मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 578, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 578
५६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुजम्भस्तत्समालोच्य दानवोऽतिपराक्रमः।<br>अभिदुद्राव वेगेन पदातिर्धनदं नदन्॥ १००॥ | देखकर परम पराक्रमी दानवराज जम्भ सिंहनाद करता हुआ पैदल ही वेगपूर्वक कुबेरपर चढ़ दौड़ा॥ ९३-१००॥ |
| अथाभिमुखमायान्तं दैत्यं दृष्ट्वा धनाधिपः।<br>बभूव सम्भ्रमाविष्टः पलायनपरायणः॥ १०१॥ | इस प्रकार उस दैत्यको अपनी ओर आता हुआ देखकर कुबेर घबरा उठे और रणभूमिसे भाग खड़े हुए। |
| ततः पलायतस्तस्य मुकुटं रत्नमण्डितम्।<br>पपात भूतले दीप्तं रविबिम्बमिवाम्बरात्॥ १०२॥ | भागते समय उनका रत्नजटित उद्दीप्त मुकुट इस प्रकार भूतलपर गिर पड़ा मानो आकाशसे सूर्यका बिम्ब गिर पड़ा हो। |
| शूराणामभिजातानां भर्तुर्युपसृते रणात्।<br>मर्तुं संग्रामशिरसि युक्तं तद्भूषणाग्रतः॥ १०३॥ | 'रणभूमिसे स्वामीके पलायन कर जानेपर उनके आभूषणोंके समक्ष उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए वीरोंका संग्रामके मुहानेपर मर जाना उचित है।' |
| इति व्यवस्य दुर्धर्षा नानाशस्त्रास्त्रपाणयः।<br>युयुत्सवः स्थिता यक्षा मुकुटं परिवार्य तम्॥ १०४॥ | ऐसा निश्चयकर दुर्धर्ष यक्ष हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारणकर युद्धकी अभिलाषासे युक्त हो उस मुकुटको घेरकर खड़े हो गये; |
| अभिमानधना वीरा धनदस्य पदानुगाः।<br>तानमर्षाच्च सम्प्रेक्ष्य दानवश्चण्डपौरुषः॥ १०५॥ | क्योंकि कुबेरके अनुचर वे वीरवर यक्ष स्वाभिमानके धनी थे। तदनन्तर उन्हें इस प्रकार युद्धोन्मुख देखकर प्रचण्ड पुरुषार्थी दानवराज |
| भुशुण्डीं भैरवाकारां गृहीत्वा शैलगौरवाम्।<br>रक्षिणो मुकुटस्याथ निष्पिपेप निशाचरान्॥ १०६॥ | जम्भ अमर्षसे भर गया। तब उसने पर्वतकी-सी गम्भीर एवं भयंकर आकारवाली भुशुण्डि लेकर उससे मुकुटके रक्षक निशाचरोंको पीस डाला। |
| तान् प्रमथ्याथ दनुजो मुकुटं तत् स्वके रथे।<br>समारोप्यामररिपुर्जित्वा धनदमाहवे॥ १०७॥<br>धनानि रत्नानि च मूर्तिमन्ति<br>तथा निधानानि शरीरिणश्च।<br>आदाय सर्वाणि जगाम दैत्यो<br>जम्भः स्वसैन्यं दनुजेन्द्रसिंहः<br>धनाधिपो वै विनिकीर्णमूर्धजो<br>जगाम दीनः सुरभर्तुरन्तिकम्॥ १०८॥ | इस प्रकार उनका संहार कर उस देवशत्रु दानवने उस मुकुटको अपने रथपर रख लिया। तत्पश्चात् सिंहके समान पराक्रमी दैत्येन्द्र जम्भ युद्धभूमिमें कुबेरको जीतकर सैनिकोंके सभी आभूषणों, सम्पत्तियों तथा मूर्तिमान् रत्नोंको लेकर अपनी सेनाकी ओर चला गया। इधर कुबेर बाल बिखेरे हुए दीनभावसे देवराज इन्द्रके निकट चले गये॥ १०१-१०८॥ |
| कुजम्भेनाथ संसक्तो रजनीचरनन्दनः।<br>मायाममोघामाश्रित्य तामसीं राक्षसेश्वरः॥ १०९॥ | उधर असुरनन्दन राक्षसेश्वर निर्ऋति अपनी अमोघ राक्षसी मायाका आश्रय लेकर कुजम्भके साथ भिड़े हुए थे। |
| मोहयामास दैत्येन्द्रं जगत् कृत्वा तमोमयम्।<br>ततो विफलनेत्राणि दानवानां बलानि तु॥ ११०॥ | उन्होंने जगत्को अन्धकारमय बनाकर दैत्यराज कुजम्भको मोहमें डाल दिया। उससे दानवोंकी सेनामें |
| न शेकुश्चलितुं तत्र पदादपि पदं तदा।<br>ततो नानाशस्त्रवर्षेण दानवानां महाचमूर्म्॥ १११॥ | किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था। वे एक पगसे दूसरे पगतक भी चलनेमें असमर्थ हो गये थे। तब उन्होंने अनेकों |