भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १५४ *६३९
श्रुतिप्रियक्रमगतिभेदसाधनं<br>  ततादिकं किमिति न तुम्बुरेरितम्।<br>न हन्यते बहुविधवाद्यडम्बरं<br>  प्रकीर्णवीणामुरजादि नाम यत्॥ ४६४॥तुम्बुरुद्वारा बजाये जानेवाले कर्णप्रिय तथा क्रम एवं गतिके भेदसे युक्त तारवाले बाजे क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं? इधर वीणा, मृदंग आदि अनेकों प्रकारके वाद्यसमूह क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं?'॥ ४५८-४६४॥
इतीरितां गिरमवधार्य शालिनीं<br>  सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया।<br>नियामिताः प्रययुरतीव हर्षिता-<br>  श्चराचरं जगदखिलं ह्यपूरयन्॥ ४६५॥<br>इति स्तनत्ककुभि रसन् महार्णवे<br>  स्तनद्घने विदलितशैलकन्दरे।<br>जगत्यभूत् तुमुल इवाकुलीकृतः<br>  पिनाकिना त्वरितगतेन भूधरः॥ ४६६॥<br>परिज्वलत्कनकसहस्रतोरणं<br>  क्वचिन्मिलन्मरकतवेश्मवेदिकम्।<br>क्वचित्क्वचिद्विमलविदूर्र्यभूमिकं<br>  क्वचिद्गलज्जलधररम्यनिर्झरम्॥ ४६७॥<br>चलद्ध्वजप्रवरसहस्रमण्डितं<br>  सुरद्रुमस्तबकविकीर्णचत्वरम् ।<br>सितासितारुणरुचिधातुवर्णिकं<br>  श्रियोज्ज्वलं प्रविततमार्गगोपुरम्॥ ४६८॥<br>विजृम्भिताप्रतिमध्वनिवारिदं<br>  सुगन्धिभिः पुरपवनैर्मनोहरम् ।<br>हरो महागिरिनगरं समासदत्<br>  क्षणादिव प्रवरसुरासुरस्तुतः॥ ४६९॥इस प्रकार कही गयी उस सुन्दर वाणीको सुनकर देवता और दैत्य अत्यन्त प्रसन्न हो गये। तब वे तुरंत ही वीरककी आज्ञासे सम्पूर्ण चराचर जगत्को आच्छादित करते हुए नियमपूर्वक आगे बढ़ने लगे। इस प्रकार शंकरजीके शीघ्रतापूर्वक गमनसे दिशाओंमें कोलाहल गूँज उठा, महासागरोंमें ज्वार उठने लगा, बादल गरजने लगे, पर्वतकी कन्दराएँ तहस-नहस हो गयीं, जगत्में तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी और हिमाचल व्याकुल हो गये। इस प्रकार श्रेष्ठ सुरों एवं असुरोंद्वारा प्रशंसित होते हुए शिवजी क्षणमात्रमें ही पर्वतराज हिमाचलके उस नगरमें जा पहुँचे, जो तपाये गये सुवर्णके सहस्रों तोरणोंसे सुशोभित था। उसमें कहीं-कहीं मरकतमणिके संयोगसे बने हुए घरोंमें वेदिकाएँ बनी हुई थीं। कहीं-कहीं निर्मल वैदूर्य मणिके फर्श बने थे। कहीं बादलके समान रमणीय झरने झर रहे थे। वह नगर हजारों फहराते हुए ऊँचे-ऊँचे ध्वजोंसे विभूषित था। वहाँ चबूतरोंपर कल्पवृक्षके पुष्पोंके गुच्छे बिखेरे गये थे। वह श्वेत, काले और लाल रंगकी धातुओंसे रँगा हुआ था। उसकी उज्ज्वल छटा फैल रही थी। उसके मार्ग और फाटक अत्यन्त विस्तृत थे। वहाँ उमड़े हुए बादलोंका अनुपम शब्द हो रहा था। सुगन्धयुक्त वायुके चलनेसे वह पुर अत्यन्त मनोहर लग रहा था॥ ४६५-४६९॥
तं प्रविशन्तमगात् प्रविलोक्य<br>  व्याकुलतां नगरं गिरिभर्तुः।<br>व्यग्रपुरन्ध्रिजनं जवियानं<br>  धावितमार्गजनाकुलरथ्यम् ॥ ४७०॥<br>हर्म्यगवाक्षगतामरनारी-<br>  लोचननीलसरोरुहमालम् ।<br>सुप्रकटा समदृश्यत काचित्<br>  स्वाभरणांशुवितानविगूढा ॥ ४७१॥<br>काप्यखिलीकृतमण्डनभूषा<br>  त्यक्तसखीप्रणया हरमैक्षत्।<br>काचिदुवाच कलं गतमाना<br>  कातरतां सखि मा कुरु मूढे॥ ४७२।शिवजीको उस नगरमें प्रवेश करते देखकर पर्वतराज हिमाचलका सारा नगर व्याकुल हो गया। पति-पुत्र आदिसे युक्त सम्मानित नारियाँ व्याकुल होकर वेगपूर्वक इधर-उधर भागने लगीं। मार्गों और गलियोंमें भागते हुए लोगोंकी भीड़ लग गयी। कोई देवाङ्गना अट्टालिकाके झरोखेमें बैठकर अपने नीलकमलके-से नेत्रोंसे उसकी शोभा बढ़ा रही थी। कोई नारी अपने आभूषणोंकी किरणोंसे छिपी होनेपर भी प्रत्यक्ष रूपमें दीख रही थी। कोई सुन्दरी अपनेको सम्पूर्ण श्रृङ्गारोंसे विभूषितकर सखीके प्रेमको छोड़कर शिवजीकी ओर निहार रही थी। कोई नारी अभिमानरहित हो मधुर वाणीमें बोली—'अरी भोली-