मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 568, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५५८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| स्थितस्तदैरावतनामकुञ्जरे<br>महाबलश्चित्रविभूषणाम्बरः ।<br>विशालवस्त्रांशुवितानभूषितः<br>प्रकीर्णकेयूरभुजाग्रमण्डलः ।<br>सहस्रदृग्वन्दिसहस्रसंस्तुत-<br>स्त्रिविष्टपेऽशोभत पाकशासनः ॥ १००<br>तुरङ्गमातङ्गबलौघसंकुला<br>सितातपत्रध्वजराजिशालिनी ।<br>चमूश्च सा दुर्जयपत्रिसंतता<br>विभाति नानायुधयोधदुस्तरा ॥ १०१ | रचना की गयी थी तथा जिसके कपोलपर भ्रमरसमूह क्रीड़ा करते हुए मँडरा रहे थे, बैठे हुए शोभा पा रहे थे। वे चित्र-विचित्र आभूषण और वस्त्र पहने हुए थे, चमकीले वस्त्रोंके बने हुए विशाल छत्रसे सुशोभित थे, उनके बाजूबंदकी फैलती हुई प्रभा भुजाके अग्रभागको सुशोभित कर रही थी और हजारों वंदी उनकी स्तुति कर रहे थे। इसी प्रकार जो घोड़ों और हाथियोंके सैन्यसमूहसे व्याप्त, श्वेत छत्र और ध्वजसमूहोंसे सुशोभित, अजेय पैदल सैनिकोंसे भरी हुई तथा नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले योद्धाओंसे युक्त होनेके कारण दुस्तर वह देवसेना भी अत्यन्त शोभा पा रही थी॥ ९२-१०१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने रणयोजनो नामाष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें रणयोजन नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४८ ॥
एक सौ उनचासवाँ अध्याय
देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ
| सूत उवाच<br><br>सुरासुराणां सम्मर्दस्तस्मिन्नत्यन्तदारुणे।<br>तुमुलोऽतिमहानासीत् सेनयोरुभयोरपि॥ १<br>गर्जतां देवदैत्यानां शङ्खभेरीरवेण च।<br>तूर्याणां चैव निर्घोषैर्मातङ्गानां च बृंहितैः॥ २<br>हेषतां हयवृन्दानां रथनेमिस्वनेन च।<br>ज्याघोषेण च शूराणां तुमुलोऽतिमहान्भूत्॥ ३<br>समासाद्योभये सेने परस्परजयैषिणाम्।<br>रोषेणातिपरीतानां त्यक्तजीवितचेतसाम्॥ ४<br>समासाद्य तु तेऽन्योन्यं प्रक्रमेण विलोमतः।<br>रथेनासक्तपादातो रथेन च तुरङ्गमः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! देवताओं और असुरोंके उस अत्यन्त भीषण संग्रामके अवसरपर दोनों ही सेनाओंमें घोर गर्जनाके साथ-साथ अत्यन्त भयंकर संघर्ष छिड़ गया। उस समय देवता और दैत्य सिंहनाद कर रहे थे, शङ्ख, भेरी और तुरहीका शब्द हो रहा था, हाथी चिग्घाड़ रहे थे, यूथ-के-यूथ घोड़े हींस रहे थे, रथके पहियोंकी घरघराहट हो रही थी और वीरोंद्वारा खींची गयी प्रत्यञ्जाके चटाचट शब्द हो रहे थे। इन सबके सम्मिलित हो जानेसे अत्यन्त भयानक ध्वनि होने लगी। अतिशय क्रोधसे युक्त हो जीवनकी आशाका परित्याग कर परस्पर एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे युक्त वीरोंकी दोनों सेनाएँ आमने-सामने घमासान युद्ध करने लगीं। उस समय परस्पर अनुलोम और विलोमका क्रम नहीं रह गया। पैदल सैनिक रथीके साथ, घुड़सवार रथीके साथ, |