मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १५४ * । ६२५
| तस्मान्न तपसा तेऽस्ति बाले किञ्चित् प्रयोजनम्।<br>भवनायैव गच्छामश्चिन्तयिष्यामि तत्र वै॥ २९६<br>इत्युक्ता तु यदा नैव गृहायाभ्येति शैलजा।<br>ततः स चिन्तयाऽऽविष्टो दुहितां प्रशशंस च॥ २९७<br>ततोऽन्तरिक्षे दिव्या वाग्भूद्भुवनभूतले।<br>उमेति चपले पुत्रि त्वयोक्ता तनया ततः॥ २९८<br>उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति।<br>सिद्धिं च मूर्तिमत्येषा साधयिष्यति चिन्तिताम्॥ २९९<br>इति श्रुत्वा तु वचनमाकाशात् काशपाण्डुरः।<br>अनुज्ञाय सुतां शैलो जगामाशु स्वमन्दिरम्॥ ३०० | भी हठपूर्वक घटित होते ही हैं; अतः बाले ! तुझे तपस्या करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। आओ, हमलोग घर चलें, वहीं इस विषयमें विचार किया जायगा। इस प्रकार कहे जानेपर भी जब पार्वती घर लौटनेके लिये उद्यत नहीं हुई, तब हिमाचल चिन्तित हो गये और पुत्रीकी प्रशंसा करने लगे। इसी बीच धरातलपर इस प्रकारकी दिव्य आकाशवाणी सुनायी पड़ी—'शैलराज ! जो तुमने अपनी पुत्रीके प्रति 'उ मेति चपले पुत्रि—चञ्चल बेटी ! उसे मत कर'—ऐसा कहा है, इस कारण संसारमें इसका 'उमा' नाम प्रसिद्ध होगा। यह साक्षात् प्रकट होकर (भक्तोंको उनकी) अभीष्ट सिद्धि प्रदान करेगी।' इस आकाशवाणीको सुनकर कास-पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले हिमाचल अपनी पुत्रीको तपके निमित्त आज्ञा देकर शीघ्र ही अपने भवनको लौट गये॥ २९४—३००॥ | | सूत उवाच<br>शैलजापि ययौ शैलमगम्यमपि दैवतैः।<br>सखीभ्यामनुयाता तु नियता नगराजजा॥ ३०१<br>शृङ्गं हिमवतः पुण्यं नानाधातुविभूषितम्।<br>दिव्यपुष्पलताकीर्णं सिद्धगन्धर्वसेवितम्॥ ३०२<br>नानामृगगणाकीर्णं भ्रमरोद्घुष्टपादपम्।<br>दिव्यप्रस्रवणोपेतं दीर्घिकाभिरलङ्कृतम्॥ ३०३<br>नानापक्षिगणाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।<br>जलजस्थलजैः पुष्पैः प्रोत्फुल्लैरुपशोभितम्॥ ३०४<br>चित्रकन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम्।<br>विहङ्गसंघसंजुष्टं कल्पपादपसंकटम्॥ ३०५<br>तत्रापश्यन्महाशाखं शाखिनं हरितच्छदम्।<br>सर्वर्तुकुसुमोपेतं मनोरथशतोज्ज्वलम्॥ ३०६<br>नानापुष्यसमाकीर्णं नानाविधफलान्वितम्।<br>नतं सूर्यस्य रुचिभिर्भिन्नसंहतपल्लवम्॥ ३०७<br>तत्राम्बराणि संत्यज्य भूषणानि च शैलजा।<br>संवीता वल्कलैर्दिव्यैर्दभैर्निर्मितमेखला॥ ३०८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! इधर पार्वती भी नियमबद्ध होकर अपनी दोनों सखियोंके साथ उस शिखरकी ओर प्रस्थित हुई, जो देवताओंके लिये भी अगम्य था। हिमालयका वह पावन शिखर अनेकों प्रकारकी धातुओंसे विभूषित था। उसपर दिव्य पुष्पोंकी लताएँ फैली हुई थीं। वह सिद्धों एवं गन्धर्वोंद्वारा सेवित था। वहाँ अनेकों जातियोंके मृगसमूह विचर रहे थे। उसके वृक्षोंपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे। वह दिव्य झरनोंसे युक्त तथा बावलियोंसे सुशोभित था। वहाँ नाना प्रकारके पक्षिसमूह चहचहा रहे थे। वह चक्रवाक पक्षीसे अलंकृत तथा जलमें एवं स्थलपर उत्पन्न होनेवाले खिले हुए पुष्पोंसे विभूषित था। वह विचित्र ढंगकी कन्दराओंसे युक्त था। उन गुफाओंमें मनको लुभानेवाले गृह बने थे। वहाँ घनेरूपमें कल्पवृक्ष उगे हुए थे, जिनपर पक्षिसमूह निवास करते थे। वहाँ पहुँचकर गिरिराजकुमारी पार्वतीेने एक विशाल शाखाओंवाले वृक्षको देखा, जो हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित था। वह छहों ऋतुओंके पुष्पोंसे युक्त, सैकड़ों मनोरथोंकी भाँति उज्ज्वल, नाना प्रकारके पुष्पोंसे आच्छादित और अनेकविध फलोंसे लदा हुआ था। सूर्यकी किरणें उसके सघन पल्लवोंका भेदन कर नीचेतक नहीं पहुँच पाती थीं। उसी वृक्षके नीचे पार्वतींने अपने आभूषणों और वस्त्रोंको उतारकर मूँजकी मेखला और दिव्य वल्कलवस्त्रोंसे अपने शरीरको ढक लिया (और वे तपस्यामें निरत हो गयीं)। |