भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 633
  • अध्याय १५४ * | ६२३ -|-

| सूत उवाच<br>इत्थं स्तुतः शङ्कर ईड्य ईशो<br>वृषाकपिर्मन्मथकान्तया तु।<br>तुतोष दोषाकरखण्डधारी<br>उवाच चैनां मधुरं निरीक्ष्य॥ २७१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कामदेवकी पत्नी रतिद्वारा इस प्रकार स्तवन किये जानेपर स्तुतिके योग्य भगवान् शङ्कर प्रसन्न हो गये। तब चन्द्रखण्डको धारण करनेवाले शिवजी उसकी ओर दृष्टिपात करके मधुर वाणीमें बोले॥ २७१॥ | | शंकर उवाच<br>भवितेति च कामोऽयं कालात् कान्तोऽचिरादपि।<br>अनङ्ग इति लोकेषु स विख्यातिं गमिष्यति॥ २७२<br>इत्युक्ता शिरसा वन्द्य गिरिशं कामवल्लभा।<br>जगामोपवनं रम्यं रतिस्तु हिमभूभृतः॥ २७३<br>रुरोद बहुशो दीना रमणेऽपि स्थले तु सा।<br>मरणव्यवसायात्तु निवृत्ता सा हराज्ञया॥ २७४ | **शङ्करजीने कहा—**कामवल्लभे! थोड़े ही समयके बाद यह कामदेव पुनः तुम्हें पतिरूपमें प्राप्त होगा। वह जगत्में अनङ्ग नामसे विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर काम-पत्नी रतिने सिर झुकाकर भगवान् शङ्करको प्रणाम किया, तत्पश्चात् वह हिमालयके रमणीय उपवनकी ओर चली गयी। उस सुरम्य स्थानपर पहुँचकर भी वह दीनभावसे बहुत देरतक विलाप करती रही; क्योंकि वह शङ्करजीकी आज्ञासे मृत्युके निश्चयसे निवृत्त हो चुकी थी॥ २७२–२७४॥ | | अथ नारदवाक्येन चोदितो हिमभूधरः।<br>कृताभरणसंस्कारां कृतकौतुकमङ्गलाम्॥ २७५<br>स्वर्गपुष्पकृतापीड़ां शुभ्रचीनांशुकाम्बराम्।<br>सखीभ्यां संयुतां शैलो गृहीत्वा स्वसुतां ततः॥ २७६<br>जगाम शुभयोगेन तदा सम्पूर्णमानसः।<br>स काननान्युपाक्रम्य वनान्युपवनानि च॥ २७७<br>ददर्श रुदतीं नारीमग्रतः समहौजसम्।<br>रूपेणासदृशीं लोके रम्येषु वनसानुषु॥ २७८<br>कौतुकेन परामृश्य तां दृष्ट्वा रुदतीं गिरिः।<br>उपसृत्य ततस्तस्या निकटे सोऽभ्यपृच्छत॥ २७९ | इधर नारदजीके वाक्योंसे प्रेरित होकर पर्वतराज हिमालय उल्लासपूर्ण मनसे दो सखियोंके साथ अपनी कन्याको लेकर (शङ्करजीके पास जानेके लिये) शुभमुहूर्तमें प्रस्थित हुए। उस समय पार्वतीको आभूषणोंसे सुसज्जित कर दिया गया था। उनके सभी वैवाहिक मङ्गलकार्य सम्पन्न कर लिये गये थे। उनके मस्तकपर स्वर्गीय पुष्पोंकी माला पड़ी थी तथा शरीरपर श्वेत रंगकी महीन रेशमी साड़ी झलक रही थी। वे काननों, वनों एवं उपवनोंको पार करके जब आगे बढ़े तो उन्होंने उस रमणीय वनस्थलीमें एक महान् ओजस्विनी नारीको, जो लोकमें अनुपम रूपवती थी, रोती हुई देखा। तब गिरिराज उसे रोती देखकर कुतूहलवश उसके निकट गये और पूछने लगे॥ २७५–२७९॥ | | हिमवानुवाच<br>कासि कस्यासि कल्याणि किमर्थं चापि रोदिषि।<br>नैतदल्पमहं मन्ये कारणं लोकसुन्दरि॥ २८०<br>सा तस्य वचनं श्रुत्वा उवाच मधुना सह।<br>रुदती शोकजननं श्वसती दैन्यवर्धनम्॥ २८१ | **हिमवान् बोले—**कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी पत्नी हो? किसलिये इस प्रकार रुदन कर रही हो? लोकसुन्दरि! मैं इसका असाधारण कारण नहीं मानता, (अपितु इसका कोई विशेष कारण है।) हिमाचलके वचनको सुनकर वसन्तसहित रोती हुई रति दीर्घ निःश्वास लेकर दैन्यवर्धक एवं शोकजनक वचन बोली॥ २८०-२८१॥ | | रतिरुवाच<br>कामस्य दयितां भार्यां रति मां विद्धि सुव्रत।<br>गिरावस्मिन् महाभाग गिरिशस्तपसि स्थितः॥ २८२ | **रतिने कहा—**सुव्रत! आप मुझे कामदेवकी प्यारी पत्नी रति समझें। महाभाग! इसी पर्वतपर भगवान् शङ्कर तपस्या कर रहे हैं। |

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