मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६१६ * मत्स्यपुराण *
| अनन्तस्याप्रमेयस्य सौभाग्यस्यास्य भूधर।<br>नैवाङ्गे लक्षणाकारः शरीरे संविधीयते॥ १८७<br>अतोऽस्या लक्षणं गात्रे शैल नास्ति महामते।<br>यथाहमुक्तवान् तस्या ह्युत्तानकरतां सदा॥ १८८<br>उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सदैव तु।<br>सुरासुरमुनिव्रातवरदेयं भविष्यति॥ १८९<br>यथा प्रोक्तं तदा पादौ स्वच्छायव्यभिचारिणौ।<br>अस्याः शृणु ममात्रापि वाग्युक्तिं शैलसत्तम॥ १९०<br>चरणौ पद्मसंकाशावस्याः स्वच्छनखोज्ज्वलौ।<br>सुरासुराणां नमतां किरीटमणिकान्तिभिः॥ १९१<br>विचित्रवर्णैर्भासन्तौ स्वच्छायप्रतिबिम्बितौ।<br>भार्या जगद्गुरोर्ह्येषा वृषाङ्कस्य महीधर॥ १९२<br>जननी लोकधर्मस्य सम्भूता भूतभाविनी।<br>शिवेयं पावनायैव त्वत्क्षेत्रे पावकद्युतिः॥ १९३<br>तद्यथा शीघ्रमेवैषा योगं यायात् पिनाकिना।<br>तथा विधेयं विधिवत्त्वया शैलेन्द्रसत्तम।<br>अत्यन्तं हि महत् कार्यं देवानां हिमभूधर॥ १९४ | किंतु इसके शरीरमें इस अनन्त एवं अप्रमेय सौभाग्यके किसी लक्षणाकार चिह्नका संविधान नहीं किया गया है, इसीलिये मैंने कहा है कि इसके शरीरमें लक्षण नहीं है। महाबुद्धिमान् हिमाचल! जो मैंने इसकी सदा उत्तानकरताका कथन किया था, उसका तात्पर्य यह है कि इस देवीका यह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा, जिससे यह सुर, असुर और मुनिसमूहके लिये वरदायिनी होगी। पर्वतश्रेष्ठ! उस समय मैंने जो ऐसा कहा था कि इसके चरण अपनी छायामें रहनेके कारण दोषी हैं, इस विषयमें भी तुम मेरे वचनोंकी युक्ति सुनो। इसके कमल-सदृश चरण स्वच्छ उज्ज्वल नखोंसे सुशोभित हैं। जब वे नमस्कार करनेवाले सुरों एवं असुरोंके किरीटोंमें जड़ी हुई मणियोंकी विचित्र वर्णकी कान्तिसे उद्भासित होंगे, तब अपनी छायासे प्रतिबिम्बित कहलायेंगे। महीधर! आपकी यह कन्या जगद्गुरु वृषभध्वज शङ्करकी भार्या, लोकधर्मकी जननी, प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली, कल्याणस्वरूपा और अग्निके समान कान्तिमती है। यह तुम्हारे क्षेत्रमें तुम्हें पावन करनेके लिये प्रकट हुई है। इसलिये श्रेष्ठ पर्वतराज! जिस प्रकार यह शीघ्र-से-शीघ्र पिनाकधारी शङ्करजीके साथ संयुक्त हो जाय, तुम्हें विधिपूर्वक वैसा ही विधान करना चाहिये। हिमाचल! इससे देवताओंका अत्यन्त महान् कार्य सिद्ध हो जायगा॥ १८५—१९४॥ |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! नारदजीके मुखसे ये सारी बातें सुनकर उस समय मेनाके प्राणपति शैलराज अपनेको पुनः उत्पन्न हुआ-सा अनुभव करने लगे। तत्पश्चात् हर्षसे फूले हुए हिमाचल भी उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव वृषभध्वजको नमस्कार करके नारदजीसे बोले॥१९५-१९६॥ |
| एवं श्रुत्वा तु शैलेन्द्रो नारदात् सर्वमेव हि।<br>आत्मानं स पुनर्जातं मेने मेनापतिस्तदा॥ १९५<br>नमस्कृत्य वृषाङ्काय तदा देवाय धीमते।<br>उवाच सोऽपि संहृष्टो नारदं तु हिमाचलः॥ १९६ | |
| हिमवानुवाच | **हिमवान्ने कहा—**मुने! आपने तो मुझे घोर दुस्तर नरकसे उबार लिया है और पाताललोकसे निकालकर सातों लोकोंका अधिपति बना दिया है। मुनिवर! इस समय आपने हिमाचलपर जो अचल गुणवाली समृद्धि उत्पन्न कर दी है, इससे मैं सचमुच हिमाचल नामसे विख्यात कर दिया गया हूँ। मुने! इस समय मेरा हृदय आनन्दमय दिनका अनुभव कर रहा है, जिससे यह आपके कृत्योंका विभागपूर्वक विचार करनेमें सक्षम नहीं हो रहा है। यदि मैं वाणीके अधीश्वर बृहस्पति हो जाऊँ तो भी आपके गुणोंका विचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। |
| दुस्तरान्नरकाद् घोरादुद्धृतोऽस्मि त्वया मुने।<br>पातालादहमुद्धृत्य समलोकाधिपः कृतः॥ १९७<br>हिमाचलोऽस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना।<br>हिमाचलेऽचलगुणां प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम्॥ १९८<br>आनन्ददिवसाहारि हृदयं मेऽधुना मुने।<br>नाध्यवस्यति कृत्यानां प्रविभागविचारणम्॥ १९९<br>यदि वाचामधीशः स्यां त्वद्गुणानां विचारणे॥ २०० |