मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 565, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १४८ * ५५५
| तच्छ्रुत्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः।<br>बृहस्पतिमुवाचेदं वाक्यं काले महाभुजः॥ ६२<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>सम्प्राप्नोति विमर्दोऽयं देवानां दानवैः सह।<br>कार्यं किमत्र तद् ब्रूहि नीत्युपायसमन्वितम्॥ ६३<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महेन्द्रस्य गिरांपतिः।<br>इत्युवाच महाभागो बृहस्पतिरुदारधीः॥ ६४<br><br>सामपूर्वा स्मृता नीतिश्चतुरङ्गां पताकिनीम्।<br>जिगीषतां सुरश्रेष्ठ स्थितिरैषा सनातनी॥ ६५<br><br>साम भेदस्तथा दानं दण्डश्चाङ्गचतुष्टयम्।<br>नीतौ क्रमाद्देशकालरिपियोग्यक्रमोदिदम्॥ ६६<br><br>साम दैत्येषु नैवास्ति यतस्ते लब्धसंश्रयाः।<br>जातिधर्मेण वाभेद्या दानं प्राप्तश्रिये च किम्॥ ६७<br><br>एकोऽभ्युपायो दण्डोऽत्र भवतां यदि रोचते।<br>दुर्जेनेषु कृतं साम महद्याति च बन्ध्यताम्॥ ६८<br><br>भयादिति व्यवस्यन्ति क्रूराः साम महात्मनाम्।<br>ऋजुतामार्यबुद्धित्वं दयानीतिव्यतिक्रमम्॥ ६९<br><br>मन्यन्ते दुर्जना नित्यं साम चापि भयोदयात्।<br>तस्माद् दुर्जनमाक्रान्तुं श्रेयान् पौरुषसंश्रयः॥ ७०<br><br>आक्रान्ते तु क्रिया युक्ता सतामेतन्महाव्रतम्।<br>दुर्जनः सुजनत्वाय कल्पते न कदाचन॥ ७१<br><br>सुजनोऽपि स्वभावस्य त्यागं वा चेत्कदाचन।<br>एवं मे बुध्यते बुद्धिर्भवन्तोऽत्राध्यवस्यताम्॥ ७२<br><br>एवमुक्तः सहस्त्राक्ष एवमेवेत्युवाच तम्।<br>कर्तव्यतां स संचिन्त्य प्रोवाचामरसंसदि॥ ७३ | उसे सुनकर उस समय महाबाहु देवराज इन्द्रने पहले तो अपनी आँखें बंद कर लीं, फिर वे बृहस्पतिसे इस प्रकार बोले॥ ५६—६२॥<br><br>इन्द्रने कहा—गुरुदेव! देवताओंका दानवोंके साथ यह अत्यन्त भयंकर संघर्ष आ पहुँचा है। अब इस विषयमें क्या करना चाहिये, उपायसहित वह नीति बतलाइये। इन्द्रके इस वचनको सुनकर वाणीके अधीश्वर उदार बुद्धिवाले महान् भाग्यशाली बृहस्पति इस प्रकार बोले—'सुरश्रेष्ठ! (इस प्रकारकी) चतुरंगिणी सेनापर विजय पानेकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सामपूर्वक नीति बतलायी गयी है—यही सनातनी स्थिति है। नीतिके साम, भेद, दान और दण्ड—ये चार अङ्ग हैं। राजनीतिके प्रयोगमें क्रमशः देश, काल और शत्रु की योग्यता आदिका क्रम देखना चाहिये। इनमें दैत्योंपर सामनीतिका प्रयोग तो हो नहीं सकता; क्योंकि उन्हें आश्रय प्राप्त हो चुका है (वे मदमत्त हैं), जातिधर्मके अनुसार भेदनीतिका प्रयोग करके उनमें फूट भी नहीं डाला जा सकता तथा जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त है, उन्हें दान देनेसे भी क्या लाभ होगा? अतः इनपर एकमात्र दण्डका ही उपाय उपयुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि आपको मेरी बात रुचती हो तो इसीका अवलम्बन कीजिये; क्योंकि दुर्जनोंके साथ की गयी सामनीति एकदम निरर्थक होती है। क्रूर लोग महात्माओं द्वारा प्रयुक्त की गयी सामनीतिको भयवश की हुई मानते हैं, अतः उनके साथ की गयी सरलता, उदारबुद्धिका प्रयोग और दयानीतिका विपरीत परिणाम होता है। दुर्जनलोग सामनीतिको भी सदा भयभीत होनेके कारण प्रयुक्त की हुई मानते हैं। इसलिये दुर्जनोंपर आक्रमण करनेके लिये पुरुषार्थका ही आश्रय लेना श्रेयस्कर है। दुर्जनोंके आक्रान्त हो जानेपर ही उनपर प्रयुक्त की हुई क्रिया फलवती होती है। यह सत्पुरुषोंका महान् व्रत है। सुजन कभी (कुसङ्गवश) अपने उत्तम स्वभावका त्याग करनेकी इच्छा कर सकता है, परंतु दुर्जन कभी भी सुजन नहीं हो सकता। मेरी बुद्धिमें तो ऐसा ही आ रहा है, अब आपलोग इस विषयमें जैसा विचार करें। इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा—'ऐसा ही होगा।' फिर वे अपने कर्तव्यके विषयमें भलीभाँति सोच-विचार कर उस देवसभामें बोले॥ ६३-७३॥ |