मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| इन्द्र उवाच<br><br>सावधानेन मे वाचं शृणुध्वं नाकवासिनः।<br>भवन्तो यज्ञभोक्तारस्तुष्टात्मानोऽतिसात्त्विकाः ॥ ७४<br><br>स्वे महिम्नि स्थिता नित्यं जगतः परिपालकाः।<br>भवतश्चानिमित्तेन बाधन्ते दानवेश्वराः ॥ ७५<br><br>तेषां सामादि नैवास्ति दण्ड एव विधीयताम्।<br>क्रियतां समरोद्योगः सैन्यं संयुज्यतां मम ॥ ७६<br><br>आधीयन्तां च शस्त्राणि पूज्यन्तामस्त्रदेवताः।<br>वाहनानि च यानानि योजयन्तु सहामराः ॥ ७७<br><br>यमं सेनापतिं कृत्वा शीघ्रमेवं दिवौकसः।<br>इत्युक्ताः समनह्यन्त देवानां ये प्रधानतः ॥ ७८<br><br>वाजिनामयुतेनाजौ हेमघण्टापरिष्कृतम्।<br>नानाश्चर्यगुणोपेतं सम्प्राप्तं सर्वदैवतैः ॥ ७९<br><br>रथं मातलिना क्लृप्तं देवराजस्य दुर्जयम्।<br>यमो महिषमास्थाय सेनाग्रे समवर्तत ॥ ८०<br><br>चण्डकिङ्करवृन्देन सर्वतः परिवारितः।<br>कल्पकालोद्धतज्वालापूरिताम्बरलोचनः ॥ ८१<br><br>हुताशनश्छागरूढः शक्तिहस्तो व्यवस्थितः।<br>पवनोऽङ्कुशपाणिस्तु विस्तारितमहाजवः ॥ ८२<br><br>भुजगेन्द्र समारूढो जलेशो भगवान् स्वयम्।<br>नरयुक्तरथे देवो राक्षसेशो वियच्चरः ॥ ८३<br><br>तीक्ष्णखड्गयुतो भीमः समरे समवस्थितः।<br>महासिंहरवो देवो धनाध्यक्षो गदायुधः ॥ ८४ | इन्द्रने कहा—स्वर्गवासियो ! आपलोग सावधानीपूर्वक मेरी बात सुनें। आपलोग यज्ञके भोक्ता, संतुष्ट आत्मावाले, अत्यन्त सात्त्विक, अपनी महिमामें स्थित और नित्य जगत्का पालन करनेवाले हैं, तथापि दानवेश्वरगण अकारण ही आपलोगोंको पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। उनपर साम आदि तीन नीतियोंके प्रयोगसे कोई लाभ है नहीं, अतः दण्डनीतिका ही विधान करना चाहिये। इसलिये अब आपलोग युद्धकी तैयारी कीजिये और मेरी सेना सुसज्जित की जाय। देवगण! आपलोग संगठित होकर शस्त्रोंको धारण कीजिये, अस्त्र-देवताओंकी पूजा कीजिये और सवारियोंको सुसज्जित करके रथोंको जोत दीजिये।<br><br>इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवताओंमें जो प्रधान देव थे, वे लोग शीघ्र ही यमराजको सेनापतिके पदपर नियुक्त कर सेनाको संगठित करनेमें जुट गये। उस युद्धमें समस्त देवताओंके साथ दस हजार घोड़े सजाये गये, जो नाना प्रकारके आश्चर्ययुक्त गुणोंसे युक्त थे तथा जिनके गलेमें सोनेके घण्टे शोभा पा रहे थे। मातलिने देवराजके दुर्जय रथको सजाकर तैयार किया। यमराज अपने महिषपर सवार होकर सेनाके अग्रभागमें स्थित हुए। उस समय उनके नेत्र महाप्रलयके समय प्रचण्ड ज्वालासे धधकते हुए आकाशकी तरह धधक रहे थे और वे चारों ओरसे प्रचण्ड पराक्रमी किंकरोंसे घिरे हुए थे। अग्निदेव हाथमें शक्ति लिये हुए छागपर आरूढ हो उपस्थित हुए। अपने महान् वेगका विस्तार करनेवाले पवनदेवके हाथमें अङ्कुश शोभा पा रहा था। स्वयं भगवान् वरुण भुजगेन्द्रपर सवार थे। जो राक्षसोंके अधीश्वर, आकाशचारी और भयंकर रूपवाले हैं, जिनके हाथमें तेज तलवार शोभा पा रही थी, गदा जिनका आयुध है, जो सिंहके समान भयंकर रूपसे दहाड़नेवाले हैं, वे धनाध्यक्ष देवाधिदेव कुबेर पालकीपर बैठकर समरमें उपस्थित हुए॥ ७४-८४॥ | | चन्द्रादित्यावश्विनौ च चतुरङ्गबलान्वितौ।<br>राजभिः सहितास्तस्थुर्गन्धर्वा हेमभूषणाः ॥ ८५<br><br>हेमपीठोत्तरासङ्गाश्चित्रवर्मरथायुधाः ।<br>नाकपृष्ठशिखण्डास्तु वैडूर्य्यमकरध्वजाः ॥ ८६ | चतुरङ्गिणी सेनाके साथ चन्द्रमा, सूर्य और दोनों अश्विनीकुमार भी सम्मिलित हुए। स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित गन्धर्वगण अपने अधिपतियोंके साथ उपस्थित हुए। उनके आसन स्वर्णनिर्मित थे, उनके उपरणोंमें सोनेकी पच्चीकारी की गयी थी, वे चित्र-विचित्र कवच, रथ और आयुधसे युक्त थे, उनके सिरोंपर स्वर्गीय मयूरपिच्छ शोभा पा रहा था और उनके ध्वजोंपर वैदूर्यमणिकी मकराकृति बनी हुई थी। |