भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६२४ * मत्स्यपुराण *

तेन प्रत्यूहरुष्टेन विस्फार्यालोक्य लोचनम्।<br>दग्धोऽसौ झषकेतुस्तु मम कान्तोऽतिवल्लभः॥ २८३<br><br>अहं तु शरणं याता तं देवं भयविह्वला।<br>स्तुतवत्यथ संस्तुत्य ततो मां गिरिशोऽब्रवीत्॥ २८४<br><br>तुष्टोऽहं कामदयिते कामोऽयं ते भविष्यति।<br>त्वत्स्तुतिं चाप्यधीयानो नरो भक्त्या मदाश्रयः।<br>लप्स्यते काङ्क्षितं कामं निवर्त्य मरणादितः॥ २८५<br><br>प्रतीक्षन्ती च तद्वाक्यमाशावेशादिभिर्ह्यहम्।<br>शरीरं परिरक्षिष्ये कञ्चित् कालं महाद्युते॥ २८६<br><br>इत्युक्तस्तु तदा रत्या शैलः सम्भ्रमभीषितः।<br>पाणावादाय हि सुतां गन्तुमैच्छत् स्वकं पुरम्॥ २८७<br><br>भाविनोऽवश्यभावित्वादभवित्री भूतभाविनी।<br>लज्जमाना सखिमुखैरुवाच पितरं गिरिमू॥ २८८तपस्यामें विघ्न पड़नेसे रुष्ट होकर उन्होंने अपने तीसरे नेत्रको खोलकर देखा, जिससे मेरे परम प्रिय पति कामदेव जलकर भस्म हो गये। तब भयसे विह्वल हुई मैं उन देवाधिदेवकी शरणमें गयी। वहाँ मैंने उनकी स्तुति की। उस स्तवनसे प्रसन्न होकर भगवान् शङ्करने मुझसे कहा—'कामदयिते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण हो जायगा। साथ ही जो मनुष्य मेरे शरणागत होकर तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिका भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह अपनी मनोवाञ्छित कामनाको प्राप्त कर लेगा। अब तुम मृत्युके निश्चयसे निवृत्त हो जाओ।' महाद्युतिमान् पर्वतराज! उसी आशाके आवेशसे मैं शङ्करजीके वाक्यकी प्रतीक्षा करती हुई कुछ कालतक इस शरीरकी रक्षा करूँगी।<br>रतिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर हिमाचल उस समय भयभीत हो गये। तब वे अपनी कन्याका हाथ पकड़कर अपने नगरको लौट जानेके लिये उद्यत हो गये। तब जो होनहार है, वह तो अवश्य होकर ही रहेगा—ऐसा विचारकर प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली पार्वती लजाती हुई सखीके मुखसे अपने पिता गिरिराजसे बोलीं ॥ २८२–२८८ ॥
शैलदुहितोवाच<br><br>दुर्भगेण शरीरेण किं मामनेन कारणम्।<br>कथं च तादृशं प्राप्तं सुखं मे स पतिर्भवेत्॥ २८९<br><br>तपोभिः प्राप्यतेऽभीष्टं नासाध्यं हि तपस्यतः।<br>दुर्भगंत्वं वृथा लोको वहते सति साधने॥ २९०<br><br>जीविताद्दुर्भागाच्छ्रेयो मरणं ह्यतपस्यतः।<br>भविष्यामि न संदेहो नियमैः शोषये तनुम्॥ २९१<br><br>तपसि भ्रष्टसंदेह उद्यमोऽर्थजिगीषया।<br>साहं तपः करिष्यामि यदहं प्राप्य दुर्लभा॥ २९२<br><br>इत्युक्तः शैलराजस्तु दुहित्रा स्नेहविक्लवः।<br>उवाच वाचा शैलेन्द्रो स्नेहगद्गदवर्णया॥ २९३गिरिराजकुमारीने कहा— पिताजी! इस अभागे शरीरको धारण करनेसे मुझे क्या लाभ प्राप्त हो सकता है? अब मैं किस प्रकार सुखी हो सकूँगी और किस उपायसे भगवान् शङ्कर मेरे पति हो सकेंगे? (ठीक है, ऐसा सुना जाता है कि) तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है; क्योंकि तपस्वीके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। भला ऐसे उत्तम साधनके रहते हुए भी लोग व्यर्थ ही दुर्भाग्यका भार क्यों वहन करते हैं? तपस्या न करनेवालेके लिये भाग्यहीन जीवनसे तो मर जाना ही श्रेयस्कर है। अतः मैं निःसंदेह तपस्विनी बनूँगी और नियमोंके पालनद्वारा अपने शरीरको सुखा डालूँगी। प्रयोजन-सिद्धिके लिये तपस्याके निमित्त संदेहरहित उद्यम अवश्य करना चाहिये। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे मुझे वह दुर्लभ कामना प्राप्त हो जाय। पुत्रीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पर्वतराज हिमाचल स्नेहसे विह्वल हो गये, तब वे स्नेहभरी गद्गद वाणीसे बोले ॥ २८९–२९३ ॥
हिमवानुवाच<br><br>उमेति चपले पुत्रि न क्षमं तावकं वपुः।<br>सोढुं क्लेशस्वरूपस्य तपसः सौम्यदर्शने॥ २९४<br><br>भावीन्यभिविचार्याणि पदार्थानि सदैव तु।<br>भाविनोऽर्था भवन्त्येव हठेनानिच्छतोऽपि वा॥ २९५हिमवान्ने कहा— बेटी! तू तो बड़ी चञ्चल है। 'उ—मा'—उसे मत कर; क्योंकि सुन्दर स्वरूपवाली बच्ची! तेरा यह शरीर क्लेशस्वरूप तपस्याके कष्टको सहन करनेके लिये सक्षम नहीं है। वत्से! भावी पदार्थोंके प्रति सदैव ऐसा समझना चाहिये कि होनहारके विषय न चाहनेपर