मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १५० * | ५६९ |
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| जघान घननीहारतिमिरातुरवाहनाम् ।<br>वध्यमानेषु दैत्येषु कुजम्भे मूढचेतसि॥ ११२<br><br>महिषो दानवेन्द्रस्तु कल्पान्ताम्भोदसंनिभः ।<br>अस्त्रं चकार सावित्रमुल्कासंघातमण्डितम्॥ ११३<br><br>विजृम्भत्यथ सावित्रे परमास्त्रे प्रतापिनि ।<br>प्रणाशमगमत् तीव्रं तमो घोरमनन्तरम्॥ ११४<br><br>ततोऽस्त्रं विस्फुलिङ्गाङ्कं तमः कृत्स्नं व्यनाशयत् ।<br>प्रफुल्लारुणपद्मौघं शरदीवामलं सरः॥ ११५<br><br>ततस्तमसि संशान्ते दैत्येन्द्राः प्राप्तचक्षुषः ।<br>चक्रुः क्रूरेण मनसा देवानीकैः सहाद्भुतम्॥ ११६<br><br>शस्त्रैरमर्षानिर्मुक्तैर्भुजङ्गास्त्रं विनोदितम् ।<br>अथादाय धनुर्घोरमिषूंश्चाशीविषोपमान्॥ ११७<br><br>कुजम्भोऽधावत् क्षिप्रं रक्षोराजबलं प्रति ।<br>राक्षसेन्द्रस्तमायान्तं विलोक्य सपदानुगः॥ ११८<br><br>विव्याध निशितैर्बाणैः क्रूराशीविषभीषणैः ।<br>तदादानं च संधानं न मोक्षश्चापि लक्ष्यते॥ ११९<br><br>चिच्छेदास्य शरव्रातान् स्वशरैरतिलाघवात् ।<br>ध्वजं परमतीक्ष्णेन चित्रकर्मामरिद्विषः॥ १२०<br><br>सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ।<br>कुजम्भः कर्म तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य संयुगे॥ १२१<br><br>रोषरक्तेक्षणयुतो रथादाप्लुत्य दानवः ।<br>खड्गं जग्राह वेगेन शरदम्बरनिर्मलम्॥ १२२<br><br>चर्म चोदयखण्डेन्दुदशकेन विभूषितम् ।<br>अभ्यद्रवद् रणे दैत्यो रक्षोऽधिपतिमोजसा॥ १२३<br><br>तं रक्षोऽधिपतिः प्राप्तं मुद्गरेणाहनद्धृदि ।<br>स तु तेन प्रहारेण क्षीणः सम्भ्रान्तमानसः॥ १२४<br><br>तस्थावचेष्टो दनुजो यथा धीरो धराधरः ।<br>स मुहूर्तं समाश्वस्तो दानवेन्द्रोऽतिदुर्जयः॥ १२५ | अस्त्रोंकी वर्षा करके घने कुहासेके अन्धकारसे व्याकुल हुए वाहनोंवाली दानवोंकी उस विशाल सेनाका संहार कर दिया। इस प्रकार दैत्योंके मारे जाने एवं कुजम्भके किंकर्तव्यविमूढ हो जानेपर प्रलयकालीन मेघके समान शरीरवाले दानवेन्द्र महिषने उल्कासमूहसे सुशोभित सावित्र नामक अस्त्रको प्रकट किया। उस प्रतापशाली सावित्र नामक परमास्त्रके प्रकट होते ही सारा निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। तत्पश्चात् उस अस्त्रसे चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिन्होंने सम्पूर्ण अन्धकारको नष्ट कर दिया। उस समय सारा जगत् शरद्-ऋतुमें खिले हुए लाल कमलसमूहोंसे व्याप्त निर्मल सरोवरकी भाँति शोभा पाने लगा। इस प्रकार अन्धकारके नष्ट हो जानेपर जब दैत्येन्द्रोंको पुनः नेत्रज्योति प्राप्त हो गयी, तब वे क्रूर मनसे देवसेनाओंके साथ अद्भुत संग्राम करने लगे। क्रोधसे भरे हुए दैत्य शस्त्रोंका प्रहार तो कर ही रहे थे, साथ ही उन्होंने भुजंगास्त्रका भी प्रयोग किया॥१०९-११६ $\frac{१}{२}$॥<br><br>तदनन्तर कुजम्भने अपना भयंकर धनुष और सर्प-विषके समान विषैले बाणोंको लेकर शीघ्र ही राक्षसराजकी सेनापर धावा किया। तब अनुचरोंसहित राक्षसेन्द्र निर्ऋतिने उस दैत्यको आक्रमण करते देखकर उसे विषैले सर्पोंके समान भीषण एवं तीखे बाणोंसे बींध दिया। उस समय वे इतनी फुर्तीसे बाण चला रहे थे कि बाणका लेना, संधान करना और छोड़ना दीख ही नहीं पड़ता था। विचित्र कर्म करनेवाले राक्षसेश्वरने बड़ी फुर्तीसे अपने बाणोंद्वारा उस देवद्रोही दैत्यके बाणसमूहोंको काट दिया और एक अत्यन्त तेज बाणसे उसके ध्वजको भी काट गिराया। साथ ही एक भाला मारकर उसके सारथिको भी रथपर बैठनेके स्थानसे नीचे गिरा दिया। युद्धस्थलमें राक्षसेश्वरके उस कर्मको देखकर कुजम्भके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, तब उस दानवने वेगपूर्वक रथसे कूदकर शरत्कालीन आकाशकी भाँति निर्मल तलवार और उदयकालीन चन्द्रमाके समान दस चिह्नोंसे सुशोभित ढाल हाथमें उठा लिया। फिर तो वह दैत्य रणभूमिमें बड़े पराक्रमसे राक्षसेश्वरकी ओर झपटा। उसे निकट आया हुआ देखकर राक्षसेश्वरने उसके हृदयपर मुद्गरसे प्रहार किया। उस प्रहारसे कुजम्भ क्षतिग्रस्त होकर विक्षुब्ध हो उठा। उस समय वह धैर्यशाली दानव निश्चेष्ट होकर पर्वतकी तरह खड़ा रह गया। दो घड़ीके बाद आश्वस्त |