भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 641
* अध्याय १५४ *६३१

| ऋषय ऊचुः<br><br>अत्यद्भुतास्यहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला।<br>प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात्॥ ३७४<br><br>न तु विद्मो वयं तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम्।<br>त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः॥ ३७५<br><br>अचिरादेव तन्वङ्गि कामस्तेऽयं भविष्यति।<br>क्वादित्यस्य प्रभा याति रत्नेभ्यः क्व द्युतिः पृथक्॥ ३७६<br><br>कोऽर्थो वर्णालिकाव्यक्तः कथं त्वं गिरिशं विना।<br>यामो नैकाभ्युपायेन तमभ्यर्थयितुं वयम्॥ ३७७<br><br>अस्माकमपि वै सोऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते।<br>अतस्त्वमेव सा बुद्धिर्यतो नीतिस्त्वमेव हि॥ ३७८<br><br>अतो निःसंशयं कार्यं शङ्करोऽपि विधास्यति।<br>इत्युक्त्वा पूजिता याता मुनयो गिरिकन्यया॥ ३७९<br><br>प्रययुर्गिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत्।<br>गङ्गाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गबद्धजटासटम्॥ ३८०<br><br>भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्त्रजम् ।<br>गिरेः सम्प्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शङ्कराश्रमम्॥ ३८१<br><br>प्रशान्ताशेषसत्त्वौघं नवस्तिमितकाननम्।<br>निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपानं सर्वतोदिशम्॥ ३८२<br><br>तत्रापश्यंस्ततो द्वारि वीरकं वेत्रपाणिनम्।<br>सम ते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात्॥ ३८३<br><br>ऊचुर्मधुरभाषिण्या वाचा ते वाग्मिनां वराः।<br>द्रष्टुं वयमिहायाताः शरण्यं गणनायकम्॥ ३८४<br><br>त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः।<br>त्वमेव नो गतिस्तत्त्वं यथा कालानतिक्रमः॥ ३८५<br><br>सा प्रार्थनैषा प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः।<br>इत्युक्तो मुनिभिः सोऽथ गौरवात् तानुवाच सः॥ ३८६ | **ऋषियोंने कहा—**पुत्रि! तुम तो अत्यन्त अद्भुत निर्मल ज्ञानकी मूर्ति-जैसी प्रतीत हो रही हो। अहो! शङ्करजीके भावसे भावित तुम्हारा भाव हमलोगोंको परम आनन्दित कर रहा है। शैलजे! उन देवाधिदेव शङ्करके इस अद्भुत ऐश्वर्यको हमलोग नहीं जानते हों— ऐसी बात नहीं है, अपितु हमलोग तुम्हारे निश्चयकी दृढ़ता जाननेके लिये यहाँ आये हैं। तन्वङ्गि! शीघ्र ही तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा। भला, सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहीं जा सकती है? रत्नोंकी कान्ति रत्नोंसे पृथक् होकर कहीं ठहर सकती है? तथा अक्षरसमूहोंसे प्रकट होनेवाला अर्थ अक्षरोंसे अलग कहीं रह सकता है? उसी प्रकार तुम शङ्करजीके बिना कैसे रह सकती हो। अच्छा, अब हमलोग अनेकों उपायोंद्वारा शङ्करजीसे प्रार्थना करनेके निमित्त जा रहे हैं; क्योंकि हमलोगोंके हृदयमें भी वही प्रयोजन निश्चित-रूपसे वर्तमान है। उसकी सिद्धिके लिये तुम्हीं वह बुद्धि और नीति हो। अतः शङ्करजी भी निःसंदेह उस कार्यका विधान करेंगे। ऐसा कहकर गिरिराजकुमारीद्वारा पूजित हो वे मुनिगण वहाँसे चल पड़े। तदनन्तर जो अपने शरीरको गङ्गा-जलसे आप्लावित करते हैं, जिनके मस्तकपर पीली जटा बँधी रहती है तथा जिनके गलेमें पड़ी हुई मन्दार-पुष्पोंकी माला हथेलीतक लटकती रहती है, जिसपर भँवरे मँडराते रहते हैं, उन शङ्करजीका दर्शन करनेके लिये वे सप्तर्षि हिमालयके विशाल शिखरकी ओर प्रस्थित हुए। हिमालयके उस शिखरपर पहुँचकर उन्होंने शङ्करजीके आश्रमको देखा। उस आश्रममें सम्पूर्ण प्राणिसमूह शान्तरूपसे बैठे हुए थे। वहाँका नूतन कानन भी शान्त था। चारों दिशाओंमें शब्दरहित एवं स्वच्छन्दगतिसे प्रवाहित होनेवाले जलसे युक्त झरने झर रहे थे। उस आश्रमके द्वारपर उन पूज्य एवं विनीत सप्तर्षियोंने हाथमें बेंत धारण किये वीरकको देखा। तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वे सप्तर्षि कार्यके गौरववश वीरकसे मधुर वाणीमें बोले—'द्वारपाल! ऐसा समझो कि हमलोग देवकार्यसे प्रेरित होकर यहाँ शरणदाता एवं गणनायक त्रिनेत्रधारी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये आये हैं। इस विषयमें तुम्हीं हमलोगोंके साधन हो। इसलिये हमलोगोंकी यह प्रार्थना है कि ऐसा उपाय करो, जिससे हमलोगोंका कालातिक्रम न हो; क्योंकि स्वामियोंकी सूचना तो प्रायः द्वारपालसे ही मिलती है।' मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वीरकने गौरववश उनसे कहा— |