मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| त्रिःस्नाता पाटलाहारा बभूव शरदां शतम्।<br>शतमेकेन शीर्णेन पर्णेनावर्तयत् तदा॥ ३०९<br><br>निराहारा शतं साभूत् समानां तपसां निधिः।<br>तत उद्वेजिताः सर्वे प्राणिनस्तत्तपोऽग्निना॥ ३१० | उन्होंने प्रथम सौ वर्ष त्रिकाल स्नान और पाटल वृक्षके पत्तोंका भोजन करके बिताया। फिर दूसरे सौ वर्षोंतक वे एक सूखा पत्ता चबाकर जीवननिर्वाह करती रहीं और पुनः सौ वर्षोंतक निराहार रहकर तपस्यामें संलग्न रहीं। उस प्रकार वे तपस्याकी निधि बन गयीं। फिर तो उनकी तपस्याजन्य अग्निसे सभी प्राणी उद्विग्न हो उठे॥ ३०९-३१०॥ | | ततः सस्मार भगवान् मुनीन् सप्त शतक्रतुः।<br>ते समागम्य मुनयः सर्वे समुदितास्ततः॥ ३११<br><br>पूजिताश्च महेन्द्रेण पप्रच्छुस्तं प्रयोजनम्।<br>किमर्थं तु सुरश्रेष्ठ संस्मृतास्तु वयं त्वया॥ ३१२<br><br>शक्रः प्रोवाच शृण्वन्तु भगवन्तः प्रयोजनम्।<br>हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा।<br>तस्या ह्यभिमतं कामं भवन्तः कर्तुमर्हथ॥ ३१३<br><br>ततः समापतन् देव्या जगदर्थं त्वरान्विताः।<br>तथेत्युक्त्वा तु शैलेन्द्रं सिद्धसंघातसेवितम्॥ ३१४<br><br>ऊचुरागत्य मुनयस्तामथो मधुराक्षरम्।<br>पुत्रि किं ते व्यवसितः कामः कमललोचने॥ ३१५<br><br>तानुवाच ततो देवी सलज्जा गौरवान्मुनीन्।<br>तपस्यतो महाभागाः प्राप्य मौनं भवादृशान्॥ ३१६<br><br>वन्दनाय नियुक्ता धीः पावयत्यविकल्पितम्।<br>प्रश्नोन्मुखत्वाद् भवतां युक्तमासनमादितः॥ ३१७<br><br>उपविष्टाः श्रमोन्मुक्तास्ततः प्रक्ष्यथ मामतः।<br>इत्युक्त्वा सा ततश्चक्रे कृतासनपरिग्रहान्॥ ३१८<br><br>सा तु तान् विधिवत् पूज्यान् पूजयित्वा विधानतः।<br>उवाचादित्यसंकाशान् मुनीन् सप्त सती शनैः॥ ३१९ | तदनन्तर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने सातों मुनियोंका स्मरण किया। स्मरण करते ही वे सभी मुनि हर्षपूर्वक वहाँ उपस्थित हो गये। तब महेन्द्रद्वारा पूजित होनेपर उन्होंने इन्द्रसे अपना स्मरण किये जानेका प्रयोजन पूछते हुए कहा—'सुरश्रेष्ठ! किसलिये आपने हमलोगोंका स्मरण किया है?' यह सुनकर इन्द्रने कहा—'ऋषिगण! आपलोग मेरे उस प्रयोजनको श्रवण करें। हिमाचलकी कन्या पार्वती हिमालय पर्वतपर घोर तपका अनुष्ठान कर रही है। आपलोग उनकी अभीष्ट कामनाको पूर्ण करें।' तत्पश्चात् 'तथेति—बहुत अच्छा' यो कहकर जगत्का कल्याण करनेके लिये (अरुन्धतीसहित सभी) मुनिगण शीघ्र ही सिद्धसमूहोंसे सेवित हिमालयके शिखरपर पार्वती देवीके निकट पहुँचे। वहाँ पहुँचकर मुनियोंने पार्वतीसे मधुर वाणीमें पूछा—'कमलके समान नेत्रोंवाली पुत्रि! तुम अपना कौन-सा मनोरथ सिद्ध करना चाहती हो?' तब गौरववश लजाती हुई पार्वती देवीने उन मुनियोंसे कहा—'महाभाग मुनिगण! यद्यपि तपस्या करते समय मैंने मौनका नियम ले रखा था, तथापि आप-जैसे महापुरुषोंकी वन्दना करनेके लिये मेरी बुद्धि उत्सुक हो उठी है, जो निश्चय ही मुझे पावन बना रही है। प्रश्न पूछनेसे पूर्व आपलोगोंके लिये आसन ग्रहण कर लेना ही उपयुक्त है, अतः पहले आसनपर बैठिये, थकावटको दूर कीजिये, तत्पश्चात् मुझसे पूछिये।' ऐसा कहकर पार्वतीने उन पूजनीयोंको आसनपर विराजमान किया और विधि-विधानपूर्वक उनकी पूजा की। तत्पश्चात् सती धीमे स्वरमें सूर्यके समान तेजस्वी उन सप्तर्षियोंसे कहने लगीं॥ ३११-३१९॥ | | त्यक्त्वा व्रतात्मकं मौनं मौनं जग्राह ह्रीमयम्।<br>भावं तस्यास्तु मौनान्तं तस्याः सप्तर्षयो यथा॥ ३२०<br><br>गौरवाधीनतां प्राप्ताः पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा।<br>सापि गौरवगर्भेण मनसा चारुहासिनी॥ ३२१ | उस समय उन्होंने व्रतसम्बन्धी मौनका त्याग कर लज्जामय मौन ग्रहण कर लिया था, जिससे उनका भाव मौन-दशामें परिणत हो गया था। तब सप्तर्षियोंने गौरवके अधीन हुई पार्वतीसे उस प्रयोजनके विषयमें पुनः प्रश्न किया। तदुपरान्त सुन्दर मुस्कानवाली पार्वती ने गौरवपूर्ण |