भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 559

* अध्याय १४८ * ५४९


| जगृहर्षसमाविष्टा ननृतुश्चासुराङ्गनाः।<br>ततो महोत्सवो जातो दानवानां द्विजोत्तमाः॥ २५<br>विषण्णमनसो देवाः समहेन्द्रास्तदाभवन्।<br>वराङ्गी स्वसुतं दृष्ट्वा हर्षेणापूरिता तदा॥ २६<br>बहु मेने न देवेन्द्रविजयं तु तदैव सा।<br>जातमात्रस्तु दैत्येन्द्रस्तारकश्चण्डविक्रमः॥ २७<br>अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैः कुजम्भमहिषादिभिः।<br>सर्वासुरमहाराज्ये पृथिवीतुलनक्षमैः॥ २८<br>स तु प्राप्य महाराज्यं तारको मुनिसत्तमाः।<br>उवाच दानवश्रेष्ठान् युक्तियुक्तमिदं वचः॥ २९ | उनके साथ राक्षसियाँ भी थीं। हर्षसे फूली हुई उन असुराङ्गनाओंमें कुछ तो नाचने लगीं और कुछ गाने लगीं। इस प्रकार वहाँ दानवोंका महोत्सव प्रारम्भ हो गया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवताओंका मन खिन्न हो गया। उधर वराङ्गी अपने पुत्रका मुख देखकर हर्षसे भर गयी। उसी समय वह देवराज इन्द्रकी विजयको तुच्छ मानने लगी। प्रचण्ड पराक्रमी दैत्यराज तारक जन्म लेते ही पृथ्वीको भी उठा लेनेमें समर्थ कुजम्भ और महिष आदि सभी प्रधान असुरोंद्वारा सम्पूर्ण असुरोंके सम्राट्पदपर अभिषिक्त कर दिया गया। मुनिवरो! तब उस महान् राज्यका अधिकार पाकर तारक उन दानवश्रेष्ठोंसे ऐसा युक्तिसंगत वचन बोला— ॥ १७—२९ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने तारकोत्पत्तिर्नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकासुरोपाख्यानमें तारकोत्पत्ति नामक एक सौ संतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४७॥


एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय

तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुर-संग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन

तारक उवाच<br>शृणुध्वमसुराः सर्वे वाक्यं मम महाबलाः।<br>श्रेयसे क्रियतां बुद्धिः सर्वैः कृत्यस्य संविधौ॥ १**तारकने कहा—**महाबली असुरो! आपलोग ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनें। आप सभी लोगोंको इस कार्यकी तैयारीमें सर्वप्रथम अपने कल्याणके लिये विचार कर लेना चाहिये।
वंशक्षयकरा देवाः सर्वेषामेव दानवाः।<br>अस्माकं जातिधर्मो वै विरूढं वैरमक्षयम्॥ २दानववृन्द! देवतालोग हम सभीके कुलका (सदा) संहार करते रहते हैं, इस कारण उनके साथ विरोध करना हमलोगोंका जातिगत धर्म है और उनके साथ हमारा (सदा) अक्षय वैर बँधा रहता है।
वयमद्य गमिष्यामः सुराणां निग्रहाय तु।<br>स्वबाहुबलमाश्रित्य सर्व एवमसंशयः॥ ३हम सभी लोग अपने बाहुबलका आश्रय लेकर आज ही उन देवताओंका दमन करनेके लिये चलेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है,
किंतु नातपसा युक्तो मन्येऽहं सुरसंगमम्।<br>अहमादौ करिष्यामि तपो घोरं दितेः सुताः॥ ४किंतु दिति-नन्दनो! तपोबलसे सम्पन्न हुए बिना मैं देवताओंके साथ लोहा लेना उचित नहीं समझता, अतः मैं पहले घोर तपस्या करूँगा, तत्पश्चात् हमलोग