मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५६४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निष्विपेष महीपृष्ठे बहुशः पाष्णिपाणिभिः।<br>यावद्यमस्य वदनात् सुस्राव रुधिरं बहु॥ ४८<br>निर्जीवितं यमं दृष्ट्वा ततः संत्यज्य दानवः।<br>जयं प्राप्योद्धतं दैत्यो नादं मुक्त्वा महास्वनः॥ ४९<br>स्वीयं सैन्यं समासाद्य तस्थौ गिरिरिवाचलः। | ग्रसन उन्हें बलपूर्वक पृथ्वीपर पटककर बारम्बार रगड़ने लगा और पैरोंकी ठोकरों और घूँसोंसे तबतक मारता रहा, जबतक यमराजके मुखसे बहुत-सा रक्त बहने लगा। तत्पश्चात् दानवराजने यमराजको प्राणहीन देखकर उन्हें छोड़ दिया। फिर गम्भीर गर्जना करनेवाला दैत्यराज ग्रसन विजयी होकर सिंहनाद करता हुआ अपनी सेनामें पहुँचकर पर्वतकी भाँति अटल होकर खड़ा हो गया॥ ४२-४९ १/२ ॥ |
| धनाधिपस्य जम्भेन सायकैर्मर्मभेदिभिः॥ ५०<br>दिशोऽवरुद्धाः क्रुद्धेन सैन्यं चास्य निकृन्तितम्।<br>ततः क्रोधपरीतस्तु धनेशो जम्भदानवम्॥ ५१<br>हृदि विव्याध बाणानां सहस्त्रेणाग्निवर्चसाम्।<br>सारथिं च शतेनाजौ ध्वजं दशभिरेव च॥ ५२<br>हस्तौ च पञ्चसप्तत्या मार्गणैर्दशभिर्धनुः।<br>मार्गणैर्बर्हिपत्राङ्गैरस्तैलधौतैरजिह्मगैः ॥ ५३<br>सिंहमेकेन तं तीक्ष्णैर्विव्याध दशभिः शरैः।<br>जम्भस्तु कर्म तद्दृष्ट्वा धनेशस्यातिदुष्करम्॥ ५४ | उधर क्रोधसे भरे हुए जम्भने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा कुबेरके सारे मार्ग (दिशाएँ) अवरुद्ध कर दिये और उनकी सेनाको काटना आरम्भ किया। यह देखकर धनेश क्रोधसे भर उठे। उन्होंने युद्धभूमिमें अग्निके समान वर्चस्वी एक हजार बाणोंसे दानवराज जम्भके हृदयको बींध दिया। फिर सौ बाणोंसे सारथिको, दस बाणोंसे ध्वजको, पचहत्तर बाणोंसे उसके दोनों हाथोंको, दस बाणोंसे धनुषको, एक बाणसे (उसके वाहन) सिंहको और दस तीखे बाणोंसे पुनः उस दानवराजको बींध दिया। इन सब बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे तथा ये तेलमें डालकर साफ किये हुए और सीधे लक्ष्यवेध करनेवाले थे। धनेशके उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर |
| हृदि धैर्यं समालम्व्य किञ्चित्संत्रस्तमानसः।<br>जग्राह निशितान् बाणाञ्छत्रुमर्मविभेदिनः॥ ५५<br>आकर्णाकृष्टचापस्तु जम्भः क्रोधपरिप्लुतः।<br>विव्याध धनदं तीक्ष्णैः शरैर्वक्षसि दानवः॥ ५६<br>सारथिं चास्य बाणेन दृढेनाभ्यहनद्धृदि।<br>चिच्छेद ज्यामथैकेन तैलधौतेन दानवः॥ ५७ | जम्भका मन कुछ भयभीत हो उठा। फिर उसने हृदयमें धैर्य धारण कर शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले तीखे बाणोंको हाथमें लिया। उस समय दानवराज जम्भ क्रोधसे भरा हुआ था। उसने अपने धनुषको कानतक खींचकर तीखे बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको बींध दिया। फिर उनके सारथिके हृदयपर एक सुदृढ़ बाणसे आघात किया और तेलमें सफाये हुए एक बाणसे उनकी प्रत्यञ्चाको काट दिया। |
| ततस्तु निशितैर्बाणैर्दारुणैर्मर्मभेदिभिः।<br>विव्याधोरसि वित्तेशं दशभिः क्रूरकर्मकृत्॥ ५८<br>मोहं परमतोगच्छन् दृढविद्धो हि वित्तपः।<br>स क्षणाद् धैर्यमालम्ब्य धनुराकृष्य भैरवम्॥ ५९<br>किरन् बाणसहस्त्राणि निशितानि धनाधिपः।<br>दिशः खं विदिशो भूमीरनीकान्यसुरस्य च॥ ६० | तदनन्तर क्रूरकर्मा दानवराज जम्भने तीखे एवं मर्मभेदी दस भयंकर बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको पुनः घायल कर दिया। तब बुरी तरह घायल हुए कुबेर मूर्च्छित हो गये। क्षणमात्रके बाद कुबेरकी मूर्च्छा भंग हुई, तब उन्होंने धैर्य धारणकर अपने भयंकर धनुषको वेगपूर्वक खींचकर हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए दिशाओं, विदिशाओं, आकाश, पृथ्वी और |