मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५५० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| ततः सुरान् विजेष्यामो भोक्ष्यामोऽथ जगत्त्रयम्।<br>स्थिरोपायो हि पुरुषः स्थिरश्रीरपि जायते॥ ५<br><br>रक्षितुं नैव शक्नोति चपलश्चपलां श्रियम्।<br>तच्छ्रुत्वा दानवाः सर्वे वाक्यं तस्यासुरस्य तु॥ ६<br><br>साधु साध्वित्यवोचंस्ते तत्र दैत्याः सविस्मयाः।<br>सोऽगच्छत् पारियात्रस्य गिरेः कन्दरमुत्तमम्॥ ७<br><br>सर्वर्तुकुसुमाकीर्णं नानौषधिविदीपितम्।<br>नानाधातुरसस्त्रावचित्रं नानागुहागृहम्॥ ८<br><br>गहनैः सर्वतो गूढं चित्रकल्पद्रुमाश्रयम्।<br>अनेकाकारबहुलं पृथक् पक्षिकुलाकुलम्॥ ९<br><br>नानाप्रस्रवणोपेतं नानाविधजलाशयम्।<br>प्राप्य तत्कन्दरं दैत्यश्चचार विपुलं तपः॥ १० | देवताओंको पराजित करेंगे और त्रिलोकीके सुखका उपभोग करेंगे; क्योंकि सुदृढ़ उपाय करनेवाला पुरुष ही अनपायिनी लक्ष्मीका पात्र होता है। चञ्चल बुद्धिवाला पुरुष चञ्चला लक्ष्मीकी रक्षा नहीं कर सकता। तारकासुरके उस कथनको सुनकर वहाँ उपस्थित सभी दानव और दैत्य आश्चर्यचकित हो उठे और वे सभी 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहने लगे। तत्पश्चात् तारकासुर (तपस्या करनेके लिये) पारियात्र पर्वत (अरावली एवं विंध्यका पश्चिम भाग)-की उत्तम कन्दराके पास पहुँचा। वह पर्वत सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले पुष्पोंसे व्याप्त, अनेक प्रकारकी ओषधियोंसे उद्दीप्त, विविध धातुओंके रसोंके चूते रहनेसे चित्र-विचित्र, अनेकों गुहारूपी गृहोंसे युक्त, सब ओरसे घने वृक्षोंसे घिरा, रंग-बिरंगे कल्पवृक्षोंसे आच्छादित और अनेकों प्रकारके आकारवाले बहुत-से पक्षि-समूहोंसे सर्वत्र व्याप्त था। उस पर्वतसे अनेकों झरने झर रहे थे तथा वह अनेकविध जलाशयोंसे सुशोभित था। उसकी कन्दरामें जाकर तारक दैत्य घोर तपस्यामें संलग्न हो गया॥ १—१०॥ |
| निराहारः पञ्चतपाः पत्रभुग् वारिभोजनः।<br>शतं शतं समानां तु तपांस्येतानि सोऽकरोत्॥ ११<br><br>ततः स्वदेहादुत्कृत्य कर्षं कर्षं दिने दिने।<br>मांसत्याग्नौ जुहावासौ ततो निर्मांसतां गतः॥ १२<br><br>तस्मिन् निर्मांसतां याते तपोराशित्वमागते।<br>जज्वलुः सर्वभूतानि तेजसा तस्य सर्वतः॥ १३<br><br>उद्विग्नाश्च सुराः सर्वे तपसा तस्य भीषिताः।<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा परमं तोषमागतः॥ १४<br><br>तारकस्य वरं दातुं जगाम त्रिदशालयात्।<br>प्राप्य तं शैलराजानं स गिरेः कन्दरस्थितम्।<br>उवाच तारकं देवो गिरा मधुरया युतः॥ १५ | पहले वह सौ-सौ वर्षोंके क्रमसे निराहार रहकर, फिर पञ्चाग्नि तापकर, पुनः पत्ते खाकर तत्पश्चात् केवल जल पीकर तपस्या करता रहा। इसके बाद उसने प्रतिदिन अपने शरीरसे सोलह माशा मांस काट-काटकर अग्निमें हवन करना प्रारम्भ किया, जिससे उसका शरीर मांसरहित हो गया। इस प्रकार उसके मांसरहित हो जानेपर वह तपःपुञ्ज-सा दीख पड़ने लगा। उसके तेजसे चारों ओर सभी प्राणी संतप्त हो उठे। समस्त देवगण उसकी तपस्यासे भयभीत हो उद्विग्न हो गये। इसी अवसरपर ब्रह्मा उसकी भीषण तपस्यासे परम प्रसन्न हो गये। तब वे तारकासुरको वर प्रदान करनेके लिये स्वर्गलोकसे चल पड़े और उस पर्वतराज पारियात्रपर जा पहुँचे। वहाँ वे देवाधिदेव उस पर्वतकी कन्दरामें स्थित तारकके निकट जाकर उससे मधुर वाणीमें बोले॥ ११—१५॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>पुत्रांलं तपसा तेऽस्तु नास्त्यसाध्यं तवाधुना।<br>वरं वृणीष्व रुचिरं यत् ते मनसि वर्तते॥ १६ | ब्रह्माजीने कहा—पुत्र! तुम्हें अब तप करनेकी आवश्यकता नहीं, वह पूरी हो चुकी। अब तुम्हारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। अब तुम्हारे मनमें जो रुचे, वह उत्तम वर माँग लो। |