मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 567, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 567
* अध्याय १४८ * ५५७
| श्लोक | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| जवारक्तोत्तरासङ्गा राक्षसा रक्तमूर्धजाः।<br>गृध्रध्वजा महावीर्या निर्मलायोविभूषणाः ॥ ८७<br><br>मुसलासिगदाहस्ता रथे चोष्णीषदंशिताः।<br>महामेघरवा नागा भीमोल्काशनिहेतयः ॥ ८८<br><br>यक्षाः कृष्णाम्बरभृतो भीमबाणधनुर्धराः।<br>ताम्रोलूकध्वजा रौद्रा हेमरत्नविभूषणाः ॥ ८९<br><br>द्वीपिचर्मोत्तरासङ्गं निशाचरबलं बभौ।<br>गार्ध्रपत्रध्वजप्रायमस्थिभूषणभूषितम् ॥ ९०<br><br>मुसलायुधदुष्प्रेक्ष्यं नानाप्राणिमहारवम्।<br>किन्नराः श्वेतवसनाः सितपत्रपताकिनः ॥ ९१<br><br>मत्तेभवाहनप्रायास्तीक्ष्णतोमरहेतयः । | इधर महान् पराक्रमी राक्षसोंके ऊपरने जपा-कुसुमके समान लाल रंगके थे। उनके बाल भी लाल थे। उनकी ध्वजाओंपर गीधके आकार बने हुए थे। वे निर्मल लोहेके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथमें मूसल, गदा और तलवार शोभा पा रहे थे। वे पगड़ी बाँधे हुए रथपर सवार थे। वे हाथीके समान विशालकाय थे और मेघके समान भयंकर गर्जना कर रहे थे, जो ऐसा लग रहा था मानो भयंकर उल्कापात अथवा वज्रपात हो रहा हो। यक्षलोग काला वस्त्र पहने हुए थे और उनके हाथोंमें भयंकर धनुष-बाण शोभा पा रहे थे। वे बड़े भयंकर और स्वर्ण एवं रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी ध्वजाओंपर ताँबेके उलूक बने हुए थे। निशाचरोंकी सेना गैंडेके चमड़ेका उपराना धारण किये हुए बड़ी शोभा पा रही थी। उनकी ध्वजाओंमें गीधोंके पंख लगे हुए थे। वे हड्डीके आभूषणोंसे विभूषित थे। वे आयुधरूपमें मूसल धारण किये हुए थे, जिससे देखनेमें बड़े भयंकर लग रहे थे। उनकी सेनामें बहुत-से प्राणियोंके भयंकर शब्द हो रहे थे। किंनरगण श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। उनकी श्वेत पताकाओंपर बाणके चिह्न बने हुए थे। वे प्रायः मतवाले गजराजोंपर सवार थे और तेज तोमर उनके अस्त्र थे॥ ८५-९१ १/२॥ |
| मुक्ताजालपरिष्कारो हंसो रजतनिर्मितः ॥ ९२<br><br>केतुर्जलाधिनाथस्य भीमधूमध्वजानलः।<br>पद्मरागमहारत्नविटपं धनदस्य तु ॥ ९३<br><br>ध्वजं समुच्छ्रितं भाति गन्तुकाममिवाम्बरम्।<br>वृकेण काष्ठलोहेन यमस्यासीन्महाध्वजः ॥ ९४<br><br>राक्षसेशस्य केतोर्वै प्रेतस्य मुखमाबभौ।<br>हिमसिंहध्वजौ देवौ चन्द्रार्कावमितद्युती ॥ ९५<br><br>कुम्भेन रत्नचित्रेण केतुरश्विनयोरभूत्।<br>हेममातङ्गरचितं चित्ररत्नपरिष्कृतम् ॥ ९६<br><br>ध्वजं शतक्रतोरासीत् सितचामरमण्डितम्। | जलेश्वर वरुणकी ध्वजापर चाँदीका बना हुआ हंस अङ्कित था, जिसे मुक्तासमूहोंसे सुशोभित किया गया था। वह भयंकर धूमसे घिरे हुए अग्नि-ध्वज-जैसा दीख रहा था। कुबेरकी ध्वजापर पद्मरागमणि एवं बहुमूल्य रत्नोंसे वृक्षकी आकृति बनायी गयी थी। यमराजके महान् ध्वजपर काष्ठ और लोहेसे भेड़ियेका चिह्न अङ्कित किया गया था। वह ऊँचा ध्वज ऐसा लग रहा था मानो आकाशको पार कर जाना चाहता है। राक्षसेशके ध्वजपर प्रेतका मुख शोभा पा रहा था। अमित तेजस्वी चन्द्रदेव और सूर्यदेवके ध्वजपर सोनेके सिंह बने हुए थे। अश्विनीकुमारोंके ध्वजोंपर रत्नोंद्वारा कुम्भका आकार बना हुआ था। इन्द्रके ध्वजपर सोनेका हाथी बना हुआ था, जिसे चित्र-विचित्र रत्नोंसे सजाया गया था और वह श्वेत चँवरसे सुशोभित था। |
| सनागयक्षगन्धर्वमहोरगनिशाचराः ॥ ९७<br><br>सेना सा देवराजस्य दुर्जया भुवनत्रये।<br>कोटयस्तास्त्रयस्त्रिंशद्वैवे देवनिकायिनाम् ॥ ९८ | नाग, यक्ष, गन्धर्व, महोरग और निशाचरोंसे भरी हुई देवराज इन्द्रकी वह सेना त्रिभुवनमें अजेय थी। इस प्रकार उस देव-सेनामें देवताओंकी संख्या तैंतीस करोड़ थी। |
| हिमाचलाभे सितकर्णचामरे<br>सुवर्णपद्मामलसुन्दरस्रजि ।<br>कृताभिरागोज्ज्वलकुङ्कुमाङ्कुरे<br>कपोललीलालिकदम्बसंकुले ॥ ९९ | उस समय स्वर्गलोकमें सहस्रनेत्रधारी महाबली पाकशासन इन्द्र ऐरावत नामक गजराजपर, जो हिमालयके समान विशालकाय था, जिसके श्वेत कान चँवरके समान हिल रहे थे, जिसके गलेमें स्वर्णनिर्मित कमलोंकी निर्मल एवं सुन्दर माला लटक रही थी, जिसके उज्ज्वल मस्तकपर कुङ्कुमसे पत्रभङ्गीकी |