मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५४६ | * मत्स्यपुराण * |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| एतस्मिन्नन्तरे जातः कालो वर्षसहस्रिकः।<br>तस्मिन् गते तु भगवान् काले कमलसम्भवः।<br>तुष्टः प्रोवाच वज्राङ्गं तमागम्य जलाशयम्॥ ७१ | एक हजार वर्ष पूरा हो गया। उस समयके पूर्ण हो जानेपर पद्मसम्भव भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न होकर उस जलाशयके तटपर आये और वज्राङ्गसे बोले॥ ६३—७१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br><br>ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन।<br>एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसां निधिः।<br>उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम्॥ ७२ | **ब्रह्माने कहा—**दितिनन्दन! उठो। मैं तुम्हें तुम्हारी सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ दे रहा हूँ। ऐसा कहे जानेपर तपोनिधि दैत्यराज वज्राङ्ग उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे इस प्रकार कहा॥ ७२॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br><br>आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाश्रयाः।<br>तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्॥ ७३<br>एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम्।<br>वज्राङ्गोऽपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः॥ ७४<br>आहारमिच्छन्भार्यां स्वां न ददर्शाश्रमे स्वके।<br>क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह॥ ७५<br>आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन् व्यलोकयत्।<br>रुदतीं तां प्रियां दीनां तनुप्रच्छादिताननाम्।<br>तां विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन्॥ ७६ | **वज्राङ्गने कहा—**देव! मेरे शरीरमें आसुर भावका संचार मत हो, मुझे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हो। तपस्यामें ही मेरी रति हो और मेरा यह शरीर वर्तमान रहे। 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने निवासस्थानको चले गये। वज्राङ्ग भी तपस्याके समाप्त हो जानेपर संयम-नियमसे निवृत्त हुआ। उस समय उसे भोजनकी इच्छा जाग्रत् हुई, परंतु उसे अपने आश्रममें अपनी पत्नी न दीख पड़ी। तब भूखसे पीड़ित हुआ वज्राङ्ग फल-मूल लानेके लिये उस पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ उसने अपनी प्रिय पत्नीको देखा, जो थोड़ा मुख ढके हुए दीनभावसे रुदन कर रही थी। उसे देखकर दैत्यराज वज्राङ्ग उसे सान्त्वना देते हुए बोला॥ ७३—७६॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br><br>केन तेऽपकृतं भीरु यमलोकं यियासुना।<br>कं वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि भामिनि॥ ७७ | **वज्राङ्गने कहा—**भीरु! यमलोकको जानेके लिये उद्यत किस व्यक्तिने तुम्हारा अपकार किया है? अथवा मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? भामिनि! तुम मुझे शीघ्र बतलाओ॥ ७७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें एक सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४६॥
| * अध्याय १४७ * | ५४७ |
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एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक
| Sanskrit Shloka | Hindi Commentary |
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| वराङ्गयुवाच<br>त्रासितास्म्यपविद्धास्मि ताडिता पीडितापि च।<br>रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः॥ १<br>दुःखपारमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता।<br>पुत्रं मे तारकं देहि दुःखशोकमहार्णवात्॥ २<br>एवमुक्तः स दैत्येन्द्रः कोपव्याकुललोचनः।<br>शक्तोऽपि देवराजस्य प्रतिकर्तुं महासुरः॥ ३<br>तपः कर्तुं पुनर्देत्यो व्यवस्यत महाबलः।<br>ज्ञात्वा तु तस्य संकल्पं ब्रह्मा क्रूरतरं पुनः॥ ४<br>आजगाम तदा तत्र यत्रासौ दितिनन्दनः।<br>उवाच तस्मै भगवान् प्रभुर्मधुरया गिरा॥ ५ | वराङ्गी बोली—'पतिदेव! क्रूर स्वभाववाले देवराज इन्द्रने मुझे एक अनाथ विधवाकी तरह बहुत प्रकारसे डराया है, अपमानित किया है, ताडना दी है और कष्ट पहुँचाया है। इसलिये दुःखका अन्त न देखकर मैं अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत हूँ। अतः मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये, जो मेरा इस दुःख एवं शोकरूप महासागरसे उद्धार करनेमें समर्थ हो। पत्नीद्वारा ऐसा कहे जानेपर दैत्यराज वज्राङ्गका हृदय क्रोधसे व्याकुल हो गया। यद्यपि महासुर वज्राङ्ग देवराज इन्द्रसे बदला चुकानेमें समर्थ था, तथापि उस महाबली दैत्यने पुनः तप करनेका ही निश्चय किया। तब सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा उसके उस क्रूरतर विचारको जानकर फिर जहाँ यह दिति-पुत्र वज्राङ्ग स्थित था वहाँ आ पहुँचे और उससे मधुर वाणीमें बोले— ॥ १–५ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किमर्थं पुत्र भूयस्त्वं नियमं क्रूरमिच्छसि।<br>आहाराभिमुखो दैत्य तन्मो ब्रूहि महाव्रत॥ ६<br>यावदब्दसहस्रेण निराहारस्य यत्फलम्।<br>क्षणेनैकेन तल्लभ्यं त्यक्त्वाऽऽहारमुपस्थितम्॥ ७<br>त्यागो ह्यप्राप्तकामानां कामेभ्यो न तथा गुरुः।<br>यथा प्राप्तं परित्यज्य कामं कमललोचन॥ ८<br>श्रुत्वैतद् ब्रह्मणो वाक्यं दैत्यः प्राञ्जलिरब्रवीत्।<br>चिन्तयंस्तपसा युक्तो हृदि ब्रह्ममुखेरितम्॥ ९ | **ब्रह्माजीने कहा—**बेटा! तुम तो तपसे निवृत्त हो भोजन करने जा रहे थे, फिर तुम पुनः कठोर नियममें किस कारणसे तत्पर होना चाहते हो ? महाव्रतधारी दैत्यराज ! वह कारण मुझे बतलाओ। कमललोचन ! एक हजार वर्षतक निराहार रहनेका जो फल होता है, वह सामने उपस्थित आहारका त्याग कर देनेसे क्षणमात्रमें ही प्राप्त हो जाता है; क्योंकि अप्राप्त मनोरथवालोंका त्याग उतना महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता, जितना प्राप्त कामनावालेका त्याग वरिष्ठ होता है। ब्रह्माकी ऐसी बात सुनकर तपस्वी दैत्यराज वज्राङ्ग उस ब्रह्मवाणीका हृदयमें विचार करते हुए हाथ जोड़कर बोला ॥ ६–९ ॥ |
| वज्राङ्ग उवाच<br>उत्थितेन मया दृष्टा समाधानात् त्वदाज्ञया।<br>महिषी भीषिता दीना रुदती शाखिनस्तले॥ १०<br>सा मयोक्ता तु तन्वङ्गी दूयमानेन चेतसा।<br>किमेवं वर्तसे भीरु वद त्वं किं चिकीर्षसि॥ ११<br>इत्युक्ता सा मया देव प्रोवाच स्खलिताक्षरम्।<br>वाक्यं वाचस्पते भीता तन्वङ्गी हेतुसंहितम्॥ १२ | **वज्राङ्गने कहा—**भगवन् ! आपकी आज्ञासे समाधिसे विरत होनेपर मैंने देखा कि मेरी पटरानी वराङ्गी एक वृक्षके नीचे बैठी हुई दीनभावसे भयभीत होकर रो रही है। यह देखकर मेरा मन दुःखी हो गया। तब मैंने उस सुन्दरीसे पूछा—'भीरु! तुम क्यों ऐसी दशामें पड़ गयी हो ? मुझे बतलाओ तो सही, तुम क्या करना चाहती हो ?' वाणीके अधीश्वर देव ! मेरे ऐसा पूछनेपर भयभीत हुई सुन्दरी वराङ्गीने लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कारण बतलाते हुए कहा |
५४८ * मत्स्यपुराण *
| त्रासितास्म्यपविद्धास्मि कर्षिता पीडितास्मि च।<br>रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः॥ १३<br>दुःखस्यान्तमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता।<br>पुत्रं मे तारकं देहि ह्यस्माद् दुःखमहार्णवात्॥ १४<br>एवमुक्तस्तु संक्षुब्धस्तस्याः पुत्रार्थमुद्यतः।<br>तपो घोरं करिष्यामि जयाय त्रिदिवौकसाम्॥ १५<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवः पद्मगर्भोद्भवस्तदा।<br>उवाच दैत्यराजानं प्रसन्नश्चतुराननः॥ १६ | है कि—'नाथ! देवराज इन्द्रने निर्दय होकर मुझे अनाथ नारीकी तरह अनेक प्रकारसे डराया, अपमानित किया, घसीटा है और कष्ट पहुँचाया है। दुःखका अन्त न देखकर मैं प्राण-त्याग करनेको उद्यत हो गयी हूँ। इसलिये मुझे इस दुःखरूपी महासागरसे उद्धार करनेवाला पुत्र प्रदान कीजिये।' उसके ऐसा कहनेपर मेरा मन संक्षुब्ध हो उठा है। इसलिये मैं उसे पुत्र प्रदान करनेके लिये उद्यत हो देवताओंपर विजय पानेके लिये घोर तप करूँगा। उसकी यह बात सुनकर पद्मसम्भव चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उस दैत्यराजसे बोले॥ १०—१६॥ |
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| ब्रह्मोवाच<br>अलं ते तपसा वत्स मा क्लेशे दुस्तरे विश।<br>पुत्रस्ते तारको नाम भविष्यति महाबलः॥ १७ | ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारी तपस्या पूरी हो चुकी है। अब तुम उस दुस्तर क्लेशपूर्ण कार्यमें मत प्रविष्ट होओ। तुम्हें तारक नामका ऐसा महाबली पुत्र प्राप्त होगा, |
| देवसीमन्तिनीनां तु धम्मिल्लस्य विमोक्षणः।<br>इत्युक्तो दैत्यनाथस्तु प्रणिपत्य पितामहम्॥ १८ | जो देवाङ्गनाओंके केशकलापको खोल देनेवाला होगा (अर्थात् उन्हें विधवाकी स्थितिमें ला देगा)। ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दैत्यराज |
| आगत्यानन्दयामास महिषीं हर्षिताननः।<br>तौ दम्पती कृतार्थौ तु जग्मतुः स्वाश्रमं मुदा॥ १९ | वज्राङ्गका मुख हर्षसे खिल उठा। तब वह ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणिपात करके अपनी पटरानी वराङ्गीके पास आया और उसने (पुत्र-प्राप्तिके वरदानकी बात बतलाकर) उसे आनन्दित किया। तत्पश्चात् दोनों पति-पत्नी कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। |
| वज्राङ्गेनाहितं गर्भं वराङ्गी वरवर्णिनी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं च दधारोदर एव हि॥ २० | समयानुसार वज्राङ्गद्वारा स्थापित किये गये गर्भको सुन्दरी वराङ्गी पूरे एक हजार वर्षोंतक अपने उदरमें ही धारण किये रही। |
| ततो वर्षसहस्रान्ते वराङ्गी सुषुवे सुतम्।<br>जायमाने तु दैत्येन्द्रे तस्मिँल्लोकभयङ्करे॥ २१ | एक हजार वर्ष पूरा होनेपर वराङ्गीने पुत्र उत्पन्न किया। उस लोकभयंकर दैत्येन्द्रके जन्म लेते ही |
| चचाल सकला पृथ्वी समुद्राश्च चकम्मिरे।<br>चेलुर्महीधराः सर्वे ववुर्वाताश्च भीषणाः॥ २२ | सारी पृथ्वी डगमगा उठी अर्थात् भूकम्प आ गया, समुद्रोंमें ज्वार-भाटा उठने लगा, सभी पर्वत विचलित हो उठे, भयानक झंझावात बहने लगा। |
| जेपुर्जप्यं मुनिवरा नेदुर्व्यालमृगा अपि।<br>चन्द्रसूर्यौ जहुः कान्तिं सनीहारा दिशोऽभवन्॥ २३ | श्रेष्ठ मुनिगण शान्त्यर्थ जप करने लगे, सर्प तथा वन्य पशु आदि भी उच्च स्वरसे शब्द करने लगे, चन्द्रमा और सूर्यकी कान्ति फीकी पड़ गयी तथा दिशाओंमें कुहासा छा गया। |
| जाते महासुरे तस्मिन् सर्वे चापि महासुराः।<br>आजग्मुर्हर्षितास्तत्र तथा चासुरयोषितः॥ २४ | द्विजवरो! उस महासुरके जन्म लेनेपर सभी प्रधान असुर हर्षसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे। |
* अध्याय १४८ * ५४९
| जगृहर्षसमाविष्टा ननृतुश्चासुराङ्गनाः।<br>ततो महोत्सवो जातो दानवानां द्विजोत्तमाः॥ २५<br>विषण्णमनसो देवाः समहेन्द्रास्तदाभवन्।<br>वराङ्गी स्वसुतं दृष्ट्वा हर्षेणापूरिता तदा॥ २६<br>बहु मेने न देवेन्द्रविजयं तु तदैव सा।<br>जातमात्रस्तु दैत्येन्द्रस्तारकश्चण्डविक्रमः॥ २७<br>अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैः कुजम्भमहिषादिभिः।<br>सर्वासुरमहाराज्ये पृथिवीतुलनक्षमैः॥ २८<br>स तु प्राप्य महाराज्यं तारको मुनिसत्तमाः।<br>उवाच दानवश्रेष्ठान् युक्तियुक्तमिदं वचः॥ २९ | उनके साथ राक्षसियाँ भी थीं। हर्षसे फूली हुई उन असुराङ्गनाओंमें कुछ तो नाचने लगीं और कुछ गाने लगीं। इस प्रकार वहाँ दानवोंका महोत्सव प्रारम्भ हो गया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवताओंका मन खिन्न हो गया। उधर वराङ्गी अपने पुत्रका मुख देखकर हर्षसे भर गयी। उसी समय वह देवराज इन्द्रकी विजयको तुच्छ मानने लगी। प्रचण्ड पराक्रमी दैत्यराज तारक जन्म लेते ही पृथ्वीको भी उठा लेनेमें समर्थ कुजम्भ और महिष आदि सभी प्रधान असुरोंद्वारा सम्पूर्ण असुरोंके सम्राट्पदपर अभिषिक्त कर दिया गया। मुनिवरो! तब उस महान् राज्यका अधिकार पाकर तारक उन दानवश्रेष्ठोंसे ऐसा युक्तिसंगत वचन बोला— ॥ १७—२९ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने तारकोत्पत्तिर्नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकासुरोपाख्यानमें तारकोत्पत्ति नामक एक सौ संतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४७॥
एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुर-संग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन
| तारक उवाच<br>शृणुध्वमसुराः सर्वे वाक्यं मम महाबलाः।<br>श्रेयसे क्रियतां बुद्धिः सर्वैः कृत्यस्य संविधौ॥ १ | **तारकने कहा—**महाबली असुरो! आपलोग ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनें। आप सभी लोगोंको इस कार्यकी तैयारीमें सर्वप्रथम अपने कल्याणके लिये विचार कर लेना चाहिये। |
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| वंशक्षयकरा देवाः सर्वेषामेव दानवाः।<br>अस्माकं जातिधर्मो वै विरूढं वैरमक्षयम्॥ २ | दानववृन्द! देवतालोग हम सभीके कुलका (सदा) संहार करते रहते हैं, इस कारण उनके साथ विरोध करना हमलोगोंका जातिगत धर्म है और उनके साथ हमारा (सदा) अक्षय वैर बँधा रहता है। |
| वयमद्य गमिष्यामः सुराणां निग्रहाय तु।<br>स्वबाहुबलमाश्रित्य सर्व एवमसंशयः॥ ३ | हम सभी लोग अपने बाहुबलका आश्रय लेकर आज ही उन देवताओंका दमन करनेके लिये चलेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है, |
| किंतु नातपसा युक्तो मन्येऽहं सुरसंगमम्।<br>अहमादौ करिष्यामि तपो घोरं दितेः सुताः॥ ४ | किंतु दिति-नन्दनो! तपोबलसे सम्पन्न हुए बिना मैं देवताओंके साथ लोहा लेना उचित नहीं समझता, अतः मैं पहले घोर तपस्या करूँगा, तत्पश्चात् हमलोग |
१४९- देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ
| ५५० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| ततः सुरान् विजेष्यामो भोक्ष्यामोऽथ जगत्त्रयम्।<br>स्थिरोपायो हि पुरुषः स्थिरश्रीरपि जायते॥ ५<br><br>रक्षितुं नैव शक्नोति चपलश्चपलां श्रियम्।<br>तच्छ्रुत्वा दानवाः सर्वे वाक्यं तस्यासुरस्य तु॥ ६<br><br>साधु साध्वित्यवोचंस्ते तत्र दैत्याः सविस्मयाः।<br>सोऽगच्छत् पारियात्रस्य गिरेः कन्दरमुत्तमम्॥ ७<br><br>सर्वर्तुकुसुमाकीर्णं नानौषधिविदीपितम्।<br>नानाधातुरसस्त्रावचित्रं नानागुहागृहम्॥ ८<br><br>गहनैः सर्वतो गूढं चित्रकल्पद्रुमाश्रयम्।<br>अनेकाकारबहुलं पृथक् पक्षिकुलाकुलम्॥ ९<br><br>नानाप्रस्रवणोपेतं नानाविधजलाशयम्।<br>प्राप्य तत्कन्दरं दैत्यश्चचार विपुलं तपः॥ १० | देवताओंको पराजित करेंगे और त्रिलोकीके सुखका उपभोग करेंगे; क्योंकि सुदृढ़ उपाय करनेवाला पुरुष ही अनपायिनी लक्ष्मीका पात्र होता है। चञ्चल बुद्धिवाला पुरुष चञ्चला लक्ष्मीकी रक्षा नहीं कर सकता। तारकासुरके उस कथनको सुनकर वहाँ उपस्थित सभी दानव और दैत्य आश्चर्यचकित हो उठे और वे सभी 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहने लगे। तत्पश्चात् तारकासुर (तपस्या करनेके लिये) पारियात्र पर्वत (अरावली एवं विंध्यका पश्चिम भाग)-की उत्तम कन्दराके पास पहुँचा। वह पर्वत सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले पुष्पोंसे व्याप्त, अनेक प्रकारकी ओषधियोंसे उद्दीप्त, विविध धातुओंके रसोंके चूते रहनेसे चित्र-विचित्र, अनेकों गुहारूपी गृहोंसे युक्त, सब ओरसे घने वृक्षोंसे घिरा, रंग-बिरंगे कल्पवृक्षोंसे आच्छादित और अनेकों प्रकारके आकारवाले बहुत-से पक्षि-समूहोंसे सर्वत्र व्याप्त था। उस पर्वतसे अनेकों झरने झर रहे थे तथा वह अनेकविध जलाशयोंसे सुशोभित था। उसकी कन्दरामें जाकर तारक दैत्य घोर तपस्यामें संलग्न हो गया॥ १—१०॥ |
| निराहारः पञ्चतपाः पत्रभुग् वारिभोजनः।<br>शतं शतं समानां तु तपांस्येतानि सोऽकरोत्॥ ११<br><br>ततः स्वदेहादुत्कृत्य कर्षं कर्षं दिने दिने।<br>मांसत्याग्नौ जुहावासौ ततो निर्मांसतां गतः॥ १२<br><br>तस्मिन् निर्मांसतां याते तपोराशित्वमागते।<br>जज्वलुः सर्वभूतानि तेजसा तस्य सर्वतः॥ १३<br><br>उद्विग्नाश्च सुराः सर्वे तपसा तस्य भीषिताः।<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा परमं तोषमागतः॥ १४<br><br>तारकस्य वरं दातुं जगाम त्रिदशालयात्।<br>प्राप्य तं शैलराजानं स गिरेः कन्दरस्थितम्।<br>उवाच तारकं देवो गिरा मधुरया युतः॥ १५ | पहले वह सौ-सौ वर्षोंके क्रमसे निराहार रहकर, फिर पञ्चाग्नि तापकर, पुनः पत्ते खाकर तत्पश्चात् केवल जल पीकर तपस्या करता रहा। इसके बाद उसने प्रतिदिन अपने शरीरसे सोलह माशा मांस काट-काटकर अग्निमें हवन करना प्रारम्भ किया, जिससे उसका शरीर मांसरहित हो गया। इस प्रकार उसके मांसरहित हो जानेपर वह तपःपुञ्ज-सा दीख पड़ने लगा। उसके तेजसे चारों ओर सभी प्राणी संतप्त हो उठे। समस्त देवगण उसकी तपस्यासे भयभीत हो उद्विग्न हो गये। इसी अवसरपर ब्रह्मा उसकी भीषण तपस्यासे परम प्रसन्न हो गये। तब वे तारकासुरको वर प्रदान करनेके लिये स्वर्गलोकसे चल पड़े और उस पर्वतराज पारियात्रपर जा पहुँचे। वहाँ वे देवाधिदेव उस पर्वतकी कन्दरामें स्थित तारकके निकट जाकर उससे मधुर वाणीमें बोले॥ ११—१५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>पुत्रांलं तपसा तेऽस्तु नास्त्यसाध्यं तवाधुना।<br>वरं वृणीष्व रुचिरं यत् ते मनसि वर्तते॥ १६ | ब्रह्माजीने कहा—पुत्र! तुम्हें अब तप करनेकी आवश्यकता नहीं, वह पूरी हो चुकी। अब तुम्हारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। अब तुम्हारे मनमें जो रुचे, वह उत्तम वर माँग लो। |
| * अध्याय १४८ * | ५५१ |
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| इत्युक्तस्तारको दैत्यः प्रणम्यात्मभुवं विभुम्।<br>उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणतः पृथुविक्रमः॥ १७<br><br>तारक उवाच<br>देव भूतमनोवास वेत्सि जन्तुविचेष्टितम्।<br>कृतप्रतिकृताकाङ्क्षी जिगीषुः प्रायशो जनः॥ १८<br><br>वयं च जातिधर्मेण कृतवैराः सहामरैः।<br>तैश्च निःशेषिता दैत्याः क्रूरैः संत्यज्य धर्मिताम्।<br>तेषामहं समुद्धर्त्ता भवेयमिति मे मतिः॥ १९<br><br>अवध्यः सर्वभूतानामस्त्राणां च महौजसाम्।<br>स्यामहं परमो ह्येष वरो मम हृदि स्थितः॥ २०<br><br>एतन्मे देहि देवेश नान्यो मे रोचते वरः।<br>तमुवाच ततो दैत्यं विरिञ्चिः सुरनायकः॥ २१<br><br>न युज्यन्ते विना मृत्युं देहिनो दैत्यसत्तम।<br>यतस्ततोऽपि वरय मृत्युं यस्मान्न शङ्कसे॥ २२<br><br>ततः सञ्चिन्त्य दैत्येन्द्रः शिशोर्वै सप्तवासरात्।<br>वव्रे महासुरो मृत्युमवलेपनमोहितः॥ २३<br><br>ब्रह्मा चास्मै वरं दत्त्वा यत्किञ्चिन्मनसेप्सितम्।<br>जगाम त्रिदिवं देवो दैत्योऽपि स्वकमालयम्॥ २४<br><br>उत्तीर्णं तपसस्तं तु दैत्यं दैत्येश्वरास्तथा।<br>परिबब्रुः सहस्राक्षं दिवि देवगणा यथा॥ २५<br><br>तस्मिन् महति राज्यस्थे तारके दैत्यनन्दने।<br>ऋतवो मूर्तिमन्तश्च स्वकालगुणबृंहिताः॥ २६<br><br>अभवन् किंकरास्तस्य लोकपालाश्च सर्वशः।<br>कान्तिर्द्युतिर्धृतिर्मेधा श्रीरवेक्ष्य च दानवम्॥ २७<br><br>परिबवुर्गुणाकीर्णा निश्छिद्राः सर्व एव हि।<br>कालागुरुविलिप्ताङ्गं महामुकुटभूषणम्॥ २८ | ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी दैत्यराज तारकने स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और विनम्रभावसे हाथ जोड़कर कहा॥ १६-१७॥<br><br>तारक बोला—सभी प्राणियोंके मनमें निवास करनेवाले देव! आप सभी जीवोंकी चेष्टाको जानते हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य अपने शत्रुसे बदला लेनेकी भावनासे उसे जीतनेका इच्छुक रहता है। हमलोगोंका जातिधर्मानुसार देवताओंके साथ वैर है। उन क्रूरकर्मी देवताओंने धर्मको तिलाञ्जलि देकर प्रायः दैत्योंको निःशेष कर दिया है। मैं उनका उन्मूलन करनेवाला हो जाऊँ—ऐसा मेरा विचार है। साथ ही मैं समस्त प्राणियों तथा परम तेजस्वी अस्त्रोंद्वारा अवध्य हो जाऊँ—यही उत्तम वर मेरे हृदयमें स्थित है। देवेश! मुझे यही वर दीजिये। मुझे किसी अन्य वरकी अभिलाषा नहीं है। यह सुनकर सुरनायक ब्रह्मा उस दैत्यराजसे बोले—'दैत्यश्रेष्ठ! कोई भी देहधारी जीव मृत्युसे नहीं बच सकता, अर्थात् जो जन्म धारण करता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है, इसलिये जिससे तुम्हें मृत्युकी आशङ्का न हो, उसीसे अपनी मृत्युका वर माँग लो।' तब गर्वसे मूढ़ हुए महासुर दैत्यराज तारकने भलीभाँति सोच-विचारकर सात दिनके बालकके हाथसे अपनी मृत्युका वर माँगा। तदनन्तर देवाधिदेव ब्रह्मा उसके मनके अभिलाषानुसार उसे वर देकर स्वर्गलोकको चले गये। इधर दैत्यराज तारक भी अपने निवासस्थानको लौट आया। तब सभी दैत्याधिपति तपस्याको पूर्ण करके लौटे हुए उस दैत्यराज तारकको घेरकर इस प्रकार बातें करने लगे, जैसे स्वर्गलोकमें देवगण इन्द्रको घेरकर बातें करते हैं॥ १८-२५॥<br><br>दैत्योंके उस महान् साम्राज्यपर दैत्यनन्दन तारकके अवस्थित होनेपर छहों ऋतुएँ शरीर धारण कर अपने-अपने कालके अनुसार सभी गुणोंसे युक्त हो उपस्थित हुईं। सभी लोकपाल उसका किंकर बनकर रहने लगे। कान्ति, द्युति, धृति, मेधा और श्री—ये सभी देवियाँ गुणयुक्त होकर निष्कपट भावसे उस दानवराजकी ओर देखती हुई उसे घेरकर खड़ी रहती थीं। जब वह दैत्यराज शरीरमें काला अगुरुका लेप कर बहुमूल्य मुकुटसे विभूषित हो |
छोड़ देना
| ५५२ | * मत्स्यपुराण * |
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| रुचिराङ्गदनद्धाङ्गं महासिंहासने स्थितम्।<br>वीजयन्त्यप्सरःश्रेष्ठा भृशं मुञ्चन्ति नैव ताः॥ २९<br><br>चन्द्राकौ दीपमार्गेषु व्यजनेषु च मारुतः।<br>कृतान्तोऽग्रेसरस्तस्य बभूवुर्मुुनिसत्तमाः॥ ३०<br><br>एवं प्रयाति काले तु वितते तारकासुरः।<br>बभाषे सचिवान् दैत्यः प्रभूतवरदर्पितः॥ ३१<br><br>तारक उवाच | और मनोहर बाजूबंद बाँधकर विशाल सिंहासनपर बैठता तब श्रेष्ठ अप्सराएँ उसपर निरन्तर पंखा झलती रहती थीं और क्षणमात्रके लिये भी उससे पृथक् नहीं होती थीं। मुनिवरो! उसके महलमें चन्द्रमा और सूर्य दीपके स्थानपर, वायुदेव पंखोंके स्थानपर तथा कृतान्त उसके अग्रेसरके स्थानपर नियुक्त हुए। इस प्रकार (सुखपूर्वक) बहुत-सा समय व्यतीत हो जानेपर एक दिन उत्कृष्ट वरप्राप्तिसे गर्वित हुआ दैत्यराज तारकासुर अपने मन्त्रियोंसे बोला॥ २६-३१॥<br><br>तारकने कहा— अमात्यो! स्वर्गलोकपर आक्रमण | | राज्येन कारणं किं मे त्वनाक्रम्य त्रिविष्टपम्।<br>अनिर्याप्य सुरैर्वैरं का शान्तिर्हृदये मम॥ ३२ | किये बिना मुझे इस राज्यसे क्या लाभ? देवताओंसे वैरका बदला चुकाये बिना मेरे हृदयमें शान्ति कहाँ? | | भुञ्जतेऽद्यापि यज्ञांशानमरा नाक एव हि।<br>विष्णुः श्रियं न जहाति तिष्ठते च गतभ्रमः॥ ३३ | अभी भी देवगण स्वर्गलोकमें यज्ञांशोंका उपभोग कर रहे हैं। विष्णु लक्ष्मीको नहीं छोड़ रहा है और निर्भय होकर स्थित है। | | स्वस्थाभिः स्वर्गनारीभिः पीड्यन्तेऽमरवल्लभाः।<br>सोत्पला मदिरामोदा दिवि क्रीडायनेषु च॥ ३४ | स्वर्गलोकमें क्रीडागारोंमें मदिराकी गन्धसे युक्त दुबले-पतले शरीरवाले श्रेष्ठ देवगण सुन्दरी देवाङ्गनाओंद्वारा आलिङ्गित किये जा रहे हैं। | | लब्ध्वा जन्म न यः कश्चिद् घटयेत् पौरुषं नरः।<br>जन्म तस्य वृथाभूतमजन्मा तु विशिष्यते॥ ३५ | कोई भी व्यक्ति यदि जन्म लेकर अपना पुरुषार्थ नहीं प्रकट करता तो उसका जन्म लेना व्यर्थ है, उससे तो जन्म न लेनेवाला ही विशिष्ट है। | | मातापितृभ्यां न करोति कामान्<br>बन्धूनशोकान् न करोति यो वा।<br>कीर्तिं हि वा चार्जंयते हिमाभां<br>पुमान् स जातोऽपि मृतो मतं मे॥ ३६ | जो पुरुष माता-पिताकी कामनाओंको पूर्ण नहीं करता, अपने बन्धुओंका शोक नष्ट नहीं करता और हिमके समान उज्ज्वल कीर्तिका अर्जन नहीं करता, वह जन्म लेकर भी मरे हुएके समान है—ऐसा मेरा विचार है। | | तस्माज्जयायामरपुङ्गवानां<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीहरणाय शीघ्रम्।<br>संयोज्यतां मे रथमष्टचक्रं<br>बलं च मे दुर्जयदैत्यचक्रम्।<br>ध्वजं च मे काञ्चनपट्टनद्धं<br>छत्रं च मे मौक्तिकजालबद्धम्॥ ३७ | इसलिये श्रेष्ठ देवताओंको जीतने तथा त्रिलोकीकी लक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये शीघ्र ही मेरा आठ पहियेवाला रथ, अजेय दैत्य-सैन्यसमूह, स्वर्णपत्र-जटित ध्वज और मुक्ताकी लड़ियोंसे सुशोभित छत्र तैयार किया जाय॥ ३२-३७॥ | | तारकस्य वचः श्रुत्वा ग्रसनो नाम दानवः।<br>सेनानीर्दैत्यराजस्य तथा चक्रे बलान्वितः॥ ३८ | दैत्यराज तारककी बात सुनकर उसके सेनानायक महाबली ग्रसन नामक दानवने उसके आज्ञानुसार |
| * अध्याय १४८ * | ५५३ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहत्य भेरीं गम्भीरां दैत्यानाहूय सत्वरः।<br>तुरगाणां सहस्रेण चक्राष्टकविभूषितम्॥ ३९<br><br>शुक्लाम्बरपरिष्कारं चतुर्योजनविस्तृतम्।<br>नानाक्रीडागृहयुतं गीतवाद्यमनोहरम्॥ ४०<br><br>विमानमिव देवस्य सुरभर्तुः शतक्रतोः।<br>दशकोटीश्वरा दैत्या दैत्यास्ते चण्डविक्रमाः॥ ४१<br><br>तेषामग्रेसरो जम्भः कुजम्भोऽन्तरस्ततः।<br>महिषः कुञ्जरो मेघः कालनेमिर्निमिस्तथा॥ ४२<br><br>मथनो जम्भकः शुम्भो दैत्येन्द्रा दश नायकाः।<br>अन्येऽपि शतशस्तस्य पृथिवीदलनक्षमाः॥ ४३<br><br>दैत्येन्द्रा गिरिवर्ष्माणः सन्ति चण्डपराक्रमाः।<br>नानायुधप्रहरणा नानाशास्त्रास्त्रपारगाः॥ ४४<br><br>तारकस्याभवत् केतू रौद्रः कनकभूषणः।<br>केतुना मकरेणापि सेनानीर्ग्रसनोऽरिहा॥ ४५<br><br>पैशाचं यस्य वदनं जम्भस्यासीदयोमयम्।<br>खरं विधूतलाङ्गूलं कुजम्भस्याभवद्ध्वजे॥ ४६<br><br>महिषस्य तु गोमायुं केतोर्हैमं तदाभवत्।<br>ध्वाङ्क्षं ध्वजे तु शुम्भस्य कृष्णायोमयमुच्छ्रितम्॥ ४७ | कार्य करना आरम्भ किया। उसने तुरंत ही गम्भीर शब्द करनेवाली भेरी बजाकर दैत्योंको बुलाया। फिर आठ पहियोंसे विभूषित रथमें एक हजार घोड़े जोत दिये गये। (वह उसपर सवार हुआ।) वह रथ चार योजन विस्तारवाला और अनेकों क्रीडागृहोंसे युक्त था। उसपर श्वेत वस्त्रका आच्छादन पड़ा हुआ था तथा वह गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे मनोहर लग रहा था। उस समय वह ऐसा दीख रहा था, मानो देवराज इन्द्रदेवका विमान हो। उस समय दस करोड़ दैत्याधिपति उपस्थित थे, वे सभी दैत्य प्रचण्ड पराक्रमी थे। उनका अगुआ जम्भ था। इसके बाद कुजम्भ, महिष, कुंजर, मेघ, कालनेमि, निमि, मथन, जम्भक और शुम्भ नामक दस दैत्येन्द्र सेनानायक थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों दैत्य थे जो पृथ्वीका मर्दन करनेमें समर्थ थे। ये सभी दैत्येन्द्र पर्वतके समान विशाल शरीरवाले, प्रचण्ड पराक्रमी, नाना प्रकारके आयुधोंका प्रयोग करनेमें निपुण और अनेकविध शस्त्रास्त्रोंकी प्रयोगविधिमें पारंगत थे। तारकासुरका स्वर्णभूषित ध्वज अत्यन्त भयंकर था। शत्रु का विनाश करनेवाले सेनापति ग्रसनका ध्वज मकरके आकारसे युक्त था। जम्भका ध्वज लौहनिर्मित था और उसपर पिशाचके मुखका चिह्न बना हुआ था। कुजम्भके ध्वजपर हिलती हुई पूँछवाला गधा अङ्कित था। महिषके ध्वजपर स्वर्णनिर्मित शृगालका चित्र था। शुम्भका ध्वज काले लोहेका बना हुआ अत्यन्त ऊँचा था और उसपर फौलादका बना काकका आकार चित्रित था॥ ३८—४७॥ |
| अनेकाकारविन्यासाश्चान्येषां तु ध्वजास्तथा।<br>शतेन शीघ्रवेगाणां व्याघ्राणां हेममालिनाम्॥ ४८<br><br>ग्रसनस्य रथो युक्तो किङ्किणीजालमालिनाम्।<br>शतेनापि च सिंहानां रथो जम्भस्य दुर्जयः॥ ४९<br><br>कुजम्भस्य रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः।<br>रथस्तु महिषस्योष्ट्रैर्गजस्य तु तुरङ्गमैः॥ ५० | इसी प्रकार अन्य दैत्योंके ध्वजोंपर भी अनेकों प्रकारके आकारका विन्यास किया गया था। ग्रसनके रथमें सौ शीघ्रगामी व्याघ्र जुते हुए थे, जिनके गलेमें सोनेकी मालाएँ पड़ी थीं और जो क्षुद्रघंटिकाओंसे सुशोभित थे। जम्भका दुर्जय रथ भी सौ सिंहोंद्वारा खींचा जा रहा था। कुजम्भका रथ पिशाच-सदृश मुखवाले गधोंसे युक्त था। महिषका रथ ऊँटों, कुंजरका घोड़ों, मेघका |
| ५५४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मेघस्य द्वीपिभिर्भीमैः कुञ्जरैः कालनेमिनः।<br>पर्वताभैः समारूढो निर्मिर्मतैर्महागजैः॥ ५१<br><br>चतुर्दन्तैर्गन्धवद्भिः शिक्षितैर्मेघभैरवैः।<br>शतहस्तायतैः कृष्णैः तुरङ्गैर्हेमभूषणैः॥ ५२<br><br>सितचामरजालेन शोभिते दक्षिणां दिशम्।<br>सितचन्दनचार्वाङ्गो नानापुष्पस्रजोज्ज्वलः॥ ५३<br><br>मथनो नाम दैत्येन्द्रः पाशहस्तो व्यराजत।<br>जम्भकः किङ्किणीजालमालमुष्ट्रं समास्थितः॥ ५४<br><br>कालशुक्लमहामेषमारूढः शुम्भदानवः।<br>अन्येऽपि दानवा वीरा नानावाहनगामिनः॥ ५५ | चीतों और कालनेमिका भयंकर हाथियोंसे संयुक्त था। दैत्यनायक निमि एक ऐसे रथपर सवार था जिसमें मतवाले गजराज जुते हुए थे, जो पर्वतके समान विशालकाय और चार दाँतोंसे युक्त थे, जिनके गण्डस्थलोंसे मदकी धारा बह रही थी, जो मेघ-सदृश भयंकर गर्जना करनेवाले और युद्धकलामें शिक्षित थे। जिसके शरीरमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था और जो अनेकों प्रकारके उज्ज्वल पुष्पोंकी मालाओंसे सुशोभित था, वह मथन नामक दैत्येन्द्र हाथमें पाश लिये हुए उस सैन्यसमूहकी दक्षिण दिशामें स्थित श्वेत चामरोंसे विभूषित रथपर शोभा पा रहा था। उसके रथमें सौ हाथ लम्बे शरीरवाले स्वर्णाभरणोंसे विभूषित काले रंगके घोड़े जुते हुए थे। जम्भक क्षुद्र घंटिकाओंसे सुशोभित ऊँटपर सवार था। शुम्भ नामक दानव कालके समान भयंकर एवं श्वेत वर्णवाले एक विशालकाय मेषपर आरूढ था। दूसरे भी दानववीर नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर चल रहे थे॥ ४८—५५॥ |
| प्रचण्डचित्रकर्माणः कुण्डलोष्णीषभूषणाः।<br>नानाविधोत्तरासङ्गा नानामाल्यविभूषणाः॥ ५६<br><br>नानासुगन्धिगन्धाढ्या नानाबन्दिजनस्तुताः।<br>नानावाद्यपरिस्पन्दाश्चाग्रेसरमहारथाः ॥ ५७<br><br>नानाशौर्य कथासक्तास्तस्मिन् सैन्ये महासुराः।<br>तद्बलं दैत्यसिंहस्य भीमरूपं व्यजायत॥ ५८<br><br>प्रमत्तचण्डमातङ्गतुरङ्ग रथसङ्कुलम्।<br>प्रतस्थेऽमरयुद्धाय बहुपत्तिपताकिनम्॥ ५९ | वे सभी दैत्य अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्म करनेवाले, कुण्डल और पगड़ीसे विभूषित, अनेक प्रकारके दुपट्टोंसे सुशोभित, नाना प्रकारकी मालाओंसे सुसज्जित और अनेकविध सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित थे। उनके आगे-आगे वंदीगण स्तुति-गान कर रहे थे। उनके साथ अनेकों प्रकारके युद्धके बाजे बज रहे थे। और वे सभी अग्रेसर महारथी अनेकविध शृङ्गारसे सुसज्जित थे। उस सेनामें प्रधान-प्रधान असुर पराक्रमपूर्ण कथाओंके कहने-सुननेमें आसक्त थे। दैत्यसिंह तारकासुरकी वह सेना मतवाले एवं पराक्रमी हाथियों, घोड़ों और रथोंसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त भयंकर दीख रही थी। उसमें ध्वजाएँ फहरा रही थीं और बहुत-से पैदल सैनिक भी थे। इस प्रकार वह सेना देवताओंसे टक्कर लेनेके लिये प्रस्थित हुई। |
| एतस्मिन्नन्तरे वायुर्देवदूतोऽम्बरालये।<br>दृष्ट्वा स दानवबलं जगामेन्द्रस्य शंसितुम्॥ ६०<br><br>स गत्वा तु सभां दिव्यां महेन्द्रस्य महात्मनः।<br>शशंस मध्ये देवानां तत्कार्यं समुपस्थितम्॥ ६१ | इसी अवसरपर देवदूत वायु दानवोंकी उस सेनाको प्रस्थित होते हुए देखकर इन्द्रको सूचित करनेके लिये स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने महात्मा महेन्द्रकी दिव्य सभामें जाकर देवताओंके बीच उस उपस्थित हुए कार्यकी सूचना दी। |
* अध्याय १४८ * ५५५
| तच्छ्रुत्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः।<br>बृहस्पतिमुवाचेदं वाक्यं काले महाभुजः॥ ६२<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>सम्प्राप्नोति विमर्दोऽयं देवानां दानवैः सह।<br>कार्यं किमत्र तद् ब्रूहि नीत्युपायसमन्वितम्॥ ६३<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महेन्द्रस्य गिरांपतिः।<br>इत्युवाच महाभागो बृहस्पतिरुदारधीः॥ ६४<br><br>सामपूर्वा स्मृता नीतिश्चतुरङ्गां पताकिनीम्।<br>जिगीषतां सुरश्रेष्ठ स्थितिरैषा सनातनी॥ ६५<br><br>साम भेदस्तथा दानं दण्डश्चाङ्गचतुष्टयम्।<br>नीतौ क्रमाद्देशकालरिपियोग्यक्रमोदिदम्॥ ६६<br><br>साम दैत्येषु नैवास्ति यतस्ते लब्धसंश्रयाः।<br>जातिधर्मेण वाभेद्या दानं प्राप्तश्रिये च किम्॥ ६७<br><br>एकोऽभ्युपायो दण्डोऽत्र भवतां यदि रोचते।<br>दुर्जेनेषु कृतं साम महद्याति च बन्ध्यताम्॥ ६८<br><br>भयादिति व्यवस्यन्ति क्रूराः साम महात्मनाम्।<br>ऋजुतामार्यबुद्धित्वं दयानीतिव्यतिक्रमम्॥ ६९<br><br>मन्यन्ते दुर्जना नित्यं साम चापि भयोदयात्।<br>तस्माद् दुर्जनमाक्रान्तुं श्रेयान् पौरुषसंश्रयः॥ ७०<br><br>आक्रान्ते तु क्रिया युक्ता सतामेतन्महाव्रतम्।<br>दुर्जनः सुजनत्वाय कल्पते न कदाचन॥ ७१<br><br>सुजनोऽपि स्वभावस्य त्यागं वा चेत्कदाचन।<br>एवं मे बुध्यते बुद्धिर्भवन्तोऽत्राध्यवस्यताम्॥ ७२<br><br>एवमुक्तः सहस्त्राक्ष एवमेवेत्युवाच तम्।<br>कर्तव्यतां स संचिन्त्य प्रोवाचामरसंसदि॥ ७३ | उसे सुनकर उस समय महाबाहु देवराज इन्द्रने पहले तो अपनी आँखें बंद कर लीं, फिर वे बृहस्पतिसे इस प्रकार बोले॥ ५६—६२॥<br><br>इन्द्रने कहा—गुरुदेव! देवताओंका दानवोंके साथ यह अत्यन्त भयंकर संघर्ष आ पहुँचा है। अब इस विषयमें क्या करना चाहिये, उपायसहित वह नीति बतलाइये। इन्द्रके इस वचनको सुनकर वाणीके अधीश्वर उदार बुद्धिवाले महान् भाग्यशाली बृहस्पति इस प्रकार बोले—'सुरश्रेष्ठ! (इस प्रकारकी) चतुरंगिणी सेनापर विजय पानेकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सामपूर्वक नीति बतलायी गयी है—यही सनातनी स्थिति है। नीतिके साम, भेद, दान और दण्ड—ये चार अङ्ग हैं। राजनीतिके प्रयोगमें क्रमशः देश, काल और शत्रु की योग्यता आदिका क्रम देखना चाहिये। इनमें दैत्योंपर सामनीतिका प्रयोग तो हो नहीं सकता; क्योंकि उन्हें आश्रय प्राप्त हो चुका है (वे मदमत्त हैं), जातिधर्मके अनुसार भेदनीतिका प्रयोग करके उनमें फूट भी नहीं डाला जा सकता तथा जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त है, उन्हें दान देनेसे भी क्या लाभ होगा? अतः इनपर एकमात्र दण्डका ही उपाय उपयुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि आपको मेरी बात रुचती हो तो इसीका अवलम्बन कीजिये; क्योंकि दुर्जनोंके साथ की गयी सामनीति एकदम निरर्थक होती है। क्रूर लोग महात्माओं द्वारा प्रयुक्त की गयी सामनीतिको भयवश की हुई मानते हैं, अतः उनके साथ की गयी सरलता, उदारबुद्धिका प्रयोग और दयानीतिका विपरीत परिणाम होता है। दुर्जनलोग सामनीतिको भी सदा भयभीत होनेके कारण प्रयुक्त की हुई मानते हैं। इसलिये दुर्जनोंपर आक्रमण करनेके लिये पुरुषार्थका ही आश्रय लेना श्रेयस्कर है। दुर्जनोंके आक्रान्त हो जानेपर ही उनपर प्रयुक्त की हुई क्रिया फलवती होती है। यह सत्पुरुषोंका महान् व्रत है। सुजन कभी (कुसङ्गवश) अपने उत्तम स्वभावका त्याग करनेकी इच्छा कर सकता है, परंतु दुर्जन कभी भी सुजन नहीं हो सकता। मेरी बुद्धिमें तो ऐसा ही आ रहा है, अब आपलोग इस विषयमें जैसा विचार करें। इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा—'ऐसा ही होगा।' फिर वे अपने कर्तव्यके विषयमें भलीभाँति सोच-विचार कर उस देवसभामें बोले॥ ६३-७३॥ |
| ५५६ | * मत्स्यपुराण * |
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| इन्द्र उवाच<br><br>सावधानेन मे वाचं शृणुध्वं नाकवासिनः।<br>भवन्तो यज्ञभोक्तारस्तुष्टात्मानोऽतिसात्त्विकाः ॥ ७४<br><br>स्वे महिम्नि स्थिता नित्यं जगतः परिपालकाः।<br>भवतश्चानिमित्तेन बाधन्ते दानवेश्वराः ॥ ७५<br><br>तेषां सामादि नैवास्ति दण्ड एव विधीयताम्।<br>क्रियतां समरोद्योगः सैन्यं संयुज्यतां मम ॥ ७६<br><br>आधीयन्तां च शस्त्राणि पूज्यन्तामस्त्रदेवताः।<br>वाहनानि च यानानि योजयन्तु सहामराः ॥ ७७<br><br>यमं सेनापतिं कृत्वा शीघ्रमेवं दिवौकसः।<br>इत्युक्ताः समनह्यन्त देवानां ये प्रधानतः ॥ ७८<br><br>वाजिनामयुतेनाजौ हेमघण्टापरिष्कृतम्।<br>नानाश्चर्यगुणोपेतं सम्प्राप्तं सर्वदैवतैः ॥ ७९<br><br>रथं मातलिना क्लृप्तं देवराजस्य दुर्जयम्।<br>यमो महिषमास्थाय सेनाग्रे समवर्तत ॥ ८०<br><br>चण्डकिङ्करवृन्देन सर्वतः परिवारितः।<br>कल्पकालोद्धतज्वालापूरिताम्बरलोचनः ॥ ८१<br><br>हुताशनश्छागरूढः शक्तिहस्तो व्यवस्थितः।<br>पवनोऽङ्कुशपाणिस्तु विस्तारितमहाजवः ॥ ८२<br><br>भुजगेन्द्र समारूढो जलेशो भगवान् स्वयम्।<br>नरयुक्तरथे देवो राक्षसेशो वियच्चरः ॥ ८३<br><br>तीक्ष्णखड्गयुतो भीमः समरे समवस्थितः।<br>महासिंहरवो देवो धनाध्यक्षो गदायुधः ॥ ८४ | इन्द्रने कहा—स्वर्गवासियो ! आपलोग सावधानीपूर्वक मेरी बात सुनें। आपलोग यज्ञके भोक्ता, संतुष्ट आत्मावाले, अत्यन्त सात्त्विक, अपनी महिमामें स्थित और नित्य जगत्का पालन करनेवाले हैं, तथापि दानवेश्वरगण अकारण ही आपलोगोंको पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। उनपर साम आदि तीन नीतियोंके प्रयोगसे कोई लाभ है नहीं, अतः दण्डनीतिका ही विधान करना चाहिये। इसलिये अब आपलोग युद्धकी तैयारी कीजिये और मेरी सेना सुसज्जित की जाय। देवगण! आपलोग संगठित होकर शस्त्रोंको धारण कीजिये, अस्त्र-देवताओंकी पूजा कीजिये और सवारियोंको सुसज्जित करके रथोंको जोत दीजिये।<br><br>इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवताओंमें जो प्रधान देव थे, वे लोग शीघ्र ही यमराजको सेनापतिके पदपर नियुक्त कर सेनाको संगठित करनेमें जुट गये। उस युद्धमें समस्त देवताओंके साथ दस हजार घोड़े सजाये गये, जो नाना प्रकारके आश्चर्ययुक्त गुणोंसे युक्त थे तथा जिनके गलेमें सोनेके घण्टे शोभा पा रहे थे। मातलिने देवराजके दुर्जय रथको सजाकर तैयार किया। यमराज अपने महिषपर सवार होकर सेनाके अग्रभागमें स्थित हुए। उस समय उनके नेत्र महाप्रलयके समय प्रचण्ड ज्वालासे धधकते हुए आकाशकी तरह धधक रहे थे और वे चारों ओरसे प्रचण्ड पराक्रमी किंकरोंसे घिरे हुए थे। अग्निदेव हाथमें शक्ति लिये हुए छागपर आरूढ हो उपस्थित हुए। अपने महान् वेगका विस्तार करनेवाले पवनदेवके हाथमें अङ्कुश शोभा पा रहा था। स्वयं भगवान् वरुण भुजगेन्द्रपर सवार थे। जो राक्षसोंके अधीश्वर, आकाशचारी और भयंकर रूपवाले हैं, जिनके हाथमें तेज तलवार शोभा पा रही थी, गदा जिनका आयुध है, जो सिंहके समान भयंकर रूपसे दहाड़नेवाले हैं, वे धनाध्यक्ष देवाधिदेव कुबेर पालकीपर बैठकर समरमें उपस्थित हुए॥ ७४-८४॥ | | चन्द्रादित्यावश्विनौ च चतुरङ्गबलान्वितौ।<br>राजभिः सहितास्तस्थुर्गन्धर्वा हेमभूषणाः ॥ ८५<br><br>हेमपीठोत्तरासङ्गाश्चित्रवर्मरथायुधाः ।<br>नाकपृष्ठशिखण्डास्तु वैडूर्य्यमकरध्वजाः ॥ ८६ | चतुरङ्गिणी सेनाके साथ चन्द्रमा, सूर्य और दोनों अश्विनीकुमार भी सम्मिलित हुए। स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित गन्धर्वगण अपने अधिपतियोंके साथ उपस्थित हुए। उनके आसन स्वर्णनिर्मित थे, उनके उपरणोंमें सोनेकी पच्चीकारी की गयी थी, वे चित्र-विचित्र कवच, रथ और आयुधसे युक्त थे, उनके सिरोंपर स्वर्गीय मयूरपिच्छ शोभा पा रहा था और उनके ध्वजोंपर वैदूर्यमणिकी मकराकृति बनी हुई थी। |
* अध्याय १४८ * ५५७
| श्लोक | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| जवारक्तोत्तरासङ्गा राक्षसा रक्तमूर्धजाः।<br>गृध्रध्वजा महावीर्या निर्मलायोविभूषणाः ॥ ८७<br><br>मुसलासिगदाहस्ता रथे चोष्णीषदंशिताः।<br>महामेघरवा नागा भीमोल्काशनिहेतयः ॥ ८८<br><br>यक्षाः कृष्णाम्बरभृतो भीमबाणधनुर्धराः।<br>ताम्रोलूकध्वजा रौद्रा हेमरत्नविभूषणाः ॥ ८९<br><br>द्वीपिचर्मोत्तरासङ्गं निशाचरबलं बभौ।<br>गार्ध्रपत्रध्वजप्रायमस्थिभूषणभूषितम् ॥ ९०<br><br>मुसलायुधदुष्प्रेक्ष्यं नानाप्राणिमहारवम्।<br>किन्नराः श्वेतवसनाः सितपत्रपताकिनः ॥ ९१<br><br>मत्तेभवाहनप्रायास्तीक्ष्णतोमरहेतयः । | इधर महान् पराक्रमी राक्षसोंके ऊपरने जपा-कुसुमके समान लाल रंगके थे। उनके बाल भी लाल थे। उनकी ध्वजाओंपर गीधके आकार बने हुए थे। वे निर्मल लोहेके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथमें मूसल, गदा और तलवार शोभा पा रहे थे। वे पगड़ी बाँधे हुए रथपर सवार थे। वे हाथीके समान विशालकाय थे और मेघके समान भयंकर गर्जना कर रहे थे, जो ऐसा लग रहा था मानो भयंकर उल्कापात अथवा वज्रपात हो रहा हो। यक्षलोग काला वस्त्र पहने हुए थे और उनके हाथोंमें भयंकर धनुष-बाण शोभा पा रहे थे। वे बड़े भयंकर और स्वर्ण एवं रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी ध्वजाओंपर ताँबेके उलूक बने हुए थे। निशाचरोंकी सेना गैंडेके चमड़ेका उपराना धारण किये हुए बड़ी शोभा पा रही थी। उनकी ध्वजाओंमें गीधोंके पंख लगे हुए थे। वे हड्डीके आभूषणोंसे विभूषित थे। वे आयुधरूपमें मूसल धारण किये हुए थे, जिससे देखनेमें बड़े भयंकर लग रहे थे। उनकी सेनामें बहुत-से प्राणियोंके भयंकर शब्द हो रहे थे। किंनरगण श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। उनकी श्वेत पताकाओंपर बाणके चिह्न बने हुए थे। वे प्रायः मतवाले गजराजोंपर सवार थे और तेज तोमर उनके अस्त्र थे॥ ८५-९१ १/२॥ |
| मुक्ताजालपरिष्कारो हंसो रजतनिर्मितः ॥ ९२<br><br>केतुर्जलाधिनाथस्य भीमधूमध्वजानलः।<br>पद्मरागमहारत्नविटपं धनदस्य तु ॥ ९३<br><br>ध्वजं समुच्छ्रितं भाति गन्तुकाममिवाम्बरम्।<br>वृकेण काष्ठलोहेन यमस्यासीन्महाध्वजः ॥ ९४<br><br>राक्षसेशस्य केतोर्वै प्रेतस्य मुखमाबभौ।<br>हिमसिंहध्वजौ देवौ चन्द्रार्कावमितद्युती ॥ ९५<br><br>कुम्भेन रत्नचित्रेण केतुरश्विनयोरभूत्।<br>हेममातङ्गरचितं चित्ररत्नपरिष्कृतम् ॥ ९६<br><br>ध्वजं शतक्रतोरासीत् सितचामरमण्डितम्। | जलेश्वर वरुणकी ध्वजापर चाँदीका बना हुआ हंस अङ्कित था, जिसे मुक्तासमूहोंसे सुशोभित किया गया था। वह भयंकर धूमसे घिरे हुए अग्नि-ध्वज-जैसा दीख रहा था। कुबेरकी ध्वजापर पद्मरागमणि एवं बहुमूल्य रत्नोंसे वृक्षकी आकृति बनायी गयी थी। यमराजके महान् ध्वजपर काष्ठ और लोहेसे भेड़ियेका चिह्न अङ्कित किया गया था। वह ऊँचा ध्वज ऐसा लग रहा था मानो आकाशको पार कर जाना चाहता है। राक्षसेशके ध्वजपर प्रेतका मुख शोभा पा रहा था। अमित तेजस्वी चन्द्रदेव और सूर्यदेवके ध्वजपर सोनेके सिंह बने हुए थे। अश्विनीकुमारोंके ध्वजोंपर रत्नोंद्वारा कुम्भका आकार बना हुआ था। इन्द्रके ध्वजपर सोनेका हाथी बना हुआ था, जिसे चित्र-विचित्र रत्नोंसे सजाया गया था और वह श्वेत चँवरसे सुशोभित था। |
| सनागयक्षगन्धर्वमहोरगनिशाचराः ॥ ९७<br><br>सेना सा देवराजस्य दुर्जया भुवनत्रये।<br>कोटयस्तास्त्रयस्त्रिंशद्वैवे देवनिकायिनाम् ॥ ९८ | नाग, यक्ष, गन्धर्व, महोरग और निशाचरोंसे भरी हुई देवराज इन्द्रकी वह सेना त्रिभुवनमें अजेय थी। इस प्रकार उस देव-सेनामें देवताओंकी संख्या तैंतीस करोड़ थी। |
| हिमाचलाभे सितकर्णचामरे<br>सुवर्णपद्मामलसुन्दरस्रजि ।<br>कृताभिरागोज्ज्वलकुङ्कुमाङ्कुरे<br>कपोललीलालिकदम्बसंकुले ॥ ९९ | उस समय स्वर्गलोकमें सहस्रनेत्रधारी महाबली पाकशासन इन्द्र ऐरावत नामक गजराजपर, जो हिमालयके समान विशालकाय था, जिसके श्वेत कान चँवरके समान हिल रहे थे, जिसके गलेमें स्वर्णनिर्मित कमलोंकी निर्मल एवं सुन्दर माला लटक रही थी, जिसके उज्ज्वल मस्तकपर कुङ्कुमसे पत्रभङ्गीकी |
| ५५८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| स्थितस्तदैरावतनामकुञ्जरे<br>महाबलश्चित्रविभूषणाम्बरः ।<br>विशालवस्त्रांशुवितानभूषितः<br>प्रकीर्णकेयूरभुजाग्रमण्डलः ।<br>सहस्रदृग्वन्दिसहस्रसंस्तुत-<br>स्त्रिविष्टपेऽशोभत पाकशासनः ॥ १००<br>तुरङ्गमातङ्गबलौघसंकुला<br>सितातपत्रध्वजराजिशालिनी ।<br>चमूश्च सा दुर्जयपत्रिसंतता<br>विभाति नानायुधयोधदुस्तरा ॥ १०१ | रचना की गयी थी तथा जिसके कपोलपर भ्रमरसमूह क्रीड़ा करते हुए मँडरा रहे थे, बैठे हुए शोभा पा रहे थे। वे चित्र-विचित्र आभूषण और वस्त्र पहने हुए थे, चमकीले वस्त्रोंके बने हुए विशाल छत्रसे सुशोभित थे, उनके बाजूबंदकी फैलती हुई प्रभा भुजाके अग्रभागको सुशोभित कर रही थी और हजारों वंदी उनकी स्तुति कर रहे थे। इसी प्रकार जो घोड़ों और हाथियोंके सैन्यसमूहसे व्याप्त, श्वेत छत्र और ध्वजसमूहोंसे सुशोभित, अजेय पैदल सैनिकोंसे भरी हुई तथा नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले योद्धाओंसे युक्त होनेके कारण दुस्तर वह देवसेना भी अत्यन्त शोभा पा रही थी॥ ९२-१०१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने रणयोजनो नामाष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें रणयोजन नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४८ ॥
एक सौ उनचासवाँ अध्याय
देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ
| सूत उवाच<br><br>सुरासुराणां सम्मर्दस्तस्मिन्नत्यन्तदारुणे।<br>तुमुलोऽतिमहानासीत् सेनयोरुभयोरपि॥ १<br>गर्जतां देवदैत्यानां शङ्खभेरीरवेण च।<br>तूर्याणां चैव निर्घोषैर्मातङ्गानां च बृंहितैः॥ २<br>हेषतां हयवृन्दानां रथनेमिस्वनेन च।<br>ज्याघोषेण च शूराणां तुमुलोऽतिमहान्भूत्॥ ३<br>समासाद्योभये सेने परस्परजयैषिणाम्।<br>रोषेणातिपरीतानां त्यक्तजीवितचेतसाम्॥ ४<br>समासाद्य तु तेऽन्योन्यं प्रक्रमेण विलोमतः।<br>रथेनासक्तपादातो रथेन च तुरङ्गमः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! देवताओं और असुरोंके उस अत्यन्त भीषण संग्रामके अवसरपर दोनों ही सेनाओंमें घोर गर्जनाके साथ-साथ अत्यन्त भयंकर संघर्ष छिड़ गया। उस समय देवता और दैत्य सिंहनाद कर रहे थे, शङ्ख, भेरी और तुरहीका शब्द हो रहा था, हाथी चिग्घाड़ रहे थे, यूथ-के-यूथ घोड़े हींस रहे थे, रथके पहियोंकी घरघराहट हो रही थी और वीरोंद्वारा खींची गयी प्रत्यञ्जाके चटाचट शब्द हो रहे थे। इन सबके सम्मिलित हो जानेसे अत्यन्त भयानक ध्वनि होने लगी। अतिशय क्रोधसे युक्त हो जीवनकी आशाका परित्याग कर परस्पर एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे युक्त वीरोंकी दोनों सेनाएँ आमने-सामने घमासान युद्ध करने लगीं। उस समय परस्पर अनुलोम और विलोमका क्रम नहीं रह गया। पैदल सैनिक रथीके साथ, घुड़सवार रथीके साथ, |
| * अध्याय १४९ * | ५५९ |
|---|
| हस्ती पदातिसंयुक्तो रथिना च क्वचिद् रथी।<br>मातङ्गेनापरो हस्ती तुरङ्गैर्र्बहुभिर्गजः॥ ६<br>पदातिरेको बहुभिर्गजैर्मत्तैश्च युज्यते।<br>ततः प्रासाशनिगदाभिन्दिपालपरश्वधैः॥ ७<br>शक्तिभिः पट्टिशैः शूलैर्मुद्गरैः कुणपैर्गडैः।<br>चक्रैश्च शङ्कुभिश्चैव तोमरैरङ्कुशैः सितैः॥ ८<br>कर्णिनालीकनाराचवत्सदन्तार्धचन्द्रकैः ।<br>भल्लैश्च शतपत्रैश्च शुक्तुण्डैश्च निर्मलैः॥ ९<br>वृष्टिरत्यद्भुताकारा गगने समदृश्यत।<br>सम्प्रच्छाद्य दिशः सर्वास्तमोमयमिवाकरोत्॥ १०<br>न प्राज्ञायत तेऽन्योऽन्यं तस्मिंस्तमसि संकुले।<br>अलक्ष्यं विसृजन्तस्ते हेतिसंघातमुद्धतम्॥ ११<br>पतितं सेनयोर्मध्ये निरीक्षन्ते परस्परम्।<br>ततो ध्वजैर्भुजैश्छत्रैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः॥ १२<br>गजैस्तुरङ्गैः पादातैः पतद्भिः पतितैरपि।<br>आकाशसरसो भ्रष्टैः पङ्कजैरिव भूः स्तुता॥ १३<br>भग्नदन्ता भिन्नकुम्भाश्छिन्नदीर्घमहाकराः।<br>गजाः शैलनिभाः पेतुर्धरण्यां रुधिरस्रवाः॥ १४<br>भग्नेषादण्डचक्राक्षा रथाश्च शकलीकृताः।<br>पेतुः शकलतां यातास्तुरङ्गाश्च सहस्रशः॥ १५<br>ततोऽसृग्ध्रददुस्तारा पृथिवी समजायत।<br>नद्यश्च रुधिरावर्ता हर्षदाः पिशिताशिनाम्।<br>वेतालाक्रीडमभवत् तत्संकुलरणाजिरम्॥ १६ | हाथी पैदल सैनिकके साथ, कहीं एक रथी दूसरे रथीके साथ, एक हाथी दूसरे हाथीके साथ, एक हाथी बहुत-से घोड़ोंके साथ और अकेला पैदल सैनिक बहुत-से मतवाले हाथियोंके साथ जूझने लगे॥ १-६ १/२॥<br>तदनन्तर आकाशमण्डलमें भाला, वज्र, गदा, डेलवाँस, कुठार, शक्ति, पटा, त्रिशूल, मुद्गर, कुणप, गड, चक्र, शङ्कु, तोमर, चमकीले अङ्कुश, फलयुक्त बाण, बाण, पोला बाण, वत्सदन्त, अर्धचन्द्र, भाला, शतपत्र और निर्मल शुक्तुण्डोंके प्रहारसे अत्यन्त अद्भुत आकारवाली वृष्टि दीख पड़ी। उससे सारी दिशाएँ आच्छादित हो गयीं और उसने सारे जगत्को अन्धकारमय बना दिया। उस घोर अन्धकारमें वे परस्पर एक-दूसरेको पहचानतक नहीं पाते थे; अतः वे बिना लक्ष्यके ही अपने भयंकर शस्त्रसमूहोंका प्रहार कर रहे थे। दोनों सेनाओंमें परस्पर कटकर धराशायी होते हुए वीरोंको देख रहे थे। उस समय कटकर गिरे हुए या गिरते हुए ध्वजों, भुजाओं, छत्रों, कुण्डलमण्डित मस्तकों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंसे युद्धभूमि इस प्रकार पट गयी थी, मानो आकाशरूपी सरोवरसे गिरे हुए कमल-पुष्पोंसे आच्छादित हो। जिनके दाँत टूट गये थे, कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे और लम्बे-लम्बे शुण्डदण्ड कटकर गिर गये थे ऐसे पर्वत-सदृश विशालकाय गजराज पृथ्वीपर पड़े हुए थे, जिनके शरीरसे खूनकी धाराएँ बह रही थीं। जिनके हरसे, पहिये और धुरे आदि विदीर्ण हो गये थे, ऐसे अनेकों रथ खण्ड-खण्ड होकर पड़े थे। हजारों घोड़े भी टुकड़े-टुकड़े हुए पड़े थे। इस प्रकार वहाँ रक्तसे भरे हुए बहुत-से गड्ढे बन गये थे, जिससे युद्धभूमिको पार करना कठिन हो गया था। खूनसे भरी हुई नदियाँ भँवर बनाती हुई बह रही थीं, जो मांसभोजियोंको हर्षोल्लसित कर रही थीं। इस प्रकार तरह-तरहकी लाशोंसे पटा हुआ वह युद्धस्थल वेतालोंका क्रीडास्थल बन गया था॥ ७-१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धं नामैकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः १४९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें देवासुरयुद्ध नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४९॥
| ५६० | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ पचासवाँ अध्याय
देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित छोड़ देना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>अथ ग्रसनमालोक्य यमः क्रोधविमूर्च्छितः।<br>ववर्ष शरवर्षेण विशेषेणाग्निवर्चसाम्॥ १<br>स विद्धो बहुभिर्बाणैर्ग्रसनोऽतिपराक्रमः।<br>कृतप्रतिकृताकाङ्क्षी धनुरानम्य भैरवम्॥ २<br>शतैः पञ्चभिरत्युग्रैः शराणां यममर्दयत्।<br>स विचिन्त्य यमो बाणान् ग्रसनस्यातिपौरुषम्॥ ३<br>बाणवृष्टिभिरुग्राभिर्यमो ग्रसनमर्दयत्।<br>कृतान्तशरवृष्टिं तां वियति प्रतिसर्पिणीम्॥ ४<br>चिच्छेद शरवर्षेण ग्रसनो दानवेश्वरः।<br>विफलां तां समालोक्य यमस्तां शरसंततिम्॥ ५<br>स विचिन्त्य शरव्रातं ग्रसनस्य रथं प्रति।<br>चिक्षेप मुद्गरं घोरं तरसा तस्य चान्तकः॥ ६<br>स तं मुद्गरमायान्तमुत्प्लुत्य गगनस्थितम्।<br>जग्राह वामहस्तेन याम्यं दानवनन्दनः॥ ७<br>तमेव मुद्गरं गृह्य यमस्य महिषं रुषा।<br>पातयामास वेगेन स पपात महीतले॥ ८<br>उत्प्लुत्याथ यमस्तस्मान्महिषान्निष्पतिष्यतः।<br>प्रासेन ताडयामास ग्रसनं वदने दृढम्॥ ९<br>स तु प्रासप्रहारेण मूर्च्छितो न्यपतद् भुवि।<br>ग्रसनं पतितं दृष्ट्वा जम्भो भीमपराक्रमः॥ १०<br>यमस्य भिन्दिपालेन प्रहारमकरोद्धृदि।<br>यमस्तेन प्रहारेण सुस्राव रुधिरं मुखात्॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषिगण! तदनन्तर (रणभूमिमें असुर-सेनानी) ग्रसनको सम्मुख उपस्थित देखकर यमराज क्रोधसे क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने ग्रसनके ऊपर अग्निके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अत्यन्त पराक्रमी ग्रसन भी बहुसंख्यक बाणोंके प्रहारसे घायल होकर भयंकर धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर अत्यन्त भीषण पाँच सौ बाणोंसे यमराजको बींध डाला। उन बाणोंके आघातसे ग्रसनके प्रबल पुरुषार्थका भलीभाँति विचार कर यमराज पुनः घोर बाणवृष्टिद्वारा ग्रसनको पीड़ा पहुँचाने लगे। तब दानवेश्वर ग्रसनने गगनमण्डलमें फैलती हुई यमराजकी उस बाणवृष्टिको अपने बाणोंकी वर्षासे छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार अपनी उस बाणवृष्टिको विफल हुई देखकर यमराज अपने बाणसमूहोंके विषयमें विचार करने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने उस ग्रसनके रथपर बड़े वेगसे अपना भयंकर मुद्गर फेंका। उस मुद्गरको अपनी ओर आते देख दानवनन्दन ग्रसनने रथसे उछलकर ऊपर-ही-ऊपर यमराजके उस मुद्गरको बायें हाथसे पकड़ लिया और उसी मुद्गरको लेकर क्रोधपूर्वक बड़े वेगसे यमराजके भैंसेपर दे मारा, जिसके आघातसे वह धराशायी हो गया। तब यमराज उस गिरते हुए भैंसेकी पीठसे उछलकर अलग हो गये। फिर तो उन्होंने भालेसे ग्रसनके मुखपर गहरी चोट पहुँचायी। तब भालेके प्रहारसे मूर्च्छित होकर ग्रसन भूतलपर गिर पड़ा। ग्रसनको धराशायी हुआ देखकर भयंकर पराक्रमी जम्भने भिन्दिपाल (ढेलवाँस)-से यमराजके हृदयपर प्रहार किया। उस प्रहारसे घायल होकर यमराज मुखसे खून उगलने लगे॥ १—११॥ |
| कृतान्तमर्दितं दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः।<br>वृतो यक्षायुतशतैर्जम्भं प्रत्युद्ययौ रुषा॥ १२ | इस प्रकार यमराजको घायल हुआ देखकर धनेश्वर कुबेरने हाथमें गदा लेकर दस लाख यक्षोंके साथ क्रोधपूर्वक जम्भपर धावा किया। |
* अध्याय १५० * <span style="float: right;">५६१</span>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जम्भो रुषा तमायान्तं दानवानीकसंवृतः ।<br>उवाच प्राज्ञो वाक्यं तु यथा स्निग्धेन भाषितम् ॥ १३<br><br>ग्रसनो लब्धसंज्ञोऽथ यमस्य प्राहिणोद् गदाम् ।<br>मणिहेमपरिष्कारां गुर्वीमरिविमर्दिनीम् ॥ १४<br><br>तामप्रतर्क्यां सम्प्रेक्ष्य गदां महिषवाहनः ।<br>गदायाः प्रतिघातार्थं जगद्दलनभैरवम् ॥ १५<br><br>दण्डं मुमोच कोपेन ज्वालामालासमाकुलम् ।<br>स गदां वियति प्राप्य ररासाम्बुधरो यथा ॥ १६<br><br>संघट्टमभवत् ताभ्यां शैलाभ्यामिव दुःसहम् ।<br>ताभ्यां निष्पेषनिर्ह्रादजडीकृतदिगन्तरम् ॥ १७<br><br>जगद् व्याकुलतां यातं प्रलयागमशङ्कया ।<br>क्षणात् प्रशान्तनिर्ह्रादं ज्वलदुल्कासमाहितम् ॥ १८<br><br>निष्पेषेण तयोर्भीममभूद् गमनगोचरम् ।<br>निहत्याथ गदां दण्डस्ततो ग्रसनमूर्धनि ॥ १९<br><br>हृत्वा श्रियमिवानर्थो दुर्वृत्तस्यापतद् दृढः ।<br>स तु तेन प्रहारेण दृष्ट्वा सतिमिरा दिशः ॥ २०<br><br>पपात भूमौ निःसंज्ञो भूमिरेणुविभूषितः ।<br>ततो हाहारवो घोरः सेनयोरुभयोरभूत् ॥ २१ | तब क्रोधपूर्वक कुबेरको आक्रमण करते देखकर दानवोंकी सेनासे घिरा हुआ बुद्धिमान् जम्भ प्रेमीद्वारा कही गयी मधुर वाणीकी तरह वचन बोला। इतनेमें ही ग्रसनकी चेतना लौट आयी। फिर तो उसने यमराजपर ऐसी गदाका प्रहार किया, जो बड़ी वजनदार थी, जिसमें मणि और सुवर्ण जड़े हुए थे तथा जो शत्रुओंका विनाश करनेवाली थी। उस अप्रत्याशित गदाको अपनी ओर आती देखकर महिषवाहन यमराजने क्रोधपूर्वक उस गदाका प्रतिरोध करनेके लिये अपने उस दण्डको छोड़ दिया, जो संसारका विनाश करनेमें समर्थ और अत्यन्त भयंकर था तथा जिससे अग्निके समान लपटें निकल रही थीं। वह दण्ड आकाशमें गदासे टकराकर मेघकी-सी गर्जना करने लगा। फिर तो दण्ड और गदामें दो पर्वतोंकी भाँति दुःसह संघर्ष छिड़ गया। उन दोनों अस्त्रोंके टक्करसे उत्पन्न हुए शब्दसे सारी दिशाएँ जड़ हो गयीं और जगत् प्रलयके आगमनकी आशङ्कासे व्याकुल हो गया। क्षणमात्र पश्चात् शब्द शान्त हो गया और उन दोनोंके मध्य जलती हुई उल्काके समान प्रकाश होने लगा। उन दोनोंके संघर्षसे आकाशमण्डल अत्यन्त भयंकर दीख रहा था। तदनन्तर दण्डने गदाको तोड़-मरोड़कर ग्रसनके मस्तकपर ऐसा कठोर आघात किया, जैसे दुराचारीका अनिष्ट उसकी श्रीका नाश करके उसे समाप्त कर देता है। उस प्रहारसे व्याकुल हुए ग्रसनको सारी दिशाएँ अन्धकारमयी दिखायी देने लगीं अर्थात् उसकी आँखों-तले अँधेरा छा गया। वह चेतनारहित होकर भूतलपर गिर पड़ा और उसका शरीर पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गया। तत्पश्चात् दोनों सेनाओंमें भयंकर हाहाकार मच गया॥ १२-२१॥ |
| ततो मुहूर्तमात्रेण ग्रसनः प्राप्य चेतनाम् ।<br>अपश्यत् स्वां तनुं ध्वस्तां विलोलाभरणाम्बराम् ॥ २२<br><br>स चापि चिन्तयामास कृते प्रतिकृतिक्रियाम् ।<br>मद्विधे वस्तुनि पुंसि प्रभोः परिभवोदयाः ॥ २३<br><br>मय्याश्रितानि सैन्यानि जिते मयि विनाशिता ।<br>असम्भावित एवास्तु जनः स्वच्छन्दचेष्टितः ॥ २४ | तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब ग्रसनकी चेतना वापस लौटी तब उसने देखा कि उसका शरीर ध्वस्त हो गया है और उसके आभूषण तथा वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं। फिर तो वह भी ऐसा करनेवालेसे बदला चुकानेका विचार करने लगा। वह मन-ही-मन सोचने लगा—मुझ-जैसे बली पुरुषके जीते-जी स्वामीके परिभवके लक्षण दिखायी पड़ रहे हैं। मेरे पराजित हो जानेपर मेरे आश्रित रहनेवाली सेनाएँ भी नष्ट हो जायेंगी। अयोग्य पुरुष ही स्वच्छन्दाचारी हो सकता है, |
५६२ * मत्स्यपुराण *
| न तु व्यर्थशतोद्घुष्टसम्भावितधनो नरः।<br>एवं संचिन्त्य वेगेन समुत्तस्थौ महाबलः॥ २५<br><br>मुद्गरं कालदण्डाभं गृहीत्वा गिरिसंनिभः।<br>ग्रसनो घोरसंकल्पः संदष्टौष्ठपुटच्छदः॥ २६<br><br>रथेन त्वरितो गच्छन्नाससादान्तकं रणे।<br>समासाद्य यमं युद्धे ग्रसनो भ्राम्य मुद्गरम्॥ २७<br><br>वेगेन महता रौद्रं चिक्षेप यममूर्धनि।<br>विलोक्य मुद्गरं दीप्तं यमः सम्भ्रान्तलोचनः॥ २८<br><br>वञ्चयामास दुर्धर्षं मुद्गरं स महाबलः।<br>तस्मिन्प्रसृते दूरं चण्डानां भीमकर्मणाम्॥ २९<br><br>याम्यनां किङ्कराणां तु सहस्रं निष्पिषेष ह।<br>ततस्तां निहतां दृष्ट्वा घोरां किङ्करवाहिनीम्॥ ३०<br><br>अगमत् परं क्षोभं नानाप्रहरणोद्यतः।<br>ग्रसनस्तु समालोक्य तां किङ्करमयीं चमूम्॥ ३१<br><br>मेने यमसहस्राणि सृष्टानि यममायया।<br>निग्राह्य ग्रसनः सेनां विसृजन्नस्त्रवृष्टयः॥ ३२<br><br>कल्पान्तघोरसङ्काशो बभूव क्रोधमूर्च्छितः।<br>कांश्चिद बिभेद शूलेन कांश्चिद बाणैरजिह्मगैः॥ ३३<br><br>कांश्चित्पिपेष गदया कांश्चिन्मुद्गरवृष्टिभिः।<br>केचित्प्रासप्रहारैश्च दारुणैस्ताडितास्तदा॥ ३४<br><br>अपरे बहुशस्तस्य ललम्बुर्बाहुमण्डले।<br>शिलाभिरपरे जघ्नुर्द्रुमैरन्यैर्महोच्छ्रयैः॥ ३५ | किंतु जो पुरुष सैकड़ों बार योग्य घोषित किया जा चुका है, वह स्वच्छन्द नहीं हो सकता। (अर्थात् जिसकी जगत्में कोई प्रतिष्ठा नहीं है, वह स्वेच्छानुसार कार्य कर सकता है, किंतु जो सैकड़ों बार लब्धप्रतिष्ठ हो चुका है, उसे स्वामीके अधीन रहकर ही कार्य करना चाहिये।) ऐसा विचारकर महाबली ग्रसन वेगपूर्वक उठ खड़ा हुआ। उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह भयंकर विचारसे युक्त था और क्रोधवश दाँतोंसे होंठको दबाये हुए था। इस प्रकार वह शीघ्रतापूर्वक रथपर सवार हो हाथमें कालदण्डके सदृश मुद्गर लेकर रणभूमिमें यमराजके निकट आ पहुँचा। युद्धस्थलमें यमराजके सम्मुख आकर ग्रसनने उस भयानक मुद्गरको बड़े वेगसे घुमाकर यमराजके मस्तकपर फेंक दिया। उस प्रकाशमान मुद्गरको आते हुए देखकर यमराजके नेत्र चकमका गये। तत्पश्चात् महाबली यमराजने अपने स्थानसे हटकर उस दुर्धर्ष मुद्गरको लक्ष्यसे वञ्चित कर दिया। यमराजके दूर हट जानेपर उस मुद्गरने यमराजके हजारों पराक्रमी एवं भयंकर कर्म करनेवाले किंकरोंको पीस डाला। तत्पश्चात् उस भयंकर किंकर-सेनाको मारी गयी देखकर यमराजको परम क्षोभ हुआ। तब वे नाना प्रकारके अस्त्रोंका प्रहार करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २२—३० १/२॥<br><br>उधर ग्रसनने उस सेनाको किंकरोंसे व्याप्त देखकर ऐसा समझा कि यमराजकी मायाद्वारा रचे गये ये हजारों यमराज ही हैं। फिर तो ग्रसन सेनाको रोककर उसपर अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय वह कल्पान्तके समय क्षुब्ध हुए भयंकर समुद्रकी भाँति क्रोधसे विह्वल हो उठा था। उसने कुछ किंकरोंको त्रिशूलसे और कुछको सीधे जानेवाले बाणोंसे विदीर्ण कर दिया। कुछको गदाके प्रहारसे और कुछको मुद्गरोंकी वर्षासे पीस डाला। कुछ भयंकर भालोंके प्रहारसे घायल कर दिये गये। दूसरे बहुत-से उसकी बाहुओंपर लटके हुए थे। इधर किंकरोंमेंसे बहुत-से लोग शिलाओंद्वारा तथा अन्य कुछ लोग ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंद्वारा ग्रसनपर |
| * अध्याय १५० * | ५६३ |
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| तस्यापरे तु गात्रेषु दशनैरप्यदंशयन्।<br>अपरे मुष्टिभिः पृष्ठं किंकराः प्रहरन्ति च॥ ३६<br><br>अभिद्रुतस्तथा घोरैर्ग्रसनः क्रोधमूर्च्छितः।<br>उत्सृज्य गात्रं भूपृष्ठे निष्पिपेप सहस्रशः॥ ३७<br><br>कांश्चिदुत्थाय मुष्टीभिर्जघ्ने किङ्करसंश्रयान्।<br>स तु किङ्करयुद्धेन ग्रसनः श्रममाप्तवान्॥ ३८<br><br>तमालोक्य यमः श्रान्तं निहतां च स्ववाहिनीम्।<br>आजगाम समुद्यम्य दण्डं महिषवाहनः॥ ३९<br><br>ग्रसनस्तु समायान्तमाजघ्ने गदयोरसि।<br>अचिन्तयित्वा तत्कर्म ग्रसनस्यान्तकोऽरिहा॥ ४०<br><br>जघ्ने रथस्य मूर्धन्यान् व्याघ्रान् दण्डेन कोपनः।<br>स रथो दण्डमथितैर्व्याघ्रैरर्धैर्विकृष्यते॥ ४१ | प्रहार कर रहे थे। कुछ उसके शरीराङ्गोंमें दाँतोंसे काट रहे थे। दूसरे किंकर उसकी पीठपर मुक्केसे प्रहार कर रहे थे। इस प्रकार घोरकर्मा किंकरोंद्वारा पीछा किये जानेपर ग्रसन अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। उसने अपने शरीरको भूतलपर गिराकर हजारों किंकरोंको उसके नीचे पीस डाला। फिर उठकर कुछ किंकरोंको मुक्केसे पीटकर मौतके घाट उतार दिया। इस प्रकार किंकरोंके साथ युद्ध करनेसे ग्रसन थकावटसे चूर हो गया था। तब ग्रसनको थका हुआ तथा अपनी सेनाको मारी गयी देखकर महिषवाहन यमराज हाथमें दण्ड लेकर आ पहुँचे। ग्रसनने सम्मुख आये हुए यमराजके वक्षःस्थलपर गदासे प्रहार किया। तब शत्रुसूदन यमराजने ग्रसनके उस प्रहारकी कुछ भी परवाह न कर उसके रथके अग्रभागमें जुते हुए बाघोंपर क्रोधपूर्वक दण्डसे प्रहार किया। उस दण्डप्रहारसे आधे बाघोंके मारे जानेपर वह रथ आधे बाघोंद्वारा ही खींचा जा रहा था॥ ३१—४१॥ |
| संशयः पुरुषस्येव चित्तं दैत्यस्य तद्रथम्।<br>समुत्सृज्य रथं दैत्यः पदातिर्धरणीं गतः॥ ४२<br><br>यमं भुजाभ्यामादाय योधयामास दानवः।<br>यमोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य बाहुयुद्धेष्ववर्तत॥ ४३<br><br>ग्रसनः कटिवस्त्रस्तु यमं गृह्य बलोद्धतः।<br>भ्रामयामास वेगेन प्रदीपमिव सम्भ्रमम्॥ ४४<br><br>यमोऽपि कण्ठेऽवष्टभ्य दैत्यं बाहुयुगेन तु।<br>वेगेन भ्रामयामास समुत्कृष्य महीतलात्॥ ४५<br><br>ततो मुष्टिभिराजघ्नुरर्दयन्तो परस्परम्।<br>दैत्येन्द्रस्यातिकायत्वात्ततः श्रान्तभुजो यमः॥ ४६<br><br>स्कन्धे निधाय दैत्यस्य मुखं विश्रान्तिमैच्छत।<br>तमालक्ष्य ततो दैत्यः श्रान्तमन्तकमोजसा॥ ४७ | उस समय दैत्यराज ग्रसनका वह रथ पुरुषके संशयग्रस्त चित्तकी भाँति अस्थिर हो गया था। अतः दैत्यराज ग्रसन रथको छोड़कर भूतलपर आ गया और पैदल ही आगे बढ़कर यमराजको दोनों भुजाओंसे पकड़कर युद्ध करने लगा। तब यमराज भी शस्त्रोंको छोड़कर बाहुयुद्धमें प्रवृत्त हो गये। बलाभिमानी ग्रसन यमराजके कमरबंदको पकड़कर उन्हें घूमते हुए दीपककी भाँति वेगपूर्वक घुमाने लगा। तब यमराज भी अपनी दोनों भुजाओंसे दैत्यके गलेको पकड़कर उसे वेगपूर्वक भूतलसे ऊपर खींचकर बड़ी देरतक घुमाते रहे। तत्पश्चात् वे दोनों परस्पर एक-दूसरेको पीड़ित करते हुए मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। उस समय दैत्येन्द्र ग्रसनके विशालकाय होनेके कारण यमराजकी भुजाएँ शिथिल हो गयीं। तब वे उस दैत्यके कंधेपर अपना मुख रखकर विश्राम करनेकी इच्छा करने लगे। यमराजको इस प्रकार थका हुआ देखकर |
| ५६४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निष्विपेष महीपृष्ठे बहुशः पाष्णिपाणिभिः।<br>यावद्यमस्य वदनात् सुस्राव रुधिरं बहु॥ ४८<br>निर्जीवितं यमं दृष्ट्वा ततः संत्यज्य दानवः।<br>जयं प्राप्योद्धतं दैत्यो नादं मुक्त्वा महास्वनः॥ ४९<br>स्वीयं सैन्यं समासाद्य तस्थौ गिरिरिवाचलः। | ग्रसन उन्हें बलपूर्वक पृथ्वीपर पटककर बारम्बार रगड़ने लगा और पैरोंकी ठोकरों और घूँसोंसे तबतक मारता रहा, जबतक यमराजके मुखसे बहुत-सा रक्त बहने लगा। तत्पश्चात् दानवराजने यमराजको प्राणहीन देखकर उन्हें छोड़ दिया। फिर गम्भीर गर्जना करनेवाला दैत्यराज ग्रसन विजयी होकर सिंहनाद करता हुआ अपनी सेनामें पहुँचकर पर्वतकी भाँति अटल होकर खड़ा हो गया॥ ४२-४९ १/२ ॥ |
| धनाधिपस्य जम्भेन सायकैर्मर्मभेदिभिः॥ ५०<br>दिशोऽवरुद्धाः क्रुद्धेन सैन्यं चास्य निकृन्तितम्।<br>ततः क्रोधपरीतस्तु धनेशो जम्भदानवम्॥ ५१<br>हृदि विव्याध बाणानां सहस्त्रेणाग्निवर्चसाम्।<br>सारथिं च शतेनाजौ ध्वजं दशभिरेव च॥ ५२<br>हस्तौ च पञ्चसप्तत्या मार्गणैर्दशभिर्धनुः।<br>मार्गणैर्बर्हिपत्राङ्गैरस्तैलधौतैरजिह्मगैः ॥ ५३<br>सिंहमेकेन तं तीक्ष्णैर्विव्याध दशभिः शरैः।<br>जम्भस्तु कर्म तद्दृष्ट्वा धनेशस्यातिदुष्करम्॥ ५४ | उधर क्रोधसे भरे हुए जम्भने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा कुबेरके सारे मार्ग (दिशाएँ) अवरुद्ध कर दिये और उनकी सेनाको काटना आरम्भ किया। यह देखकर धनेश क्रोधसे भर उठे। उन्होंने युद्धभूमिमें अग्निके समान वर्चस्वी एक हजार बाणोंसे दानवराज जम्भके हृदयको बींध दिया। फिर सौ बाणोंसे सारथिको, दस बाणोंसे ध्वजको, पचहत्तर बाणोंसे उसके दोनों हाथोंको, दस बाणोंसे धनुषको, एक बाणसे (उसके वाहन) सिंहको और दस तीखे बाणोंसे पुनः उस दानवराजको बींध दिया। इन सब बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे तथा ये तेलमें डालकर साफ किये हुए और सीधे लक्ष्यवेध करनेवाले थे। धनेशके उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर |
| हृदि धैर्यं समालम्व्य किञ्चित्संत्रस्तमानसः।<br>जग्राह निशितान् बाणाञ्छत्रुमर्मविभेदिनः॥ ५५<br>आकर्णाकृष्टचापस्तु जम्भः क्रोधपरिप्लुतः।<br>विव्याध धनदं तीक्ष्णैः शरैर्वक्षसि दानवः॥ ५६<br>सारथिं चास्य बाणेन दृढेनाभ्यहनद्धृदि।<br>चिच्छेद ज्यामथैकेन तैलधौतेन दानवः॥ ५७ | जम्भका मन कुछ भयभीत हो उठा। फिर उसने हृदयमें धैर्य धारण कर शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले तीखे बाणोंको हाथमें लिया। उस समय दानवराज जम्भ क्रोधसे भरा हुआ था। उसने अपने धनुषको कानतक खींचकर तीखे बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको बींध दिया। फिर उनके सारथिके हृदयपर एक सुदृढ़ बाणसे आघात किया और तेलमें सफाये हुए एक बाणसे उनकी प्रत्यञ्चाको काट दिया। |
| ततस्तु निशितैर्बाणैर्दारुणैर्मर्मभेदिभिः।<br>विव्याधोरसि वित्तेशं दशभिः क्रूरकर्मकृत्॥ ५८<br>मोहं परमतोगच्छन् दृढविद्धो हि वित्तपः।<br>स क्षणाद् धैर्यमालम्ब्य धनुराकृष्य भैरवम्॥ ५९<br>किरन् बाणसहस्त्राणि निशितानि धनाधिपः।<br>दिशः खं विदिशो भूमीरनीकान्यसुरस्य च॥ ६० | तदनन्तर क्रूरकर्मा दानवराज जम्भने तीखे एवं मर्मभेदी दस भयंकर बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको पुनः घायल कर दिया। तब बुरी तरह घायल हुए कुबेर मूर्च्छित हो गये। क्षणमात्रके बाद कुबेरकी मूर्च्छा भंग हुई, तब उन्होंने धैर्य धारणकर अपने भयंकर धनुषको वेगपूर्वक खींचकर हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए दिशाओं, विदिशाओं, आकाश, पृथ्वी और |
| * अध्याय १५० * | ५६५ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| पूरयामास वेगेन संछाद्य रविमण्डलम्।<br>जम्भोऽपि परमेकैकं शरैर्बहुभिराहवे॥ ६१<br><br>चिच्छेद लघुसंधानो धनेशस्यातिपौरुषात्।<br>ततो धनेशः संक्रुद्धो दानवेन्द्रस्य कर्मणा॥ ६२<br><br>व्यधमत् तस्य सैन्यानि नानासायकवृष्टिभिः।<br>तद् दृष्ट्वा दुष्कृतं कर्म धनाध्यक्षस्य दानवः॥ ६३<br><br>गृहीत्वा मुद्गरं भीममायसं हेमभूषितम्।<br>धनदानुचरान् यक्षान् निष्पिपेष सहस्रशः॥ ६४<br><br>ते वध्यमाना दैत्येन मुञ्चन्तो भैरवान् रवान्।<br>रथं धनपतेः सर्वे परिवार्य व्यवस्थिताः॥ ६५<br><br>दृष्ट्वा तानर्दितान् देवः शूलं जग्राह दारुणम्।<br>तेन दैत्यसहस्राणि सूदयामास सत्वरः॥ ६६<br><br>क्षीयमाणेषु दैत्येषु दानवः क्रोधमूर्च्छितः।<br>जग्राह परशुं दैत्यो मर्दनं दैत्यविद्विषाम्॥ ६७<br><br>स तेन शितधारेण धनभर्तुर्महारथम्।<br>चिच्छेद तिलशो दैत्यो ह्याखुः स्निग्धमिवाम्बरम्॥ ६८<br><br>पदातिरथ वित्तेशो गदामादाय भैरवीम्।<br>महाहवविमर्देषु दृप्तशत्रुविनाशिनीम्॥ ६९<br><br>अधृष्यां सर्वभूतानां बहुवर्षगणार्चिताम्।<br>नानाचन्दनदिग्धाङ्गीं दिव्यपुष्पविवासिताम्॥ ७०<br><br>निर्मलायोमयीं गुर्वीममोघां हेमभूषणाम्।<br>चिक्षेप मूर्ध्नि संक्रुद्धो जम्भस्य तु धनाधिपः॥ ७१<br><br>आयान्तीं तां समालोक्य तडित्संघातमण्डिताम्।<br>दैत्यो गदाभिघातार्थं शस्त्रवृष्टिं मुमोच ह॥ ७२<br><br>चक्राणि कुणपान् प्रासान् भुशुण्डीः पट्टिशानपि।<br>हेमकेयूरनद्धाभ्यां बाहुभ्यां चण्डविक्रमः॥ ७३ | असुरकी सेनाओंको ढक दिया। यहाँतक कि उस बाणवर्षासे सूर्यमण्डल भी आच्छादित हो गया॥ ५०—६० १/२॥<br><br>तब शीघ्रतापूर्वक बाण संधान करनेवाले जम्भने भी युद्धस्थलमें परम पुरुषार्थ प्रकट करके कुबेरके एक-एक बाणको बहुसंख्यक बाणोंसे काट गिराया। दानवेन्द्रके उस कर्मको देखकर धनेश अत्यन्त कुपित हो उठे, तब वे नाना प्रकारके बाणोंकी वृष्टि करके उसकी सेनाका विध्वंस करने लगे। कुबेरके दुष्कर कर्मको देखकर दानवराज जम्भने लौहनिर्मित एवं स्वर्णजटित भयंकर मुद्गरको लेकर कुबेरके अनुचर हजारों यक्षोंको चकनाचूर कर दिया। दैत्यद्वारा मारे जाते हुए वे सभी यक्ष भयंकर चीत्कार करते हुए कुबेरके रथको घेरकर खड़े हो गये। उन यक्षोंको दुःखी देखकर कुबेरने अपना भीषण त्रिशूल हाथमें लिया और उससे शीघ्र ही हजारों दैत्योंको मौतके हवाले कर दिया। इस प्रकार दैत्योंका विनाश होते देखकर दानवराज जम्भ क्रोधसे भर गया और उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले तेज धारसे युक्त फरसेसे कुबेरके महान् रथको उसी प्रकार तिल-तिल करके काट डाला, जैसे चूहा रेशमी वस्त्रको कुतर डालता है। इससे कुबेर परम क्रुद्ध हो उठे, तब उन्होंने पैदल ही अपनी उस भयंकर गदाको, जो बड़े-बड़े युद्धोंमें गर्वीले शत्रुओंका विनाश करनेवाली, सभी प्राणियोंके लिये अधृष्य, बहुत वर्षोंसे पूजित, नाना प्रकारके चन्दनोंके अनुलेपसे युक्त, दिव्य पुष्पोंसे सुवासित, निर्मल लौहकी बनी हुई, वजनदार, अमोघ और स्वर्णभूषित थी, हाथमें लेकर जम्भके मस्तकको लक्ष्य बनाकर छोड़ दिया॥ ६१—७१॥<br><br>विद्युत्समूहसे विभूषित-जैसी उस गदाको अपनी ओर आती देखकर दैत्यराज जम्भ उसको नष्ट करनेके लिये बाणोंकी वृष्टि करने लगा। यद्यपि प्रचण्ड पराक्रमी जम्भ स्वर्णनिर्मित बाजूबन्दोंद्वारा विभूषित भुजाओंसे चक्रों, कुणपों, भालों, भुशुण्डियों और पट्टिशोंका प्रहार |