भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४६* मत्स्यपुराण *
Sanskrit ShlokaHindi Translation
एतस्मिन्नन्तरे जातः कालो वर्षसहस्रिकः।<br>तस्मिन् गते तु भगवान् काले कमलसम्भवः।<br>तुष्टः प्रोवाच वज्राङ्गं तमागम्य जलाशयम्॥ ७१एक हजार वर्ष पूरा हो गया। उस समयके पूर्ण हो जानेपर पद्मसम्भव भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न होकर उस जलाशयके तटपर आये और वज्राङ्गसे बोले॥ ६३—७१॥
ब्रह्मोवाच<br><br>ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन।<br>एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसां निधिः।<br>उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम्॥ ७२**ब्रह्माने कहा—**दितिनन्दन! उठो। मैं तुम्हें तुम्हारी सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ दे रहा हूँ। ऐसा कहे जानेपर तपोनिधि दैत्यराज वज्राङ्ग उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे इस प्रकार कहा॥ ७२॥
वज्राङ्ग उवाच<br><br>आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाश्रयाः।<br>तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्॥ ७३<br>एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम्।<br>वज्राङ्गोऽपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः॥ ७४<br>आहारमिच्छन्भार्यां स्वां न ददर्शाश्रमे स्वके।<br>क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह॥ ७५<br>आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन् व्यलोकयत्।<br>रुदतीं तां प्रियां दीनां तनुप्रच्छादिताननाम्।<br>तां विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन्॥ ७६**वज्राङ्गने कहा—**देव! मेरे शरीरमें आसुर भावका संचार मत हो, मुझे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हो। तपस्यामें ही मेरी रति हो और मेरा यह शरीर वर्तमान रहे। 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने निवासस्थानको चले गये। वज्राङ्ग भी तपस्याके समाप्त हो जानेपर संयम-नियमसे निवृत्त हुआ। उस समय उसे भोजनकी इच्छा जाग्रत् हुई, परंतु उसे अपने आश्रममें अपनी पत्नी न दीख पड़ी। तब भूखसे पीड़ित हुआ वज्राङ्ग फल-मूल लानेके लिये उस पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ उसने अपनी प्रिय पत्नीको देखा, जो थोड़ा मुख ढके हुए दीनभावसे रुदन कर रही थी। उसे देखकर दैत्यराज वज्राङ्ग उसे सान्त्वना देते हुए बोला॥ ७३—७६॥
वज्राङ्ग उवाच<br><br>केन तेऽपकृतं भीरु यमलोकं यियासुना।<br>कं वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि भामिनि॥ ७७**वज्राङ्गने कहा—**भीरु! यमलोकको जानेके लिये उद्यत किस व्यक्तिने तुम्हारा अपकार किया है? अथवा मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? भामिनि! तुम मुझे शीघ्र बतलाओ॥ ७७॥
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इति श्रीमात्स्ये महापुराणे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें एक सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४६॥

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