भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६३८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न भृङ्गिणा स्वतनुमवेक्ष्य नीयते<br>पिनाकिनः पृथुमुखमण्डमग्रतः।<br>वृथा यम प्रकटितदन्तकोटरं<br>त्वमायुधं वहसि विहाय सम्भ्रमम्॥ ४५६शङ्करजीके आगे-आगे विशाल पानपात्रको लेकर चलनेवाले भृङ्गी अपने शरीरकी रक्षा करते हुए नहीं चल रहे हैं। यम! तुम अपने इस निकले हुए दाँतोंवाले आयुधको व्यर्थ ही धारण किये हुए हो। भय छोड़कर चलो।
पदं न यद्रथतुरगैः पुरद्विषः<br>प्रमुच्यते बहुतरमातृसंकुलम्।<br>अमी सुराः पृथगनुयायिभिर्वृताः<br>पदातयो द्विगुणपथान् हरप्रियाः॥ ४५७शङ्करजीके रथके घोड़े अपने मार्गको बहुत-सी माताओंसे व्याप्त होनेपर भी नहीं छोड़ रहे हैं। ये शङ्करजीके प्रिय देवगण पृथक्-पृथक् अपने अनुयायियोंसे घिरे हुए पैदल ही दूना मार्ग तय कर रहे हैं॥ ४५२-४५७॥
स्ववाहनैः पवनविधूतचामरै-<br>श्लथध्वजैर्व्रजत विहारशालिभिः।<br>सुराः स्वकं किमिति न रागमूर्जितं<br>विचार्यते नियतलयत्रयानुगम्॥ ४५८‘देवगण! आपलोग आमोदके साधनोंसे सम्पन्न एवं वायुके आवेगसे हिलते हुए चामरोंसे युक्त अपने वाहनोंद्वारा, जिनपर ध्वजाएँ फहरा रही हैं, अलग-अलग होकर चलिये। आपलोग नियतरूपसे तीनों लयोंका अनुगमन करनेवाले अपने ऊर्जस्वी रागके विषयमें क्यों नहीं विचार कर रहे हैं?
न किन्नरैरभिभवितुं हि शक्यते<br>विभूषणप्रचयसमुद्भवो ध्वनिः।<br>स्वजातिकाः किमिति न षड्जमध्यम-<br>पृथुस्वरं बहुतरमत्र वक्ष्यते॥ ४५९किंनरगण (अपने वाद्योंद्वारा) आभूषणसमूहसे उत्पन्न हुई ध्वनिको परास्त नहीं कर सकते। अपनी जातिवाले गणेश्वरो! इस समय षड्ज, मध्यम और पृथु स्वरसे युक्त गीत अधिक मात्रामें क्यों नहीं गाये जा रहे हैं।
नतानताननतततानतां गताः<br>पृथक्तया समयकृता विभिन्नताम्।<br>विशङ्किता भवदतिभेदशीलिनः<br>प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडकाः॥ ४६०ये गौड¹-रागके जानकार लोग कालभेदके अनुसार विभिन्नताको प्राप्त हुए एवं नतानत, नत और आनतके लयसे युक्त अत्यन्त भेदवाले रागको पृथक्रूपमें निःशङ्कभावसे अलापते हुए बड़ी शीघ्रतासे चले जा रहे हैं।
विसंहताः किमिति न षाडवादयः<br>स्वगीतकैर्ललितप्रदप्रयोजकैः।<br>प्रभोः पुरो भवति हि यस्य चाक्षतं<br>समुद्गतार्थकमिति तत्प्रतीय॥ ४६१षाडव² रागके ज्ञातालोग पृथक्-पृथक् अपने ललित पदोंके प्रयोजक गीतोंको अलापते हुए शंकरजीके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहे हैं? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शंकरजीकी हर्षपूर्ण यात्रामें विघ्न न पड़ जाय, इस भयसे वे ऐसा नहीं कर रहे हैं।
अमी पृथग्विरचितरम्यरासकं<br>विलासिनो बहुगमकस्वभावकम्।<br>प्रयुञ्जते गिरिशयशोविसारिणं<br>प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः॥ ४६२ये विभिन्न जातियोंके विलासोन्मत्त नाग शंकरजीके यशका विस्तार करनेवाले, अधिकांश गमक³के स्वभावसे सम्पन्न तथा मनोहर ध्वनिसे युक्त संगीतका पृथक्-पृथक् प्रयोग कर रहे हैं।
अमी कथं ककुभि कथाः प्रतिक्षणं<br>ध्वनन्ति ते विविधवधूमिश्रिताः।<br>न जातयो ध्वनिमुरजासमीरिता<br>न मूर्च्छिताः किमिति च मूर्च्छनात्मिकाः॥ ४६३उधर उस दिशामें ये वधुओंसहित अनेकों संगीतज्ञ प्रतिक्षण कैसा संगीत अलाप रहे हैं? पता नहीं क्यों, न तो उसमें मृदङ्गसे निकली हुई ध्वनिकी जातियाँ लक्षित हो रही हैं, न मूर्च्छना⁴-आरोह-अवरोहसे युक्त स्वरका ही भान हो रहा है।

१. एक संकर राग। २. रागकी एक जाति, जिसमें केवल छः स्वर आते हैं। ३. सातों स्वरोंका क्रमसे आरोह-अवरोह। ४. गानेमें एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिपर जानेकी एक रीति।