्तथा।<br>निवृत्तिर्ब्रह्मचर्यं च तदेतच्छमलक्षणम्॥ ४८ | ब्रह्मचर्य, तपस्या, मौनावलम्बन और निराहार रहना—ये तपस्याके लक्षण हैं, जो अत्यन्त भीषण एवं दुष्कर हैं। जिसमें पशु, द्रव्य, हवि, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, ऋत्विज् तथा दक्षिणाका संयोग होता है, उसे यज्ञ कहते हैं। जो अपनी ही भाँति समस्त प्राणियोंके प्रति उनके हित तथा मङ्गलके लिये निरन्तर हर्षपूर्वक व्यवहार करता है, उसकी वह श्रेष्ठ क्रिया दया कहलाती है। जो निन्दित होनेपर बदलेमें निन्दककी निन्दा नहीं करता तथा आघात किये जानेपर भी बदलेमें उसपर प्रहार नहीं करता, अपितु मन, वचन और शरीरसे प्रतीकारकी भावनासे रहित हो उसे सहन कर लेता है, उसकी उस क्रियाको क्षमा कहते हैं। स्वामीद्वारा रक्षाके लिये दिये गये तथा घबराहटमें छूटे हुए परकीय धनको न ग्रहण करना निर्लोभ नामसे कहा जाता है। मैथुनके विषयमें सुनने, कहने तथा चिन्तन करनेसे निवृत्त रहना ब्रह्मचर्य है और यही शमका लक्षण है॥ ४१—४८॥ |
| आत्मार्थे वा परार्थे वा इन्द्रियाणीह यस्य वै।<br>विषये न प्रवर्तन्ते दमस्यैतत्तु लक्षणम्॥ ४९ | जिसकी इन्द्रियाँ अपने अथवा परायेके हितके लिये विषयोंमें नहीं प्रवृत्त होतीं, यह दमका लक्षण है। |
| पञ्चात्मके यो विषये कारणे चाष्टलक्षणे।<br>न क्रुध्येत प्रतिहतः स जितात्मा भविष्यति॥ ५० | जो पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषयों तथा आठ प्रकारके कारणोंमें बाधित होनेपर भी क्रोध नहीं करता, वह जितात्मा कहलाता है। |
| यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं च यत्।<br>तत्तद् गुणवते देयमित्येतद् दानलक्षणम्॥ ५१ | जो-जो पदार्थ अपनेको अभीष्ट हों तथा न्यायद्वारा उपार्जित किये गये हों, उन्हें गुणी व्यक्तिको दे देना—यह दानका लक्षण है। |
| श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः।<br>शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मतः॥ ५२ | जो धर्म श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमके आचारसे युक्त तथा शिष्टाचारद्वारा परिवर्धित होता है, वही साधु-सम्मत धर्म कहलाता है। |
| अप्रद्वेष्यो ह्यनिष्टेषु इष्टं वै नाभिनन्दति।<br>प्रीतितापविषादानां विनिवृत्तिर्विरक्तता॥ ५३ | अनिष्टके प्राप्त होनेपर उससे द्वेष न करना, इष्टकी प्राप्तिपर उसका अभिनन्दन न करना तथा प्रेम, संताप और विषादसे विशेषतया निवृत्त हो जाना—यह विरक्ति (वैराग्य)-का लक्षण है। |
| संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह।<br>कुशलाकुशलाभ्यां तु प्रहाणं न्यास उच्यते॥ ५४ | किये हुए कर्मोंका न किये गये कर्मोंके साथ त्याग कर देना अर्थात् कृत-अकृत दोनों प्रकारके कर्मोंका त्याग संन्यास कहलाता है तथा कुशल (शुभ) और अकुशल (अशुभ)—दोनोंके परित्यागको न्यास कहते हैं। |
| अव्यक्तादिविशेषान्तद् विकारोऽस्मिन्निवर्तते।<br>चेतनाचेतनं ज्ञात्वा ज्ञाने ज्ञानी स उच्यते॥ ५५ | जिस ज्ञानके प्राप्त होनेपर अव्यक्तसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी प्रकारके विकार निवृत्त हो जाते हैं तथा चेतन और अचेतनका ज्ञान हो जाता है, उस ज्ञानसे युक्त प्राणीको ज्ञानी कहते हैं। |
| प्रत्यङ्गानि तु धर्मस्य चेत्येतल्लक्षणं स्मृतम्।<br>ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५६ | स्वायम्भुव मन्वन्तरमें धर्मतत्त्वके ज्ञाता पूर्वकालीन ऋषियोंने धर्मके प्रत्येक अङ्गका यही लक्षण बतलाया है॥ ४९—५६॥ |
| अत्र वो वर्णयिष्यामि विधिं मन्वन्तरस्य तु।<br>तथैव चातुर्होत्रस्य चातुर्वर्ण्यस्य चैव हि॥ ५७ | अब मैं आपलोगोंसे मन्वन्तरमें होनेवाले चारों वर्णोंके चातुर्होत्रकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। |