मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १५४ * ६३५
| इत्युक्ता मुनयस्ते तु प्रियया हिमभूभृतः।<br>ऊचुः पुनरुदारार्थं नारीचित्तप्रसादकम्॥ ४१७ | हिमाचलकी पत्नी मेनाद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण पुनः नारीके चित्तको प्रसन्न करनेवाले उदार अर्थसे युक्त वचन बोले॥ ४१४-४१७॥ |
| मुनय ऊचुः<br>ऐश्वर्यमवगच्छस्व शंकरस्य सुरासुरैः।<br>आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात् सुनिर्वृतैः॥ ४१८<br>यस्योपयोगि यद्रूपं सा च तत्प्राप्तये चिरम्।<br>घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृतिः॥ ४१९<br>यस्तद्व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम्।<br>तत्र सावहिता तावत् तस्मात् सैव भविष्यति॥ ४२०<br>इत्युक्त्वा गिरिणा सार्धं ते ययुर्यत्र शैलजा।<br>जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयी ह्युमा॥ ४२१<br>प्रोचुस्तां मुनयः स्निग्धं सम्मान्यपथमागतम्।<br>रम्यं प्रियं मनोहारि मा रूपं तपसा दह॥ ४२२<br>प्रातस्ते शंकरः पाणिमेष पुत्रि ग्रहीष्यति।<br>वयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः॥ ४२३<br>पित्रा सह गृहं गच्छ वयं यामः स्वमन्दिरम्॥ ४२४<br>इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य सा।<br>त्वरमाणा ययौ वेश्म पितुर्दिव्यार्थशोभितम्॥ ४२५<br>सा तत्र रजनीं मेने वर्षायुतसमां सती।<br>हरदर्शनसंजातमहोत्कण्ठा हिमाद्रिजा॥ ४२६ | **मुनियोंने कहा—**मेना! तुम शङ्करजीके ऐश्वर्यका ज्ञान उन देवताओं और असुरोंसे प्राप्त करो, जो उनके दोनों चरणकमलोंकी आराधना करके भलीभाँति संतुष्ट हो चुके हैं। जिसके लिये जो रूप उपयोगी होता है, वह उसीकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है। इस नियमके अनुसार वह कन्या शंकरजीकी प्राप्तिके लिये चिरकालसे घोर तपस्या कर रही है। उसे उसी रूपसे पूर्ण संतोष है। जो पुरुष उसके दिव्य व्रतोंका समापन करेगा, उसके प्रति वह अतिशय प्रसन्न एवं संतुष्ट होगी। ऐसा कहकर वे मुनिगण हिमाचलके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ सूर्य और अग्निकी ज्वालाको जीतनेवाली एवं तपस्याके तेजसे युक्त पार्वती उमा तपस्या कर रही थीं। वहाँ पहुँचकर मुनियोंने पार्वतीसे स्नेहपूर्ण वाणीमें कहा—'पुत्रि! अब तुम्हारे लिये सम्मान्यका पथ प्राप्त हो गया है, इसलिये अब तुम अपने इस रमणीय, प्रिय एवं मनको लुभानेवाले रूपको तपस्यासे दग्ध मत करो। प्रातःकाल वे शङ्कर तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे। हमलोग उनसे प्रार्थना करके पहले ही तुम्हारे पिताके पास आ गये हैं। अब तुम अपने पिताके साथ घर लौट जाओ और हमलोग अपने निवासस्थानको जा रहे हैं। इस प्रकार कही जानेपर पार्वती 'तपका फल निश्चय ही सत्य होता है'—ऐसा विचारकर दिव्य पदार्थोंसे सुशोभित अपने पिताके घरकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुई। वहाँ पहुँचकर पार्वतीके मनमें शङ्करजीके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, जिससे सती पार्वतीको वह रात्रि दस हजार वर्षोंके समान प्रतीत होने लगी॥ ४१८-४२६॥ |
| ततो मुहूर्ते ब्राह्मे तु तस्याश्चक्रुः सुरस्त्रियः।<br>नानामङ्गलसंदोहान् यथावत्क्रमपूर्वकम्॥ ४२७<br>दिव्यमण्डनमङ्गानां मन्दिरे बहुमङ्गले।<br>उपासत गिरिं मूर्ता ऋतवः सार्वकात्मकाः॥ ४२८<br>वायवो वारिदाश्चासन् सम्मार्जनविधौ गिरेः।<br>हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना॥ ४२९<br>कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्चाभावदाकुला।<br>चिन्तामणिप्रभृतयो रत्नाः शैलं समंततः॥ ४३० | तदनन्तर प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें देवाङ्गनाओंने पार्वतीके लिये क्रमशः नाना प्रकारके माङ्गलिक कार्योंको यथार्थरूपसे सम्पन्न किया। फिर उस विविध प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त भवनमें पार्वतीके अङ्गोंको दिव्य शृंगारसे सुशोभित किया गया। उस समय सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली छहों ऋतुएँ शरीर धारणकर हिमाचलकी सेवामें उपस्थित हुईं, वायु और बादल पर्वतकी गुफाओंमें झाड़-बुहारके कार्यमें संलग्न थे। अट्टालिकाओंपर स्वयं लक्ष्मीदेवी नाना प्रकारकी सामग्रियोंको सँजोये हुए विराजमान थीं। सभी पदार्थोंमें कान्ति फूटी पड़ती थी। ऋद्धि आकुल हो उठी थी। चिन्तामणि आदि रत्न पर्वतपर चारों ओर |