मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १५४ * | ६२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्॥ ३४५<br>अजमीशानमव्यक्तममेयमहिमोदयम् ॥ ३४६<br><br>आस्तां तद्धर्मसद्भावसम्बोधस्तावदद्भुतः ।<br>विदुर्यं न हरिब्रह्मप्रमुखा हि सुरेश्वराः ॥ ३४७<br><br>यत्तस्य विभवात् स्वोत्थं भुवनेषु विजृम्भितम् ।<br>प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यत्र न वेत्थ किम्॥ ३४८<br><br>कस्यैतद्गगनं मूर्तिः कस्याग्निः कस्य मारुतः ।<br>कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः ॥ ३४९<br><br>कस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गं भक्त्या सुरासुराः ।<br>यं ब्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राद्या महर्षयः ॥ ३५०<br><br>प्रभावं प्रभवं चैव तेषामपि न वेत्थ किम् । | तथापि उन महादेवके विषयमें आपलोगोंको निश्चय ही कुछ भी ज्ञात नहीं है। वे अविनाशी, जगत्के स्वामी, अजन्मा, शासक, अव्यक्त और अप्रमेय महिमावाले हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि सुरेश्वर भी जिन्हें नहीं जानते, उन महादेवके धर्म एवं सद्भावका जो अद्भुत ज्ञान आपलोग दे रहे हैं, उसे अब रहने दीजिये। जिसके विभवसे उत्पन्न हुआ चैतन्य सभी लोकोंमें फैला हुआ है और सभी प्राणियोंमें प्रत्यक्षरूपसे दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भी क्या आपलोग नहीं जानते। (भला सोचिये तो सही) यह आकाश, अग्नि, वायु, पृथ्वी और वरुण पृथक्-पृथकरूपसे किसकी मूर्ति हैं? चन्द्रमा और सूर्यको नेत्ररूपमें धारण करनेवाला कौन है? समस्त सुर एवं असुर लोकोंमें भक्तिपूर्वक किसके लिङ्गकी अर्चना करते हैं? ब्रह्मा एवं इन्द्र आदि देवता तथा महर्षिगण जिन्हें अपना ईश्वर मानते हैं, उन देवताओंके प्रभाव एवं उत्पत्तिको भी क्या आपलोग नहीं जानते?॥ ३४३—३५० १/२॥ |
| अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दनः ॥ ३५१<br><br>अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्यदितिर्दक्षपुत्रिका ॥ ३५२<br><br>मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल ।<br>ब्रह्मा हिरण्मयात्तवण्डाद्दिव्यसिद्धिविभूषितात् ॥ ३५३<br><br>कस्य प्रादुरभूद्ध्यानात्प्राकृतैः प्रकृतांशकात् ।<br>प्रकृतौ तु तृतीयायामम्बुजाजननक्रिया ॥ ३५४<br><br>जातः ससर्ज षड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान्स्वकर्मजान् ।<br>अजातकोऽभवद्द्वेधा ब्रह्माण्डोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३५५<br><br>यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्रकृतिं कृतवानिदम् ।<br>ब्रह्मणः सिद्धसर्वार्थमैश्वर्यं लोककर्तृताम् ॥ ३५६<br><br>विदुर्विष्णुवादयो यच्च स्वमहिम्ना सदैव हि ।<br>कृत्वान्यं देहमन्यादृक् तादृक् कृत्वा पुनर्हरिः ॥ ३५७<br><br>कुरुते जगतः कृत्यमुत्तमाधममध्यमम् ।<br>एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः ॥ ३५८<br><br>कर्मणश्च फलं ह्येतन्नानारूपसमुद्भवम् । | (यदि नहीं जानते तो सुनिये—) ये अदिति किसकी माता हैं और विष्णु किससे उत्पन्न हुए हैं? ये नारायण आदि सभी देवता कश्यप और अदितिसे ही उत्पन्न हुए हैं। वे कश्यप महर्षि मरीचिके पुत्र हैं और अदिति प्रजापति दक्षकी पुत्री हैं। ये दोनों मरीचि और दक्ष भी ब्रह्माके पुत्र हैं और ब्रह्मा दिव्य सिद्धिसे विभूषित हिरण्मय अण्डसे प्रकट हुए हैं। उनका प्रादुर्भाव किसके ध्यानसे हुआ था? (अर्थात् ब्रह्माके आविर्भावके कारण महादेव ही हैं।) ब्रह्मा प्राकृत गुणोंके संयोगसे प्रकृतिके अंशसे तृतीय-प्रकृतिमें कमलपर उत्पन्न हुए थे। जन्म लेते ही उन्होंने बुद्धिपूर्वक अपने कर्मवश उत्पन्न होनेवाले षड्वर्गोंकी सृष्टि की। इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्मा अजन्मा कहलाये, जिन्होंने अपने योगबलसे प्रकृतिको संक्षुब्ध कर इस जगत्की रचना की। विष्णु आदि सभी देवता अपनी महिमासे सदासे ही ब्रह्माकी सर्वार्थसिद्धि, ऐश्वर्य और लोकरचनाको जानते हैं। पुनः श्रीहरि युगानुसार विभिन्न प्रकारका शरीर धारण कर जगत्के उत्तम, मध्यम और अधम कर्मोंका सम्पादन करते हैं। जन्म-मृत्युरूप संसारकी यही स्थिति हैं और अनेक रूपोंमें उत्पन्न हुए कर्मोंका भी यही फल है॥ ३५१—३५८ १/२॥ |