मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 632, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 632
६२२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Commentary |
|---|---|
| नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय<br>नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय।<br>नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय<br>नमोऽस्तु ते ज्ञानवरप्रदाय॥ २६२<br><br>नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय<br>नमो निसर्गामलभूषणाय।<br>नमोऽस्त्वमेयान्धकमर्दकाय<br>नमः शरण्याय नमोऽगुणाय॥ २६३<br><br>नमोऽस्तु ते भीमगणानुगाय<br>नमोऽस्तु नानाभुवनादिकर्त्रे।<br>नमोऽस्तु नानाजगतां विधात्रे<br>नमोऽस्तु ते चित्रफलप्रयोक्त्रे॥ २६४<br><br>सर्वावसाने ह्यविनाशनेत्रे<br>नमोऽस्तु चित्राध्वरभागभोक्त्रे।<br>नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे<br>नमः सदा ते भवसङ्गहर्त्रे॥ २६५ | आप जगत्के संहारक, कल्याणकारक और पुरातन सिद्ध हैं, आपको बारंबार प्रणाम है। आप कालस्वरूप, कल (कालकी गणना करनेवाले) और श्रेष्ठ ज्ञानके प्रदाता हैं, आपको पुनः-पुनः अभिवादन है। कालकी कलाका अतिक्रमण करनेवाले आपको नमस्कार है। प्रकृतिरूप निर्मल आभूषण धारण करनेवालेको प्रणाम है। आप अप्रमेय शक्तिशाली अन्धकासुरका मर्दन करनेवाले, शरणदाता और निर्गुण हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। भयंकर गणोंद्वारा अनुगमन किये जानेवाले आपको नमस्कार है। अनेकों भुवनोंके आदिकर्ताको प्रणाम है। अनेकों जगत्की रचना करनेवालेको अभिवादन है। चित्र-विचित्र फल प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। सबकी समाप्ति अर्थात् महाप्रलयके अवसरपर आप विनाशसे बचे हुए प्राणियोंके नेता तथा विशाल यज्ञोंमें अपने भागको भोगनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। भक्तोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करनेवालेको अभिवादन है। संसारकी आसक्तिका हरण करनेवाले आपको सदा नमस्कार है॥ २६०-२६५॥ |
| अनन्तरूपाय सदैव तुभ्य-<br>मसह्यकोपाय नमोऽस्तु तुभ्यम्।<br>शशाङ्कचिह्नाय सदैव तुभ्य-<br>ममेयमानाय नमः स्तुताय॥ २६६<br><br>वृषेन्द्रयानाय पुरान्तकाय<br>नमः प्रसिद्धाय महौषधाय।<br>नमोऽस्तु भक्त्याभिमतप्रदाय<br>नमोऽस्तु सर्वार्तिहराय तुभ्यम्॥ २६७<br><br>चराचराचारविचारवर्य-<br>माचार्यमुत्प्रेक्षितभूतसर्गम् ।<br>त्वामिन्दुमौलिं शरणं प्रपन्ना<br>प्रियाप्रमेयं महतां महेशम्॥ २६८<br><br>प्रयच्छ मे कामयशःसमृद्धिं<br>पुनः प्रभो जीवतु कामदेवः।<br>प्रियं विना त्वां प्रियजीवितेषु<br>त्वत्तोऽपरः को भुवनेष्विहास्ति॥ २६९<br><br>प्रभुः प्रियायाः प्रसवः प्रियाणां<br>प्रणीतपर्यायपरापरार्थः।<br>त्वमेवमेको भुवनस्य नाथो<br>दयालुरुन्मूलितभक्तभीतिः॥ २७० | आप अनन्त रूपवाले हैं तथा आपका क्रोध असह्य होता है, आपको सदैव प्रणाम है। आप चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित, अपरिमित मानसे युक्त और सभी प्राणियोंद्वारा स्तुत हैं, आपको सदैव अभिवादन है। वृषभेन्द्र नन्दी आपका वाहन है, आप त्रिपुरके विनाशक और प्रसिद्ध महौषधरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप भक्तिके वशीभूत हो अभीष्ट प्रदान करनेवाले और सभी प्रकारके कष्टोंको दूर करनेवाले हैं, आपको बारंबार प्रणाम है।<br>आप चराचर प्राणियोंके आचार-विचारसे सर्वश्रेष्ठ, जगत्के आचार्य, समस्त भूत-सृष्टिपर दृष्टि रखनेवाले, मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाले, अतुलित प्रेमी और महनीयोंके भी महेश्वर हैं, मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। प्रभो! मुझे कामदेवके यशकी समृद्धि प्रदान कीजिये, जिससे ये कामदेव पुनः जीवित हो जायें। इस त्रिभुवनमें आपसे बढ़कर दूसरा कौन है, जो मेरे प्रियतमको जीवित कर सके। एकमात्र आप ही अपनी प्रियाके प्राणपति, प्रिय पदार्थोंके उद्गम-स्थान, पर और अपर—इन दोनों अर्थोंके पर्यायस्वरूप, जगत्के स्वामी, परम दयालु और भक्तोंके भयको उखाड़ फेंकनेवाले हैं॥ २६६—२७०॥ |