भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६२८* मत्स्यपुराण *

| सुरेन्द्रमुकुटव्रातनिघृष्टचरणोऽरिहा ॥ ३३५<br><br>हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तोऽनन्तमूर्तिमान्।<br>नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३३६<br><br>देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनः सर्वकामकृत्।<br>वायुरस्ति जगद्धाता यः प्राणः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३७<br><br>तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमतिमान् विभुः।<br>एभ्य एकतमं कस्मान्न त्वं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥ ३३८<br><br>उतान्यदेहसम्प्राप्त्या सुखं ते मनसेप्सितम्।<br>एवमेतत् तवाप्यत्र प्रभवो नाकम्पदाम्।<br>अस्मिन् नेह परत्रापि कल्याणप्राप्तयस्तव ॥ ३३९<br><br>पितुरेवास्ति तत् सर्वं सुरेभ्यो यन्न विद्यते।<br>अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स वाप्यत्राफलस्तव ॥ ३४०<br><br>प्रायेण प्रार्थितो भद्रे सुस्वल्पो ह्यतिदुर्लभः।<br>अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि ॥ ३४१ | इनसे तो कहीं अच्छे भगवान् विष्णु हैं, जिनके चरणोंपर प्रधान देवता अपने मुकुटसमूहोंको रगड़ते रहते हैं। जो शत्रुओंके संहारक, जगत्का पालन-पोषण करनेवाले, लक्ष्मीके पति और अनुपम शोभाशाली हैं। इसी प्रकार यज्ञभोजी देवताओंके स्वामी पाकशासन हैं। देवताओंके निधिस্বরূপ एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अग्नि हैं। जगत्का पालन-पोषण करनेवाले वायु हैं, जो सभी शरीरधारियोंके प्राण हैं तथा विश्रवाके पुत्र राजाधिराज कुबेर हैं, जो बड़े ऐश्वर्यशाली, बुद्धिमान् और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके अधीश्वर हैं। तुम इनमेंसे किसी एकको प्राप्त करनेकी इच्छा क्यों नहीं कर रही हो? अथवा यदि तुमने अपने मनमें यह ठान लिया हो कि जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होगी तो वह भी तुम्हें स्वर्गवासी देवताओंसे ही प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार तुम्हें देवताओंके बिना इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि अन्यान्य सुखदायक पदार्थोंको प्राप्त करना चाहती हो तो वे सब तुम्हारे पिताके पास ही इतने अधिक हैं, जो देवताओंके पास नहीं हैं; अतः उनकी प्राप्तिके हेतु तुम्हारा इस प्रकार कष्ट सहन करना व्यर्थ है। साथ ही भद्रे! प्रायः ऐसा देखा जाता है कि माँगी हुई वस्तुका मिलना अत्यन्त कठिन होता है और यदि मिल भी जाय तो बहुत थोड़ी ही मिलती है। इस कारण तुम्हारे इस मनोरथको ब्रह्मा ही पूर्ण कर सकते हैं (दूसरेकी शक्ति नहीं है) ॥ ३३५-३४१ ॥ | | सूत उवाच<br><br>इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिवर्यैषु शैलजा।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदैः ॥ ३४२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सप्तर्षियोंद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उन मुनियोंपर कुपित हो उठीं। उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और होंठ फड़कने लगे, तब वे बोलीं ॥ ३४२ ॥ | | देव्युवाच<br><br>असद्ग्रहस्य का नीतिर्नासनस्य क्व यन्त्रणा।<br>विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः ॥ ३४३ | **देवीने कहा—**सप्तर्षियो! असद् वस्तुको ग्रहण करनेवालेके लिये नीति कैसी ? तथा दुर्व्यसनीके लिये व्यसनकी प्राप्तिमें कष्ट कहाँ ? (अर्थात् जिसमें जिसका मन आसक्त हो गया है, उसकी प्राप्तिके लिये उसे कितना ही कष्ट क्यों न झेलना पड़े, परंतु वह उसकी परवा नहीं करता।) अरे! विपरीत अर्थको जाननेवाले आपलोगोंको किसने सन्मार्गपर नियुक्त कर दिया? | | एवं मां वेत्थ दुष्प्रज्ञां ह्यस्थानासद्ग्रहप्रियाम्।<br>न मां प्रति विचारोऽस्ति ततोऽहङ्कारमानिनी ॥ ३४४ | आपलोग मुझे इस प्रकार दुष्ट बुद्धिवाली तथा अयुक्त एवं असद् वस्तुको ग्रहण करनेकी अभिलाषिणी मानते हैं, अतः आपलोगोंका विचार मेरे प्रति ठीक नहीं है। इसी कारण मेरे मनमें अहंकारपूर्वक मान उत्पन्न हो गया है। | | प्रजापतिसमाः सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः। | यद्यपि आप सभी लोग प्रजापतिके समान समदर्शी हैं, |