भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १५४ *
६१५

इत्युक्त्वा विरतः शैलो महादुःखविचारणात्।<br>श्रुत्वैतदखिलं तस्माच्छैलराजमुखाम्बुजात्।<br>स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवपूजितः॥ १७५<br><br>नारद उवाच<br><br>हर्षस्थानेऽपि महति त्वया दुःखं निरूप्यते।<br>अपरिच्छिन्नवाक्यार्थे मोहं यासि महागिरे॥ १७६<br>इमां शृणु गिरं मत्तो रहस्यपरिनिष्ठिताम्।<br>समाहितो महाशैल मयोक्तस्य विचारणे॥ १७७<br>न जातोऽस्याः पतिर्देव्या यन्मयोक्तं हिमाचल।<br>न स जातो महादेवो भूतभव्यभवोद्भवः।<br>शरण्यः शाश्वतः शास्ता शंकरः परमेश्वरः॥ १७८<br>ब्रह्माविष्ण्विन्द्रमुनयो जन्ममृत्युजरार्दिताः।<br>तस्यैते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे॥ १७९<br>आस्ते ब्रह्मा तदिच्छात्तः सम्भूतो भुवनप्रभुः।<br>विष्णुर्युगे युगे जातो नानाजातिर्महातनूः॥ १८०<br>मन्यसे मायया जातं विष्णुं चापि युगे युगे।<br>आत्मनो न विनाशोऽस्ति स्थावरान्तेऽपि भूधर॥ १८१<br>संसारे जायमानस्य म्रियमाणस्य देहिनः।<br>नश्यते देह एवात्र नात्मनो नाश उच्यते॥ १८२<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं संसारो यः प्रकीर्तितः।<br>स जन्ममृत्युदुःखार्तो ह्यवशः परिवर्तते॥ १८३<br>महादेवोऽचलः स्थाणुर्न जातो जनकोऽजरः।<br>भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथो निरामयः॥ १८४<br>यदुक्तं च मया देवी लक्षणैर्वर्जिता तव।<br>शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्त्वेन विचारणम्॥ १८५<br>लक्षणं दैविको ह्यङ्कः शरीरावयवाश्रयः।<br>सर्वायुर्धनसौभाग्यपरिमाणप्रकाशकः ॥ १८६फटा-सा जा रहा है। ऐसा कहकर हिमाचल उस महान् दुःखी कल्पनासे विरत हो गये। उस शैलराजके मुखकमलसे निकली हुई ये सारी बातें सुनकर देवपूजित नारदजी मुसकराते हुए इस प्रकार बोले॥ १६६—१७५॥<br><br>**नारदजीने कहा—**गिरिराज! आप तो महान् हर्षका अवसर उपस्थित होनेपर भी दुःखकी गाथा गा रहे हैं और मेरे अस्पष्ट वाक्यके अर्थको समझे बिना मोहको प्राप्त हो रहे हैं। शैलराज! इस रहस्यपूर्ण वाणीका तात्पर्य मुझसे सुनिये और मेरे द्वारा कही हुई बातपर सावधानीपूर्वक विचार कीजिये। हिमाचल! मैंने जो यह कहा है कि इस देवीका पति उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इसका अभिप्राय यह है कि जो भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों कालोंमें वर्तमान रहनेवाले, जीवोंके शरणदाता, अविनाशी, नियामक, कल्याणकर्ता और परमेश्वर हैं, वे महादेव उत्पन्न नहीं हुए हैं अर्थात् वे अनादि हैं, उनका जन्म नहीं होता। पर्वतराज! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, मुनि आदि जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे ग्रस्त हैं। ये सभी उस परमेश्वरके खिलौनेमात्र हैं। उन्हींकी इच्छासे त्रिभुवनके स्वामी ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और विष्णु प्रत्येक युगमें विशाल शरीर धारण करके नाना प्रकारकी जातियोंमें उत्पन्न होते हैं। पर्वतराज! प्रत्येक युगमें मायाका आश्रय लेकर उत्पन्न हुए विष्णुको तो तुम भी मानते ही हो। स्थावर योनिमें जन्म लेनेपर भी शरीरान्त होनेपर आत्माका विनाश नहीं होता। संसारमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए प्राणीका शरीरमात्र नष्ट होता है, आत्माका नाश नहीं कहा जाता। ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त जो यह संसार कहा जाता है, उसमें उत्पन्न हुए प्राणी जन्म-मृत्युके दुःखसे पीड़ित होकर पराधीन रहते हैं, किंतु महादेव स्थाणुकी भाँति अचल हैं। वे वृद्धावस्थासे रहित तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, किंतु स्वयं किसीसे उत्पन्न नहीं होते। वे ही निर्दोष जगदीश्वर शङ्कर इस कन्याके पति होंगे॥ १७६—१८४॥<br><br>साथ ही मैंने तुमसे जो यह कहा था कि यह देवी लक्षणोंसे रहित है, उस वाक्यका अभिप्राय भी सम्यक्-रूपसे सुनो। पर्वतराज! शरीरके अवयवोंमें अङ्कित लक्षण दैविक चिह्न होता है। वह सभीके आयु, धन और सौभाग्यके परिणामको प्रकट करनेवाला होता है,