मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १५४ * | ६११ |
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| तद्यथा शैलजा देवी योगं यायात् पिनाकिना।<br>शीघ्रं तदुद्यमः सर्वैरस्मत्पक्षैर्विधीयताम्॥ ११८<br>अवगम्यार्थमखिलं तत आमन्त्र्य नारदः।<br>शक्रं जगाम भगवान् हिमशैलनिवेशनम्॥ ११९<br>तत्र द्वारे स विप्रेन्द्रश्चित्रवेत्रलताकुले।<br>वन्दितो हिमशैलेन निर्गतेन पुरो मुनिः॥ १२०<br>सह प्रविश्य भवनं भुवो भूषणतां गतम्।<br>निवेदिते स्वयं हैमे हिमशैलेन विस्तृते॥ १२१<br>महासने मुनिवरो निषसादातुलद्युतिः।<br>यथार्हं चार्च्यपाद्यं च शैलस्तस्मै न्यवेदयत्॥ १२२<br>मुनिस्तु प्रतिजग्राह तमर्घं विधिवत् तदा।<br>गृहीतार्घं मुनिवरमपृच्छच्छ्लक्ष्णया गिरा॥ १२३<br>कुशलं तपसः शैलः शनैः फुल्लाननाम्बुजः।<br>मुनिरप्यद्रिराजानमपृच्छत् कुशलं तदा॥ १२४ | इसलिये पार्वतीदेवी जिस प्रकार शीघ्र ही शंकरजीसे संयुक्त हो जायँ, वह उपाय हमारे पक्षके सभी लोगोंको करना चाहिये। तत्पश्चात् सारा प्रयोजन समझकर और इन्द्रसे सलाह करके भगवान् नारद हिमाचलके भवनकी ओर चल पड़े। थोड़ी ही देरमें वे द्विजवर चित्र-विचित्र बेंतकी लताओंसे आच्छादित भवन-द्वारपर जा पहुँचे। वहाँ पहलेसे ही भवनके बाहर निकले हुए हिमाचलने मुनिकी वन्दना की। फिर वे हिमाचलके साथ पृथ्वीके भूषणस्वरूप उनके भवनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ अनुपम कान्तिवाले मुनिवर नारद स्वयं हिमाचलद्वारा निवेदित किये गये एक स्वर्णनिर्मित विशाल सिंहासनपर विराजमान हुए। तब शैलराजने उन्हें यथायोग्य पाद्य और अर्घ्य निवेदित किया। मुनिने विधिपूर्वक उस अर्घ्यको स्वीकार किया। उस समय शैलराजका मुख खिले हुए कमलके समान हर्षसे खिल उठा। तब उन्होंने अर्घ्य ग्रहण करनेके पश्चात् मुनिवरसे मधुर वाणीमें धीरेसे उनकी तपस्याके विषयमें कुशल पूछी। इसके बाद मुनिने भी पर्वतराजसे कुशल-समाचार पूछा॥ ११६-१२४॥ | | नारद उवाच<br>अहोऽवतारिताः सर्वे संनिवेशे महागिरे।<br>पृथुत्वं मनसा तुल्यं कंदराणां तथाचल॥ १२५<br>गुरुत्वं ते गुणौघानां स्थावरादतिरिच्यते।<br>प्रसन्नता च तोयस्य मनसोऽप्यधिका च ते॥ १२६<br>न लक्ष्यामः शैलेन्द्र शिष्यते कन्दरोदरात्।<br>न च लक्ष्मीस्तथा स्वर्गे कुत्राधिकतया स्थिता॥ १२७<br>नाना तपोभिर्मुनिभिर्ज्वलन्नार्कसमप्रभैः ।<br>पावनैः पावितो नित्यं त्वत्कन्दरसमाश्रितैः॥ १२८<br>अवमत्य विमानानि स्वर्गवासविरागिणः।<br>पितुर्गृह इवासन्ना देवगन्धर्वकिन्नराः॥ १२९<br>अहो धन्योऽसि शैलेन्द्र यस्य ते कंदरं हरः।<br>अध्यास्ते लोकनाथोऽपि समाधानपरायणः॥ १३०<br>इत्युक्तवति देवर्षौ नारदे सादरं गिरा।<br>हिमशैलस्य महिषी मेना मुनिदिदृक्षया॥ १३१<br>अनुयाता दुहित्रा तु स्वल्पालिपरिचारिका।<br>लज्जाप्रणयनम्राङ्गी प्रविवेश निवेशनम्॥ १३२ | **नारदजी बोले—**महाचल! तुम्हारे इस भवनको देखकर आश्चर्य होता है। तुमने इस भवनमें सभी पदार्थोंको संगृहीत कर रखा है। पर्वतराज ! तुम्हारी कन्दराओंकी पृथुता तो मनके समान गम्भीर है। तुम्हारे अन्यान्य गुणसमूहोंकी गुरुता अन्य स्थावरोंसे कहीं बढ़-चढ़कर है। तुम्हारे जलकी निर्मलता मनसे भी अधिक है। शैलराज ! मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं देख रहा हूँ, जो तुम्हारी कन्दराओंके भीतर वर्तमान न हो। स्वर्गमें कहीं भी तुमसे बढ़कर लक्ष्मी नहीं है। तुम अपनी गुफाओंमें निवास करनेवाले, नाना प्रकारकी तपस्याओंमें निरत, अग्नि एवं सूर्यकी-सी कान्तिवाले पावन मुनियोंद्वारा नित्य पवित्र होते रहते हो। देवता, गन्धर्व और किन्नरवृन्द स्वर्गवाससे विरक्त हो विमानोंकी अवहेलना कर पिताके गृहकी तरह तुम्हारे यहाँ निवास कर रहे हैं। अहो! शैलेन्द्र ! तुम धन्य हो; क्योंकि तुम्हारी कन्दरामें लोकपति शंकर भी समाधिमें लीन होकर निवास कर रहे हैं। देवर्षि नारद इस प्रकार आदरपूर्ण वाणी बोल ही रहे थे कि उसी समय पर्वतराज हिमाचलकी पटरानी मेना अपनी कन्याके साथ मुनिका दर्शन करनेके लिये वहाँ आयीं। उनके साथ कुछ सखियाँ और सेविकाएँ भी थीं। उन्होंने लज्जा और प्रेमसे विनम्र हो उस भवनमें प्रवेश किया, |