मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ततो गते भगवति नीललोहिते<br>सहोमया रतिमलभन्न भूधरः।<br>सबान्धवो भवति च कस्य नो मनो<br>विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः॥ ४९७<br>ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं<br>स्फुटद्युति स्फटिकगोपुरं पुरम्।<br>हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा<br>विसर्जितामरनिवहोऽविशत्स्वकम्॥ ४९८ | तदनन्तर नीललोहित भगवान् शङ्करके उमासहित चले जानेपर भाई-बन्धुओंसहित हिमाचलका मन खिन्न हो गया; क्योंकि जगत्में भला ऐसा कौन कन्याका पिता होगा, जिसका मन उसकी विदाईके समय विह्वल न हो जाता हो ? उधर मन्दराचलपर शिवजीका नगर बहुत पहलेसे ही विरचित था। वह चमकती हुई मणियों, स्फटिक-शिलाओं और स्वर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उसकी कान्ति फूटी पड़ती थी और उसमें स्फटिकके फाटक लगे हुए थे। वहाँ पहुँचकर शिवजी देवसमूहको विदा कर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए॥ ४९७-४९८॥ | | तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा।<br>पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च॥ ४९९ | वहाँ भग-नेत्रहारी भगवान् शङ्कर उमासहित नगरके रमणीय उद्यानों तथा एकान्त वनोंमें विहार करने लगे। | | सुरक्तहृदयो देव्या मकराङ्कपुरःसरः।<br>ततो बहुतिथे काले सुतकामा गिरेः सुता॥ ५०० | उस समय उनका हृदय कामके वशीभूत होनेके कारण पार्वतीदेवीके प्रति अतिशय अनुरक्त हो गया था। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके पश्चात् पार्वतीके मनमें पुत्रकी कामना उत्पन्न हुई, | | सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः।<br>कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा॥ ५०१ | तब वे सखियोंके साथ कृत्रिम पुत्र बनाकर क्रीडा करने लगीं। किसी समय पार्वतींने सुगन्धित तेलसे शरीरको मलकर उसके मैल | | चूर्णैरुद्वर्तयामास मलिनान्तरितां तनुम्।<br>तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्॥ ५०२ | जमे हुए अङ्गोंमें चूर्णका उबटन भी लगाया। फिर उस लेपनको इकट्ठाकर उससे हाथीके-से मुखवाले पुरुषकी आकृतिका निर्माण किया। | | पुत्रकं क्रीडती देवी तं चाक्षिपयदम्भसि।<br>जाह्नव्यास्तु शिवासख्यास्ततः सोऽभूद् बृहद्वपुः॥ ५०३ | उसके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् पार्वतीदेवीने उसे अपनी सखी जाह्नवीके जलमें डलवा दिया। वहाँ वह विशाल शरीरवाला हो गया और | | कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा।<br>पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्युचे च जाह्नवी॥ ५०४ | अपने उस अत्यन्त विशाल शरीरसे सारे जगत्को आच्छादित कर लिया। तब पार्वतीदेवीने उसे 'पुत्र' ऐसा कहा और उधर जाह्नवीने भी उसे 'पुत्र' कहकर पुकारा। | | गाङ्गेय इति देवैस्तु पूजितोऽभूद्गजाननः।<br>विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः॥ ५०५ | अन्तमें वह गजानन 'गाङ्गेय' नामसे देवताओंद्वारा सम्मानित किया गया और ब्रह्माने उसे विनायकोंका आधिपत्य प्रदान किया। | | पुनः सा क्रीडनं चक्रे पुत्रार्थं वरवर्णिनी।<br>मनोज्ञमङ्कुरं रूढमशोकस्य शुभानना॥ ५०६<br>वर्धयामास तं चापि कृतसंस्कारमङ्गला।<br>बृहस्पतिमुखैर्विप्रैर्दिवस्पतिपुरोगमैः ॥ ५०७ | तत्पश्चात् सुन्दर मुखवाली सुन्दरी पार्वतींने पुनः पुत्रकी कामनासे अशोकके नये निकले हुए सुन्दर अङ्कुरको खिलौना बनाया और बृहस्पति आदि विप्रों तथा इन्द्र आदि देवताओंद्वारा अपना माङ्गलिक संस्कार कराकर उसे पाला-पोसा। | | ततो देवैश्च मुनिभिः प्रोक्ता देवी त्विदं वचः।<br>भवानि भवती भव्या सम्भूता लोकभूतये॥ ५०८ | यह देखकर देवताओं और मुनियोंने पार्वतीदेवीसे यह बात कही—'भवानि! आप तो परम सुन्दर रूपवाली हो और लोकके कल्याणके लिये प्रकट हुई हो। | | प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते।<br>अपुत्रा च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते दैवहेतुतः॥ ५०९ | प्रायः संसार पुत्ररूप फलका ही प्रेमी है और वह फल पुत्र-पौत्रोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जगत्में जो प्रजाएँ पुत्रहीन हैं, वे प्रायः प्रारब्धके कारण ही वैसा दीख पड़ती हैं। |