मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६३२ * मत्स्यपुराण *
| समन्वास्यापरां संध्यां स्नातुं मन्दाकिनीजलैः।<br>क्षणेन भविता विप्रास्तत्र द्रक्ष्यथ शूलिनम्॥ ३८७ | 'विप्रवरो! अभी-अभी दोपहरकी संध्या समाप्त कर शङ्करजी मन्दाकिनीके जलमें स्नान करनेके लिये गये हैं, अतः क्षणभर ठहरिये, फिर आपलोग उन त्रिशूलधारीका दर्शन कीजियेगा।' इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण उस कालकी प्रतीक्षा करते हुए उसी प्रकार खड़े रहे, जैसे वर्षा-ऋतुमें प्यासे चातक जलसे भरे हुए बादलकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं॥ ३७४—३८८॥ |
| इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस्ते तत्कालप्रतीक्षिणः।<br>गम्भीराम्बुधरं प्रावृत्तृषिताश्चातका यथा॥ ३८८ | |
| ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधानक्रियाविधिः।<br>वीरासनं बिभेदेशो मृगचर्मनिवासनम्॥ ३८९ | तत्पश्चात् थोड़ी देर बाद जब समाधि सम्पन्न करके शङ्करजी मृगचर्मपर लगाये हुए वीरासनको छोड़कर उठे, तब वीरकने विनम्र भावसे पृथ्वीपर घुटने टेककर प्रणाम करते हुए महादेवजीसे कहा—'विभो! प्रचण्ड तेजस्वी सप्तर्षि आपका दर्शन करनेके लिये आये हुए हैं। उन्हें दर्शन करनेके लिये आदेश दीजिये अथवा इस विषयमें आप जैसा उचित समझें। उनके मनमें आपके दर्शनकी लालसा है और वे कह रहे हैं कि हमलोग देवकार्यसे आये हुए हैं।' तब उस महात्मा वीरकद्वारा इस प्रकार सूचित किये जानेपर जटाधारी शङ्करने भौंहोंके संकेतसे उन लोगोंके लिये प्रवेशाज्ञा प्रदान की। फिर तो वीरकने भी समीपमें ही स्थित उन सभी मुनियोंको सिर हिलाकर संकेतसे पिनाकधारी शङ्करका दर्शन करनेके लिये बुलाया। यह देखकर उतावलीवश आधी बँधी हुई शिखावाले एवं मृगचर्मरूपी वस्त्रको लटकाये हुए वे मुनिलोग शङ्करजीकी विभूतिसे सिद्ध हुई वेदीमें प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने बँधी हुई अञ्जलि तथा दोनेमें रखे हुए स्वर्गीय पुष्पसमूहोंको स्वर्गवासियोंद्वारा वन्दनीय शिवजीके दोनों चरणोंपर बिखेरकर नमस्कार किया। तब त्रिशूलधारी शङ्करने उन शान्तस्वभाव मुनियोंकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखा। इस प्रकार सत्कृत होनेसे प्रसन्न हुए ऋषिगण कामदेवके शत्रु भगवान् शङ्करकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति करने लगे॥ ३८९—३९६॥ |
| ततो विनीतो जानुभ्यामवलम्ब्य महीस्थितिम्।<br>उवाच वीरको देवं प्रणामैकसमाश्रयः॥ ३९० | |
| सम्प्राप्ता मुनयः सप्त द्रष्टुं त्वां दीप्ततेजसः।<br>विभो समादिश द्रष्टुमवगन्तुमिहार्हसि।<br>तेऽब्रुवन् देवकार्येण तव दर्शनलालसाः॥ ३९१ | |
| इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना।<br>भूभङ्गसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा॥ ३९२ | |
| मूर्धकम्पेन तान् सर्वान् वीरकोऽपि महामुनीन्।<br>आजुहावाविदूरस्थान् दर्शनाय पिनाकिनः॥ ३९३ | |
| त्वराबद्धार्धचूडास्ते लम्बमानाजिनाम्बराः।<br>विविशुर्वेदिकों सिद्धां गिरिशस्य विभूतिभिः॥ ३९४ | |
| बद्धपाणिपुटाक्षीमनाकपुष्पोत्करास्ततः ।<br>पिनाकिपादयुगलं वन्द्यं नाकनिवासिनाम्॥ ३९५ | |
| ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना।<br>मन्मथारिं ततो हृष्टाः सम्यक् तुष्टुवुरादृताः॥ ३९६ | |
| मुनय ऊचुः<br>अहो कृतार्था वयमेव साम्प्रतं<br>सुरेश्वरोऽप्यत्र पुरो भविष्यति।<br>भवत्प्रसादामलवारिसेकतः<br>फलेन काचित् तपसा नियुज्यते॥ ३९७ | **मुनियोंने कहा—**अहो भगवन्! इस समय हमलोग तो कृतार्थ हो ही गये, आगे चलकर देवराज इन्द्र भी सफलमनोरथ होंगे। इसी प्रकार आपकी कृपारूपी निर्मल जलके सिंचनसे कोई तपस्विनी भी अपनी तपस्याके फलसे युक्त होगी। |