मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १५३ * | ५९१ |
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| अथास्त्रं मौसलं नाम मुमोच दितिनन्दनः।<br>ततोऽयोमुसलैः सर्वमभवत् पूरितं जगत्॥ ८७<br>एकप्रहारकरणैरप्रधृष्यैः समंततः।<br>गन्धर्वनगरं तेषु गन्धर्वास्त्रविनिर्मितम्॥ ८८ | फिर तो उस दैत्यने मौसल नामक अस्त्रका प्रयोग किया। उससे निकले हुए लोहनिर्मित मुसलोंसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। एक-एकपर प्रहार करनेवाले उन दुर्धर्ष मुसलोंद्वारा गन्धर्वास्त्रद्वारा निर्मित गन्धर्वनगर भी चारों ओरसे आच्छादित हो गया॥ ८७-८८॥ |
| गान्धर्वमस्त्रं संधाय सुरसैन्येषु चापरम्।<br>एकैकेन प्रहारेण गजानश्वान् महारथान्॥ ८९<br>रथांश्चान् सोऽहनत् क्षिप्रं शतशोऽथ सहस्रशः।<br>ततः सुराधिपस्त्वाष्ट्रमस्त्रं च समुदीरयत्॥ ९० | तदनन्तर जम्भासुरने दूसरे गान्धर्वास्त्रका संधान करके उसे देवताओंकी सेनाओंपर छोड़ दिया। उसने शीघ्र ही क्रमशः एक-एक प्रहारसे सैकड़ों एवं हजारोंकी संख्यामें गजराजों, घोड़ों, महारथियों एवं रथके घोड़ोंको नष्ट कर दिया। तब देवराज इन्द्रने त्वाष्ट्र नामक अस्त्रको प्रकट किया। |
| संध्यमाने ततस्त्वाष्ट्रे निश्चेरुः पावकार्चिषः।<br>ततो यन्त्रमयान् दिव्यान्यायुधान् दुष्प्रधर्षिणः॥ ९१<br>तैर्यन्तैरभवद् बद्धमन्तरिक्षे वितानकम्।<br>वितानकेन तेनाथ प्रशमं मौसले गते॥ ९२ | उस त्वाष्ट्रास्त्रके संधान करते ही अग्निकी लपटें निकलने लगीं। तत्पश्चात् उन्होंने अन्यान्य दुर्धर्ष यन्त्रमय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया। उन यन्त्रमय अस्त्रोंसे आकाशमें वितान-सा बँध गया। उस वितानसे वह मौसलास्त्र शान्त हो गया। |
| शैलास्त्रं मुमुचे जम्भो यन्त्रसङ्घातताडनम्।<br>व्यामप्रमाणैरुपलैस्ततो वर्षमवर्तत॥ ९३ | यह देखकर जम्भासुरने उस यन्त्रसमूहको नष्ट करनेवाले शैलास्त्रका प्रयोग किया। उससे व्यामके बराबर उपलोंकी वर्षा होने लगी। |
| त्वाष्ट्रस्य निर्मितान्याशु यन्त्राणि तदनन्तरम्।<br>तेनोपलन पातेन गतानि तिलशस्ततः॥ ९४<br>यन्त्राणि तिलशः कृत्वा शैलास्त्रं परर्मूर्धसु।<br>निपपातातिवेगेनादारयत् पृथिवीं ततः॥ ९५ | तदनन्तर उस उपल-वर्षासे त्वष्ट्रास्त्रद्वारा निर्मित सभी यन्त्र शीघ्र ही तिल-सरीखे चूर्ण बन गये। इस प्रकार वह शैलास्त्र यन्त्रोंको तिलशः काटकर बड़े वेगसे शत्रुओंके मस्तकोंपर गिरते हुए पृथिवीको भी विदीर्ण कर देता था। |
| ततो वज्रास्त्रमकरोत् सहस्राक्षः पुरन्दरः।<br>तदोपलमहावर्ष व्यशीर्यत समंततः॥ ९६ | तब सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने वज्रास्त्रका प्रयोग किया। उससे उपलोंकी वह महान् वृष्टि चारों ओर छिन्न-भिन्न हो गयी। |
| ततः प्रशान्ते शैलास्त्रे जम्भो भूधरसंनिभः।<br>ऐषीकमस्त्रमकरोदभीतोऽतिपराक्रमः ॥ ९७<br>ऐषीकेणागमन्नाशं वज्रास्त्रं शक्रवल्लभम्।<br>विजृम्भत्यथ चैषीके परमास्त्रेऽतिदुर्धरे॥ ९८<br>जज्वलुर्देवसैन्यानि सस्यन्दनगजानि तु।<br>दह्यमानेष्वनीकेषु तेजसा सुरसत्तमः॥ ९९ | उस शैलास्त्रके प्रशान्त हो जानेपर पर्वत-सा विशालकाय एवं प्रचण्ड पराक्रमी जम्भने निर्भय होकर ऐषीकास्त्रका प्रयोग किया। उस ऐषीकास्त्रसे देवराज इन्द्रका परम प्रिय वज्रास्त्र नष्ट हो गया। तत्पश्चात् उस परम दुर्धर्ष दिव्यास्त्र ऐषीकके फैलते ही रथों एवं हाथियोंसहित देवताओंकी सेनाएँ जलने लगीं॥ ८९-९८ १/२॥ |
| आग्नेयमस्त्रमकरोद् बलवान् पाकशासनः।<br>तेनास्त्रेण तदस्त्रं च बभ्रंशे तदनन्तरम्॥ १०० | इस प्रकार ऐषीकास्त्रके तेजसे अपनी सेनाओंको भस्म होती हुई देखकर महाबली देवराज इन्द्रने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रके प्रभावसे ऐषीकास्त्र नष्ट हो गया। |
| तस्मिन् प्रतिहते चास्त्रे पावकास्त्रं व्यजम्भत।<br>जज्वाल कायं जम्भस्य सरथं च ससारथिम्॥ १०१ | तदनन्तर उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर आग्नेयास्त्रने अपना प्रभाव फैलाया, उससे रथ एवं सारथिसहित जम्भका शरीर जलने लगा। |