भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६४०* मत्स्यपुराण *

| दग्धमनोभव एव पिनाकी<br>कामयते स्वयमेव विहर्तुम्।<br>काचिदपि स्वयमेव पतन्ती<br>प्राह परां विरहस्खलिताङ्गीम्॥ ४७३<br>मा चपले मदनव्यतिषङ्गं<br>शङ्करजं स्खलनेन वद त्वम्।<br>कापि कृतव्यवधानमदृष्ट्वा<br>युक्तिवशाद्गिरिशो ह्ययमूचे॥ ४७४<br>एष स यत्र सहस्रमखाद्या<br>नाकसदामधिपाः स्वयमुक्तैः।<br>नामभिरिन्दुजटं निजसेवा-<br>प्राप्तिफलाय नतास्तु घटन्ते॥ ४७५<br>एष न चैष स एष यदग्रे<br>चर्मपरीततनुः शशिमौली।<br>धावति वज्रधरोऽमरराजो<br>मार्गममुं विवृतीकरणाय॥ ४७६<br>एष स पद्मभवोऽप्युपेत्य<br>प्रांशुजटामृगचर्मनगूढः ।<br>सप्रणयं करघट्टितवक्त्रः<br>किंचिदुवाच मितं श्रुतिमूले॥ ४७७<br>एवम्भूत् सुरनारिकुलानां<br>चित्तविसंस्थुलता गुरुरागात्।<br>शंकरसंश्रयणाद्रिरिजाया<br>जन्मफलं परमं त्विति चोचुः॥ ४७८ | 'भाली सखि! तुम कातर मत होओ। यद्यपि शिवजीने कामदेवको जला दिया है, तथापि वे स्वयं ही विहार करनेकी इच्छा करते हैं।' कोई सुन्दरी, जो स्वयं मनोभवके फंदेमें पड़ गयी थी, विरहसे स्खलित अङ्गोंवाली दूसरी नारीसे बोली—'चपले! तुम भूलसे शङ्करजीके साथ कामदेवके संयोगकी चर्चा मत किया कर!' कोई कामिनी व्यवधान पड़नेके कारण शङ्करजीको न देखकर युक्तिपूर्वक 'शङ्कर यही हैं'—ऐसा मानकर कह रही थी—'वे शिव यही हैं, जिन चन्द्रशेखरको अपनी सेवाके फलकी प्राप्तिके निमित्त स्वर्गवासियोंके अधीश्वर इन्द्र आदि देवगण स्वयं अपना-अपना नाम लेकर नमस्कार कर रहे हैं।' कोई नारी कह रही थी—'अरे! शिवजी यह नहीं हैं, वे तो वह हैं, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा पा रहा है और जिनका शरीर चमड़ेसे ढँका हुआ है तथा जिनके आगे वज्रधारी देवराज इन्द्र इस मार्गको निर्बाध करनेके लिये दौड़ रहे हैं। देखो, ये लम्बी जटाओं और मृगचर्मसे सुशोभित पद्मयोनि ब्रह्मा भी उनके निकट जाकर हाथसे मुख पकड़े हुए प्रेमपूर्वक उनके कानोंमें कुछ कह रहे हैं।' इस प्रकार अतिशय प्रेमके कारण देवाङ्गनाओंके चित्तमें परम संतोष हुआ। तब वे कहने लगीं कि शङ्करजीका आश्रय ग्रहण करनेसे पार्वतीको अपने जन्मका परम फल प्राप्त हो गया॥ ४७०—४७८॥ | | ततो हिमगिरेर्वेश्म विश्वकर्मनिवेदितम्।<br>महानीलमयस्तम्भं ज्वलत्काञ्चनकुट्टिमम्॥ ४७९<br>मुक्ताजालपरिष्कारं ज्वलितौषधिदीपितम्।<br>क्रीडोद्यानसहस्राढ्यं काञ्चनाबद्धदीर्घिकम्॥ ४८०<br>महेन्द्रप्रमुखाः सर्वे सुरा दृष्ट्वा तदद्भुतम्।<br>नेत्राणि सफलान्यद्य मनोभिरिति ते दधुः॥ ४८१<br>विमर्दकीर्णकेयूरा हरिणा द्वारि रोधिताः।<br>कथंचित् प्रमुखास्तत्र विविशुर्नाकवासिनः॥ ४८२<br>प्रणतेनाचलेन्द्रेण पूजितोऽथ चतुर्मुखः।<br>चकार विधिना सर्वं विधिमन्त्रपुरःसरम्॥ ४८३ | तदनन्तर भगवान् शङ्कर हिमाचलके उस भवनमें प्रविष्ट हुए, जिसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्माने किया था तथा जिसमें महानीलमणिके खम्भे लगे हुए थे, जिसका फर्श तपाये हुए स्वर्णका बना हुआ था, जो मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित और जलती हुई औषधियोंके प्रकाशसे उद्दीप्त हो रहा था, जिसमें हजारों क्रीडोद्यान थे तथा जिसकी बावलियोंकी सीढ़ियाँ सोनेकी बनी हुई थीं। उस अद्भुत भवनको देखकर महेन्द्र आदि सभी देवताओंने अपने मनमें ऐसा समझा कि आज हमारे नेत्र सफल हो गये। उस भवनके द्वारपर श्रीहरिद्वारा रोके जानेपर भीड़के कारण जिनके केयूर परस्पर रगड़ खाकर चूर-चूर हो गये थे, ऐसे कुछ प्रमुख स्वर्गवासी किसी प्रकार उस भवनमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर वहाँ (मण्डपमें) पर्वतराज हिमाचलने विनम्रभावसे ब्रह्माकी पूजा की। तब |