भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 573
* अध्याय १५० *५६३
तस्यापरे तु गात्रेषु दशनैरप्यदंशयन्।<br>अपरे मुष्टिभिः पृष्ठं किंकराः प्रहरन्ति च॥ ३६<br><br>अभिद्रुतस्तथा घोरैर्ग्रसनः क्रोधमूर्च्छितः।<br>उत्सृज्य गात्रं भूपृष्ठे निष्पिपेप सहस्रशः॥ ३७<br><br>कांश्चिदुत्थाय मुष्टीभिर्जघ्ने किङ्करसंश्रयान्।<br>स तु किङ्करयुद्धेन ग्रसनः श्रममाप्तवान्॥ ३८<br><br>तमालोक्य यमः श्रान्तं निहतां च स्ववाहिनीम्।<br>आजगाम समुद्यम्य दण्डं महिषवाहनः॥ ३९<br><br>ग्रसनस्तु समायान्तमाजघ्ने गदयोरसि।<br>अचिन्तयित्वा तत्कर्म ग्रसनस्यान्तकोऽरिहा॥ ४०<br><br>जघ्ने रथस्य मूर्धन्यान् व्याघ्रान् दण्डेन कोपनः।<br>स रथो दण्डमथितैर्व्याघ्रैरर्धैर्विकृष्यते॥ ४१प्रहार कर रहे थे। कुछ उसके शरीराङ्गोंमें दाँतोंसे काट रहे थे। दूसरे किंकर उसकी पीठपर मुक्केसे प्रहार कर रहे थे। इस प्रकार घोरकर्मा किंकरोंद्वारा पीछा किये जानेपर ग्रसन अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। उसने अपने शरीरको भूतलपर गिराकर हजारों किंकरोंको उसके नीचे पीस डाला। फिर उठकर कुछ किंकरोंको मुक्केसे पीटकर मौतके घाट उतार दिया। इस प्रकार किंकरोंके साथ युद्ध करनेसे ग्रसन थकावटसे चूर हो गया था। तब ग्रसनको थका हुआ तथा अपनी सेनाको मारी गयी देखकर महिषवाहन यमराज हाथमें दण्ड लेकर आ पहुँचे। ग्रसनने सम्मुख आये हुए यमराजके वक्षःस्थलपर गदासे प्रहार किया। तब शत्रुसूदन यमराजने ग्रसनके उस प्रहारकी कुछ भी परवाह न कर उसके रथके अग्रभागमें जुते हुए बाघोंपर क्रोधपूर्वक दण्डसे प्रहार किया। उस दण्डप्रहारसे आधे बाघोंके मारे जानेपर वह रथ आधे बाघोंद्वारा ही खींचा जा रहा था॥ ३१—४१॥
संशयः पुरुषस्येव चित्तं दैत्यस्य तद्रथम्।<br>समुत्सृज्य रथं दैत्यः पदातिर्धरणीं गतः॥ ४२<br><br>यमं भुजाभ्यामादाय योधयामास दानवः।<br>यमोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य बाहुयुद्धेष्ववर्तत॥ ४३<br><br>ग्रसनः कटिवस्त्रस्तु यमं गृह्य बलोद्धतः।<br>भ्रामयामास वेगेन प्रदीपमिव सम्भ्रमम्॥ ४४<br><br>यमोऽपि कण्ठेऽवष्टभ्य दैत्यं बाहुयुगेन तु।<br>वेगेन भ्रामयामास समुत्कृष्य महीतलात्॥ ४५<br><br>ततो मुष्टिभिराजघ्नुरर्दयन्तो परस्परम्।<br>दैत्येन्द्रस्यातिकायत्वात्ततः श्रान्तभुजो यमः॥ ४६<br><br>स्कन्धे निधाय दैत्यस्य मुखं विश्रान्तिमैच्छत।<br>तमालक्ष्य ततो दैत्यः श्रान्तमन्तकमोजसा॥ ४७उस समय दैत्यराज ग्रसनका वह रथ पुरुषके संशयग्रस्त चित्तकी भाँति अस्थिर हो गया था। अतः दैत्यराज ग्रसन रथको छोड़कर भूतलपर आ गया और पैदल ही आगे बढ़कर यमराजको दोनों भुजाओंसे पकड़कर युद्ध करने लगा। तब यमराज भी शस्त्रोंको छोड़कर बाहुयुद्धमें प्रवृत्त हो गये। बलाभिमानी ग्रसन यमराजके कमरबंदको पकड़कर उन्हें घूमते हुए दीपककी भाँति वेगपूर्वक घुमाने लगा। तब यमराज भी अपनी दोनों भुजाओंसे दैत्यके गलेको पकड़कर उसे वेगपूर्वक भूतलसे ऊपर खींचकर बड़ी देरतक घुमाते रहे। तत्पश्चात् वे दोनों परस्पर एक-दूसरेको पीड़ित करते हुए मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। उस समय दैत्येन्द्र ग्रसनके विशालकाय होनेके कारण यमराजकी भुजाएँ शिथिल हो गयीं। तब वे उस दैत्यके कंधेपर अपना मुख रखकर विश्राम करनेकी इच्छा करने लगे। यमराजको इस प्रकार थका हुआ देखकर
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