मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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५९० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पताकिना रथेनाजौ किङ्किणीजालमालिना।<br>शशिशुभ्रातपत्रेण स तेन स्यन्दनेन तु॥ ७३<br>घट्टयन् सुरसैन्यानां हृदयं समदृश्यत।<br>तमायान्तमभिप्रेक्ष्य धनुष्याहितसायकः॥ ७४<br>शतक्रतुरदीनात्मा दृढमाधत्त कार्मुकम्।<br>बाणं च तैलधौताग्रमर्धचन्द्रमजिह्मगम्॥ ७५<br>तेनास्य सशरं चापं रणे चिच्छेद वृत्रहा।<br>क्षिप्रं संत्यज्य तच्चापं जम्भो दानवनन्दनः॥ ७६<br>अन्यत् कार्मुकमादाय वेगवद् भारसाधनम्।<br>शरांश्चाशीविषाकारांस्तैलधौतानजिह्मगान् ॥ ७७<br>शक्रं विव्याध दशभिर्जत्रुदेशे तु पत्रिभिः।<br>हृदये च त्रिभिश्चापि द्वाभ्यां च स्कन्धयोर्द्वयोः ॥ ७८ | वह रथ क्षुद्र घंटिकाओंके समूहसे सुशोभित था, उसमें चन्द्रमाके समान उज्ज्वल छत्र लगा हुआ था और उसपर पताका फहरा रही थी। ज्यों ही रथपर सवार जम्भासुर सुर-सैनिकोंके हृदयोंको धर्षित करता हुआ रणभूमिमें दिखायी पड़ा त्यों ही उदारहृदय इन्द्रने अपना सुदृढ़ धनुष हाथमें लिया और उसपर तेलसे साफ किये गये एवं सीधे लक्ष्यवेध करनेवाले अर्धचन्द्राकार बाणका संधान किया। वृत्रासुरका हनन करनेवाले इन्द्रने उस बाणसे रणभूमिमें जम्भासुरके बाणसहित धनुषको काट दिया। तब दानवनन्दन जम्भने शीघ्र ही उस धनुषको फेंककर दूसरा वेगशाली एवं भार सहन करनेमें समर्थ धनुष तथा तेलसे सफाये गये, सीधा लक्ष्यवेध करनेवाले एवं सर्पके समान जहरीले बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे उसने दस बाणोंसे इन्द्रकी हँसलीको, तीन बाणोंसे हृदयको और दो बाणोंसे दोनों कंधोंको बींध दिया॥ ७१—७८॥ |
| शक्रोऽपि दानवेन्द्राय बाणजालमपीदृशम्।<br>अप्राप्तान् दानवेन्द्रस्तु शराञ्छक्रभुजेरितान्॥ ७९<br>चिच्छेद दशधाऽऽकाशे शरैरग्निशिखोपमैः।<br>ततस्तु शरजालेन देवेन्द्रो दानवेश्वरम्॥ ८०<br>आच्छादयत यत्नेन वर्षास्विव घनैर्नभः।<br>दैत्योऽपि बाणजालं तद् व्यधमत् सायकः शितैः ॥ ८१<br>यथा वायुर्घनाटोपं परिवार्य दिशो मुखे।<br>शक्रोऽथ क्रोधसंरम्भान्न विशेषयते यदा॥ ८२<br>दानवेन्द्रं तदा चक्रे गन्धर्वास्त्रं महाद्भुतम्।<br>तदुत्थतेजसा व्यासमभूद् गगनगोचरम्॥ ८३<br>गन्धर्वनगरैश्चापि नानाप्राकारतोरणैः।<br>मुञ्चद्भिरद्भुताकारैरस्त्रवृष्टिं समंततः॥ ८४<br>अथास्त्रवृष्ट्या दैत्यानां हन्यमाना महाचमूः।<br>जम्भं शरणमागच्छदप्रमेयपराक्रमम्॥ ८५<br>व्याकुलोऽपि स्वयं दैत्यः सहस्राक्षास्त्रपीडितः।<br>सस्मरन् साधुमाचारं भीतत्राणपरोऽभवत्॥ ८६ | इसी प्रकार इन्द्रने भी उस दानवेन्द्रपर बाणसमूह चलाये, परंतु इन्द्रके हाथसे छोड़े गये उन बाणोंके अपने पास पहुँचनेके पूर्व ही दानवेन्द्र जम्भने अपने अग्निकी लपटोंके समान तेजस्वी बाणोंसे आकाशमें ही काटकर दस-दस टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने यत्नपूर्वक दानवेश्वरको बाणसमूहोंसे इस प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे वर्षा-ऋतुमें बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है। तब दैत्यने भी अपने तीखे बाणोंसे उस बाण-समूहको इस प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे वायु दिशाओंके मुखपर छाये हुए बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है। तदनन्तर जब इन्द्र क्रोधवश उस दानवेन्द्रसे आगे न बढ़ सके, तब उन्होंने महान् अद्भुत गन्धर्वास्त्रका प्रयोग किया। उससे निकले हुए तेजसे सारा आकाशमण्डल व्यास हो गया। उससे अनेकों परकोटों एवं फाटकोंसे युक्त अद्भुत आकारवाले गन्धर्वनगर भी प्रकट हुए, जिनसे चारों ओर अस्त्रोंकी वर्षा होने लगी। उस अस्त्रवृष्टिसे मारी जाती हुई दैत्योंकी विशाल सेना अतुल पराक्रमी जम्भकी शरणमें आ गयी। यद्यपि उस समय इन्द्रके अस्त्रसे पीड़ित होकर दैत्यराज जम्भ स्वयं भी व्याकुल हो गया था, तथापि सज्जनोंके सदाचारका—अर्थात् शरणागतकी रक्षा करनी चाहिए—इस नियमका स्मरण कर वह उन भयभीतोंकी रक्षामें तत्पर हो गया। |