मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६१२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यत्र स्थितो मुनिवरः शैलेन सहितो वशी।<br>दृष्ट्वा तु तेजसो राशिं मुनिं शैलप्रिया तदा॥ १३३<br>ववन्दे गूढवदना पाणिपद्मकृताञ्जलिः। | जहाँ जितेन्द्रिय मुनिवर नारद हिमाचलके साथ बैठे हुए थे। तब हिमाचल-पत्नी मेनाने तेजके पुञ्जभूत मुनिको देखकर लज्जावश मुखको छिपाये हुए करकमलोंकी अञ्जलि बाँधकर मुनिकी वन्दना की॥ १२५-१३३ १/२॥ |
| तां विलोक्य महाभागो महर्षिरमितद्युतिः॥ १३४<br>आशीर्भरमृतोद्गाररूपाभिस्तां व्यवर्धयत्।<br>ततो विस्मितचित्ता तु हिमवद्गिरिपुत्रिका॥ १३५<br>उदैक्षन्नारदं देवी मुनिमद्भुतरूपिणम्।<br>एहि वत्सेति चाप्युक्ता ऋषिणा स्निग्धया गिरा॥ १३६<br>कण्ठे गृहीत्वा पितरमुत्सङ्गे समुपाविशत्।<br>उवाच माता तां देवीमभिवन्द्य पुत्रिके॥ १३७<br>भगवन्तं ततो धन्यं पतिमाप्स्यसि सम्मतम्।<br>इत्युक्ता तु ततो मात्रा वस्त्रान्तपिहितानना॥ १३८<br>किञ्चित्कम्पितमूर्धा तु वाक्यं नोवाच किञ्चन।<br>ततः पुनरुवाचेदं वाक्यं माता सुतां तदा॥ १३९<br>वत्से वन्दय देवर्षिं ततो दास्यामि ते शुभम्।<br>रत्नक्रीडनकं रम्यं स्थापितं यच्चिरं मया॥ १४०<br>इत्युक्ता तु ततो वेगादुद्धृत्य चरणौ तदा।<br>ववन्दे मूर्ध्नि संधाय करपङ्कजकुड्मलम्॥ १४१ | अमित कान्तिसम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली महर्षि नारदने तब मेनाको देखकर अमृतके उद्गारस्वरूप आशीर्वादनोंद्वारा उनकी शुभकामना की। हिमाचलकी पुत्री पार्वतीदेवी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं। वे अद्भुत रूपवाले नारदमुनिकी ओर एकटक देख रही थीं। उस समय देवर्षि नारदने 'बेटी! आओ' ऐसी स्नेहपूर्ण वाणीसे पुकारा भी, किंतु वे पिताके गलेको पकड़कर उनकी गोदमें छिपकर बैठ गयीं। यह देखकर माता मेनाने पार्वती देवीसे कहा—'बेटी! भगवान् नारदको प्रणाम करो, इससे तुम अपने मनके अनुकूल योग्य पति प्राप्त करोगी।' माताद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने वस्त्रके छोरसे अपने मुखको ढक लिया और मस्तकको थोड़ा झुका दिया, परंतु मुखसे कुछ नहीं कहा। तत्पश्चात् माताने पुनः अपनी कन्यासे इस प्रकार कहा—'बेटी! यदि तुम देवर्षि नारदको प्रणाम कर लो तो मैं तुम्हें बड़ी सुन्दर वस्तु दूँगी। मैं तुम्हें वह सुन्दर रत्ननिर्मित खिलौना दूँगी, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे छिपाकर रखा है।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने शीघ्र ही अपने कमल-मुकुल-सदृश दोनों हाथोंसे मुनिके दोनों चरणोंको उठाकर मस्तकपर रख कर प्रणाम किया॥ १३४—१४१॥ |
| कृते तु वन्दने तस्या माता सखीमुखेन तु।<br>चोदयामास शनकैस्तस्याः सौभाग्यशंसिनाम्॥ १४२<br>शरीर लक्षणानां तु विज्ञानाय तु कौतुकात्।<br>स्त्रीस्वभावाद्वददुहितुश्चिन्तां हृदि समुद्वहन्॥ १४३<br>ज्ञात्वा तदिङ्गितं शैलो महिष्या हृदयेन तु।<br>अनुदीर्णोऽक्षतिर्मेने रम्यमेतदुपस्थितम्॥ १४४ | पार्वतीके प्रणाम कर लेनेके पश्चात् माता मेनाने कुतूहलवश कन्याके सौभाग्यसूचक शरीर-लक्षणोंकी जानकारी प्राप्त करनेके लिये धीरेसे सखीद्वारा मुनिसे अनुरोध किया; क्योंकि स्त्री-स्वभाववश उनके हृदयमें कन्याविषयिणी चिन्ता उठ खड़ी हुई थी। पर्वतराज अपनी पत्नीके उस संकेतको जानकर मनमें परम प्रसन्न हुए कि यह तो बड़ा सुन्दर विषय उपस्थित हुआ। इसमें उन्हें कोई हानि नहीं दीख पड़ी, अतः वे स्वयं कुछ न बोले। |
| चोदितः शैलमहिषीसख्या मुनिवरस्तदा।<br>स्मिताननो महाभागो वाक्यं प्रोवाच नारदः॥ १४५<br>न जातोऽस्याः पतिर्भद्रे लक्षणैश्च विवर्जिता।<br>उत्तानहस्ता सततं चरणैर्व्यभिचारिभिः।<br>स्वच्छायया भविष्येयं किमन्यद् बहु भाष्यते॥ १४६ | तब हिमाचल-पत्नीकी सखीद्वारा अनुरोध किये जानेपर महाभाग मुनिवर नारद मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'भद्रे! इसका पति तो अभी जगत्में पैदा ही नहीं हुआ है। यह सभी शुभ लक्षणोंसे रहित है। इसकी हथेली सदा उत्तान ही रहती है तथा चरण भी कुलक्षणोंसे युक्त हैं। यह अपनी छायाके साथ अर्थात् अकेली ही रहेगी। इसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय।' |