मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| उपस्तस्थुर्नगाश्चापि कल्पकाममहाद्रुमाः।<br>ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः॥ ४३१<br>रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किङ्कराः।<br>किङ्करास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिनः॥ ४३२<br>नद्यः समुद्रा निखिलाः स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>तत्सर्वं हिमशैलस्य महिमानमवर्धयत्॥ ४३३ | बिखरे हुए थे। कल्पवृक्ष आदि महनीय वृक्षोंसे युक्त अन्यान्य पर्वत भी सेवामें उपस्थित थे। दिव्यौषधिसे युक्त मूर्तिमती ओषधियाँ तथा सभी प्रकारके रस और धातुएँ हिमाचलके परिचारकरूपमें विद्यमान थे। हिमाचलके वे सभी किंकर आज्ञापालनके लिये उतावले हो रहे थे। इनके अतिरिक्त सभी समुद्र और नदियाँ तथा समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणी उस समय हिमाचलकी महिमाको बढ़ा रहे थे॥ ४२७-४३३॥ | | अभवन् मुनयो नागा यक्षगन्धर्वकिन्नराः।<br>शंकरस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्वते॥ ४३४<br>सर्वे मण्डनसम्भारास्तस्थुर्निर्मलमूर्तयः।<br>शर्वस्यापि जटाजूटे चन्द्रखण्डं पितामहः॥ ४३५<br>बबन्ध प्रणयोदारविस्फारितविलोचनः।<br>कपालमालां विपुलां चामुण्डा मूर्ध्न्यबन्धत॥ ४३६<br>उवाच चापि वचनं पुत्रं जनय शंकर।<br>यो दैत्येन्द्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति॥ ४३७<br>शौरिर्ज्वलच्छिरोरत्नमुकुटं चानलोल्बणम्।<br>भुजगाभरणं गृह्य सज्जं शम्भोः पुरोऽभवत्॥ ४३८<br>शक्रो गजाजिनं तस्य वसाभ्यक्ताग्रपल्लवम्।<br>दधे सरभसं स्विद्यद्विस्तीर्णमुखपङ्कजम्॥ ४३९<br>वायुश्च विपुलं तीक्ष्णशृङ्गं हिमगिरिप्रभम्।<br>वृषं विभूषयामास हयानं महौजसम्॥ ४४०<br>वितेनुर्नयनान्तःस्थाः शम्भोः सूर्यानलेन्दवः।<br>स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः॥ ४४१<br>चिताभस्म समाधाय कपाले रजतप्रभम्।<br>मनुजास्थिमयीं मालामाबबन्ध च पाणिना॥ ४४२<br>प्रेताधिपः पुरो द्वारे सगदः समवर्तत।<br>नानाकारमहारत्नभूषणं धनदाहृतम्॥ ४४३<br>विहायोदग्रसर्पेन्द्रकटकेन स्वपाणिना।<br>कर्णोत्तंसं चकारेशो वासुकिं तक्षकं स्वयम्॥ ४४४<br>जलाधीशाहतां स्थास्नुप्रसूनावेष्टितां पृथक्। | उधर गन्धमादन पर्वतपर शङ्करजीके विवाहोत्सवमें सभी मुनि, नाग, यक्ष, गन्धर्व और किंनर आदि देवगण सम्मिलित हुए। वे सभी निर्मल मूर्ति धारणकर शृङ्गारसामग्रीके जुटानेमें तत्पर थे। उस समय प्रेम एवं उदार भावनासे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शंकरजीके जटाजूटमें चन्द्रखण्डको बाँधा। चामुण्डाने उनके मस्तकपर एक विशाल कपालमाला बाँधी और इस प्रकार कहा—'शंकर! ऐसा पुत्र उत्पन्न करो, जो दैत्यराज तारकके कुलका संहार कर मुझे रक्तसे तृप्त करे।' भगवान् विष्णु अग्निके समान उद्दीप्त एवं चमकीले अग्रभागवाले रत्नोंसे निर्मित मुकुट और सर्पोंके आभूषण आदि शृङ्गारसामग्री लेकर शंकरजीके आगे उपस्थित हुए। इन्द्रने वेगपूर्वक गजचर्म लाकर शंकरजीको धारण कराया, जिसका अग्रभाग चर्बीसे लिस हुआ था। उस समय प्रसन्नतासे खिले हुए इन्द्रके मुखकमलपर पसीनेकी बूँदें झलक रही थीं। वायुने शंकरजीके वाहन उस वृषभराज नन्दीश्वरको विभूषित किया, जिसका शरीर विशाल था, जिसके सींग तीखे थे तथा जो हिमाचलके समान उज्ज्वल कान्तिवाला एवं महान् ओजस्वी था। जगत्के कर्मोंके साक्षी सूर्य, अग्नि और चन्द्र लोकनायक शम्भुके नेत्रोंके अन्तस्तलमें स्थित होकर अपनी-अपनी प्रभाका विस्तार करने लगे। प्रेतराज यमने शंकरजीके मस्तकपर चाँदीके समान चमकीला चिताभस्म लगाकर एक हाथसे मनुष्योंकी हड्डियोंसे बनी हुई मालाको बाँधा और फिर वे हाथमें गदा लेकर द्वारपर खड़े हो गये। तत्पश्चात् शिवजीने कुबेरद्वारा लाये गये नाना प्रकारके बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषणों और वरुणद्वारा लायी गयी अम्लान (न कुम्हलानेवाले) पुष्पोंसे गूँथी गयी मालाको पृथक् रखकर विषैले सर्पोंके कङ्कणसे सुशोभित अपने हाथसे स्वयं वासुकि और तक्षकको अपना कुण्डल बनाया॥ ४३४-४४४ १/२॥ |