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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१५५- भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान

६४२* मत्स्यपुराण *

| ततो गते भगवति नीललोहिते<br>सहोमया रतिमलभन्न भूधरः।<br>सबान्धवो भवति च कस्य नो मनो<br>विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः॥ ४९७<br>ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं<br>स्फुटद्युति स्फटिकगोपुरं पुरम्।<br>हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा<br>विसर्जितामरनिवहोऽविशत्स्वकम्॥ ४९८ | तदनन्तर नीललोहित भगवान् शङ्करके उमासहित चले जानेपर भाई-बन्धुओंसहित हिमाचलका मन खिन्न हो गया; क्योंकि जगत्में भला ऐसा कौन कन्याका पिता होगा, जिसका मन उसकी विदाईके समय विह्वल न हो जाता हो ? उधर मन्दराचलपर शिवजीका नगर बहुत पहलेसे ही विरचित था। वह चमकती हुई मणियों, स्फटिक-शिलाओं और स्वर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उसकी कान्ति फूटी पड़ती थी और उसमें स्फटिकके फाटक लगे हुए थे। वहाँ पहुँचकर शिवजी देवसमूहको विदा कर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए॥ ४९७-४९८॥ | | तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा।<br>पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च॥ ४९९ | वहाँ भग-नेत्रहारी भगवान् शङ्कर उमासहित नगरके रमणीय उद्यानों तथा एकान्त वनोंमें विहार करने लगे। | | सुरक्तहृदयो देव्या मकराङ्कपुरःसरः।<br>ततो बहुतिथे काले सुतकामा गिरेः सुता॥ ५०० | उस समय उनका हृदय कामके वशीभूत होनेके कारण पार्वतीदेवीके प्रति अतिशय अनुरक्त हो गया था। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके पश्चात् पार्वतीके मनमें पुत्रकी कामना उत्पन्न हुई, | | सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः।<br>कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा॥ ५०१ | तब वे सखियोंके साथ कृत्रिम पुत्र बनाकर क्रीडा करने लगीं। किसी समय पार्वतींने सुगन्धित तेलसे शरीरको मलकर उसके मैल | | चूर्णैरुद्वर्तयामास मलिनान्तरितां तनुम्।<br>तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्॥ ५०२ | जमे हुए अङ्गोंमें चूर्णका उबटन भी लगाया। फिर उस लेपनको इकट्ठाकर उससे हाथीके-से मुखवाले पुरुषकी आकृतिका निर्माण किया। | | पुत्रकं क्रीडती देवी तं चाक्षिपयदम्भसि।<br>जाह्नव्यास्तु शिवासख्यास्ततः सोऽभूद् बृहद्वपुः॥ ५०३ | उसके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् पार्वतीदेवीने उसे अपनी सखी जाह्नवीके जलमें डलवा दिया। वहाँ वह विशाल शरीरवाला हो गया और | | कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा।<br>पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्युचे च जाह्नवी॥ ५०४ | अपने उस अत्यन्त विशाल शरीरसे सारे जगत्को आच्छादित कर लिया। तब पार्वतीदेवीने उसे 'पुत्र' ऐसा कहा और उधर जाह्नवीने भी उसे 'पुत्र' कहकर पुकारा। | | गाङ्गेय इति देवैस्तु पूजितोऽभूद्गजाननः।<br>विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः॥ ५०५ | अन्तमें वह गजानन 'गाङ्गेय' नामसे देवताओंद्वारा सम्मानित किया गया और ब्रह्माने उसे विनायकोंका आधिपत्य प्रदान किया। | | पुनः सा क्रीडनं चक्रे पुत्रार्थं वरवर्णिनी।<br>मनोज्ञमङ्कुरं रूढमशोकस्य शुभानना॥ ५०६<br>वर्धयामास तं चापि कृतसंस्कारमङ्गला।<br>बृहस्पतिमुखैर्विप्रैर्दिवस्पतिपुरोगमैः ॥ ५०७ | तत्पश्चात् सुन्दर मुखवाली सुन्दरी पार्वतींने पुनः पुत्रकी कामनासे अशोकके नये निकले हुए सुन्दर अङ्कुरको खिलौना बनाया और बृहस्पति आदि विप्रों तथा इन्द्र आदि देवताओंद्वारा अपना माङ्गलिक संस्कार कराकर उसे पाला-पोसा। | | ततो देवैश्च मुनिभिः प्रोक्ता देवी त्विदं वचः।<br>भवानि भवती भव्या सम्भूता लोकभूतये॥ ५०८ | यह देखकर देवताओं और मुनियोंने पार्वतीदेवीसे यह बात कही—'भवानि! आप तो परम सुन्दर रूपवाली हो और लोकके कल्याणके लिये प्रकट हुई हो। | | प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते।<br>अपुत्रा च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते दैवहेतुतः॥ ५०९ | प्रायः संसार पुत्ररूप फलका ही प्रेमी है और वह फल पुत्र-पौत्रोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जगत्में जो प्रजाएँ पुत्रहीन हैं, वे प्रायः प्रारब्धके कारण ही वैसा दीख पड़ती हैं। |

  • अध्याय १५४ * ६४३
अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि।<br>फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः।<br>इत्युक्ता हर्षपूर्णाङ्गी प्रोवाचोमा शुभां गिरम्॥ ५१०<br><br>देव्युवाच<br><br>एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद् बुधः।<br>बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत् संवत्सरं दिवि॥ ५११<br><br>दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।<br>दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।<br>एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी॥ ५१२<br><br>इत्युक्तास्तु ततो विप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>जग्मुः स्वमन्दिराण्येव भवानीं वन्द्य सादरम्॥ ५१३<br><br>गतेषु तेषु देवोऽपि शङ्करः पर्वतात्मजाम्।<br>पाणिनाऽऽलम्ब्य वामेन शनैः प्रावेशयच्छुभाम्॥ ५१४<br><br>चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम्।<br>लम्बमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम्॥ ५१५<br><br>निर्धौतकलधौतं च क्रीडागृहमनोरमम्।<br>प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम् ॥ ५१६<br><br>किन्नरोद्गीतसङ्गीतगृहान्तरितभित्तिकम् ।<br>सुगन्धिधूपसङ्घातमनःप्रार्थ्यमलक्षितम् ॥५१७<br><br>क्रीडन्मयूरनारीभिर्वृतं वै ततवादिभिः।<br>हंससंघातसङ्घृष्टं स्फाटिकस्तम्भवेदिकम्॥ ५१८<br><br>अनारतमतिप्रीत्या बहुशः किन्नराकुलम्।<br>शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिताः॥५१९<br><br>भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रतिबिम्बितमौक्तिकाः।<br>तत्राक्षक्रीडया देवी विहर्तुमुपचक्रमे॥ ५२०<br><br>स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीडने यत्र धिष्ठितौ।<br>वपुःसहायतां प्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ॥ ५२१<br><br>एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशङ्करयोस्तदा।<br>प्रादुर्भवन्महाशब्दस्तद्गृहोदरगोचरः ॥५२२देवि! इस समय आप शास्त्रद्वारा प्रदर्शित मार्गकी मर्यादा निर्धारित करें। इन कल्पित तरुपुत्रकोंसे क्या लाभ उपलब्ध होगा?' ऐसा कही जानेपर उमाके अङ्ग हर्षसे पूर्ण हो गये, तब वे सुन्दर वाणीमें बोलीं ॥ ४९९—५१० ॥<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—'विप्रवरो! इस प्रकारके जलरहित प्रदेशमें जो बुद्धिमान् पुरुष कुआँ बनवाता है, वह कुएँके जलके एक-एक बूँदके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। इस प्रकार दस कुएँके समान एक बावली, दस बावलीके सदृश एक सरोवर, दस सरोवरकी तुलनामें एक पुत्र और दस पुत्रके समान एक वृक्ष माना गया है। यही लोकोंका कल्याण करनेवाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूँ। इस प्रकार कहे जानेपर बृहस्पति आदि विप्रगण भवानीको आदरपूर्वक नमस्कार कर अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। उन सबके चले जानेपर देवाधिदेव शङ्करने भी सुन्दरी पार्वतीको बायें हाथका सहारा देकर धीरे-धीरे अपने भवनमें प्रवेश कराया। चित्तको प्रसन्न करनेवाला वह भवन फाटकके निकट ही था। उसमें मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं, वेदिकाएँ पुष्पहारोंसे सुसज्जित थीं, तपाये हुए स्वर्णके मनोरम क्रीडागृह बने हुए थे, बिखरे हुए पुष्पोंकी सुगन्धसे उन्मत्त हुए भँवरे गुंजार कर रहे थे, किन्नरोंद्वारा गाये गये संगीतसे गृहकी भीतरी दीवाल प्रतिध्वनित हो रही थी, मनको अच्छी लगनेवाली सुगन्धित धूपोंकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। वह नाचती हुई मयूरियों तथा तारवाले बाजे बजानेवाले वादकोंसे व्याप्त था। वहाँ हंस-समूहोंकी ध्वनि गूँज रही थी, स्फटिकके खम्भोंसे युक्त वेदिकाएँ सुशोभित थीं, अधिकांश किन्नर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर उपस्थित रहते थे। उसमें पद्मराग मणिकी दीवालें बनी हुई थीं, जिनपर मोतियोंकी झलक पड़ रही थी, इस कारण अनारके भ्रमसे शुकसमूह उनपर अपने ठोरोंसे आघात कर रहे थे। ऐसे भवनमें पार्वतीदेवी द्यूतक्रीडाके माध्यमसे विहार करने लगीं। निर्मल इन्द्रनील मणिके बने हुए उस क्रीडा-स्थानपर क्रीडा करते हुए शिव-पार्वती विनोदके रसमें निमग्न हो परस्पर एक-दूसरेके शरीरकी सहायताको प्राप्त हुए॥ ५११—५२१॥<br><br>इस प्रकार वहाँ पार्वती और शंकरके क्रीडा करते समय उस गृहके भीतर महान् भयंकर शब्द प्रादुर्भूत हुआ।

१५६- कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आदि दैत्यका पार्वती-रूपमें शङ्करके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप

६४४ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Translation
तच्छ्रुत्वा कौतुकाद् देवी किमेतदिति शङ्करम्।<br>पप्रच्छ तं शुभतनुर्हरं विस्मयपूर्वकम्॥ ५२३<br>उवाच देवीं नैतत् ते दृष्टपूर्वं सुविस्मिते।<br>एते गणेशाः क्रीडन्ते शैलेऽस्मिन् मत्प्रियाः सदा॥ ५२४<br>तपसा ब्रह्मचर्येण नियमैः क्षेत्रसेवनैः।<br>यैरहं तोषितः पूर्वं त एते मनुजोत्तमाः॥ ५२५<br>मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने।<br>कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः॥ ५२६<br>कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम्।<br>सामरस्यास्य जगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः॥ ५२७<br>ब्रह्मविष्ण्विन्द्रगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः।<br>विवर्जितोऽप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे॥ ५२८<br>हृद्या मे चारुसर्वाङ्गास्त एते क्रीडिता गिरौ।<br>इत्युक्ता तु ततो देवी त्यक्त्वा तद्विस्मयाकुला॥ ५२९<br>गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना।उसे सुनकर सुन्दर शरीरवाली पार्वतीदेवीने कुतूहलवश आश्चर्यपूर्वक भगवान् शंकरसे पूछा—'यह क्या हो रहा है?' तब शिवजीने पार्वतीसे कहा—'सुविस्मिते! तुमने पहले इसे नहीं देखा है। मेरे परम प्रिय ये गणेश्वर इस पर्वतपर सदा क्रीडा करते रहते हैं। शुभानने! जो लोग पहले तपस्या, ब्रह्मचर्य, नियमपालन और तीर्थसेवनद्वारा मुझे संतुष्ट कर चुके हैं, वे ही ये श्रेष्ठ पुरुष मेरे पास प्राप्त हुए हैं। ये मुझे परम प्रिय हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् उत्साहसे सम्पन्न तथा अतिशय सौन्दर्य एवं गुणोंसे युक्त हैं। इन बलशालियोंके कार्योंसे तो मुझे भी परम विस्मय हो जाता है। ये देवताओंसहित इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, गन्धर्व, किंनर और प्रधान-प्रधान नागोंसे नित्य विलग रहनेपर भी मुझे कष्ट नहीं होता, परंतु इनसे वियुक्त होनेपर मुझे कभी आनन्द नहीं प्राप्त होता। इनके सभी अङ्ग अत्यन्त सुन्दर हैं और ये सभी मुझे परम प्रिय हैं। वे ही ये सब इस पर्वतपर क्रीडा कर रहे हैं।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने विस्मयसे व्याकुल हो द्यूतक्रीडा छोड़ दी और वे भौंचक्की-सी हो झरोखेमें बैठकर उनकी ओर देखने लगीं॥ ५२२—५२९ १/२ ॥
यावन्तस्ते कृशा दीर्घा ह्रस्वाः स्थूला महोदराः॥ ५३०<br>व्याघ्रेभवदनाः केचित् केचिन्मेषाजरूपिणः।<br>अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिङ्गलाः॥ ५३१<br>सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः।<br>नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः॥ ५३२<br>कौशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः।<br>गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः॥ ५३३<br>बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानाशस्त्रपाणयः।<br>अनेककुसुमापीडा नानाव्यालविभूषणाः॥ ५३४<br>वृत्ताननायुधधरा नानाकवचभूषणाः।<br>विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः॥ ५३५वे जितने थे, उनमें कुछ दुबले-पतले, लम्बे, छोटे और विशाल पेटवाले थे। किन्हींके मुख व्याघ्र और हाथीके समान थे तो कोई भेड़ और बकरेके-से रूपवाले थे। उनके रूप अनेकों प्राणियोंके सदृश थे। किन्हींके मुखसे ज्वाला निकल रही थी तो कोई काले एवं पीले रंगके थे। किन्हींके मुख सौम्य, किन्हींके भयंकर और किन्हींके मुसकानयुक्त थे। किन्हींके मस्तकपर काले एवं पीले रंगकी जटा बँधी थी। किन्हींके मुख नाना प्रकारके पक्षियोंके-से तथा किन्हींके मुख विभिन्न प्रकारके पशुओं-सदृश थे। किन्हींके शरीरपर रेशमी वस्त्र थे तो कोई वस्त्रके स्थानपर चमड़ा ही लपेटे हुए थे और कुछ नंगे ही थे। कुछ अत्यन्त कुरूप थे। किन्हींके कान गौ-सरीखे थे तो किन्हींके कान हाथी-जैसे थे। किन्हींके बहुत-से मुख, नेत्र और पेट थे तो किन्हींके बहुत-से पैर और भुजाएँ थीं। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र शोभा पा रहे थे। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके पुष्प बँधे हुए थे तो कोई अनेकविध सर्पोंके ही आभूषण धारण किये हुए थे। कोई गोल मुखवाले अस्त्र लिये हुए थे तो कोई विभिन्न प्रकारके कवचोंसे विभूषित थे। कुछ दिव्य रूपधारी थे और विचित्र वाहनोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचर रहे थे।
* अध्याय १५४ *६४५
वीणावाद्यमुखोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः ।<br>गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् ॥ ५३६<br><br>देव्युवाच<br>गणेशाः कति संख्याताः किं नामानः किमात्मकाः ।<br>एकैकशो मम ब्रूहि धिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥ ५३७कुछ मुखसे वीणा आदि बाजे बजा रहे थे और कुछ यत्र-तत्र नाच रहे थे। इस प्रकार उन गणेश्वरोंको देखकर पार्वतीदेवी शंकरजीसे बोलीं ॥ ५३०-५३६ ॥<br><br>देवीने पूछा— 'प्रभो ! इन गणेश्वरोंकी संख्या कितनी है ? इनके क्या-क्या नाम हैं ? इनके स्वभाव कैसे हैं ? ये जो पृथक्-पृथक् बैठे हैं, इनमेंसे मुझे एक-एकका परिचय दीजिये ॥ ५३७ ॥
शङ्कर उवाच<br>कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नानाविख्यातपौरुषाः ।<br>जगदापूरितं सर्वैरेभिर्भीमैर्महाबलैः ॥ ५३८<br>सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु ।<br>दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च ।<br>एते विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः ॥ ५३९<br>ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः ।<br>रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः ॥ ५४०<br>गेयनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः ।<br>न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान् वक्तुं हि शक्यते ॥ ५४१शंकरजी बोले— 'देवि! यों तो ये असंख्य हैं, परंतु प्रधान-प्रधान गणेश्वरोंकी संख्या एक करोड़ है। ये विभिन्न प्रकारके पुरुषार्थोंके लिये विख्यात हैं। इन सभी महाबली भयंकर गणोंसे सारा जगत् परिपूर्ण है। नाना प्रकारके आहार-विहारसे युक्त ये गणेश्वर हर्षपूर्वक सिद्ध क्षेत्रों, गलियों, पुराने उद्यानों, घरों, दानवोंके शरीरों, बालकों और पागलोंमें प्रवेश करते हैं। ये सभी ऊष्मा, फेन, धूम, मधु, रक्त और वायुका पान करनेवाले हैं। जल इनका भोजन है और ये सर्वभक्षी हैं। ये नाच-गानके उपहारसे प्रसन्न होनेवाले और अनेकों प्रकारके वाद्य-शब्दोंके प्रेमी हैं। अनन्त होनेके कारण इनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५३८-५४१ ॥
देव्युवाच<br>मार्गत्वगुत्तरासङ्गः शुद्धाङ्गो मुञ्जमेखली ।<br>वामस्थेन च शिक्येन चपलो रञ्जिताननः ॥ ५४२<br>मृगदंष्ट्रो ह्युत्पलानां स्रग्दामो मधुराकृतिः ।<br>पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः ॥ ५४३<br>असौ गणेश्वरो देवः किं नामा किंनरानुगः ।<br>य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः ॥ ५४४देवीने पूछा— 'स्वामिन् ! जो मृगचर्मका दुपट्टा लपेटे हुए हैं, जिसके सभी अङ्ग शुद्ध हैं; जो मूँजकी मेखला धारण किये हुए हैं, जिसके बायें कंधेपर झोली लटक रही है, जो अत्यन्त चञ्चल और रँगे हुए मुखवाला है, जिसकी दाढ़ सिंहके सदृश है, जो कमल-पुष्पोंकी माला धारण किये हुए, सुन्दर आकृतिसे युक्त और पाषाण-खण्डसे उत्तान रखे हुए काँसेके बाजेपर ताल लगा रहा है तथा जिसके पीछे किन्नर लोग चल रहे हैं और जो अन्य गणोंद्वारा गाये गये गीतोंपर बार-बार कान लगाये हुए हैं, उस गणेश्वर देवका क्या नाम है ? ॥ ५४२-५४४ ॥
शर्व उवाच<br>स एष वीरको देवि सदा मद्धृदयप्रियः ।<br>नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चितः ॥ ५४५शंकरजीने कहा— देवि! यही वह वीरक है, जो सदा मेरे हृदयको प्रिय लगनेवाला है। यह नाना प्रकारके आश्चर्यजनक गुणोंका आश्रय तथा सभी गणेश्वरोंद्वारा पूजित—सम्मानित है ॥ ५४५ ॥
देव्युवाच<br>ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक ।<br>कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम् ॥ ५४६देवीने पूछा— त्रिपुरनाशक भगवन्! मेरे मनमें ऐसा ही पुत्र प्राप्त करनेकी प्रबल उत्कण्ठा है। मैं कब ऐसे आनन्ददायक पुत्रको देखूँगी ? ॥ ५४६ ॥

६४६ * मत्स्यपुराण *

शर्व उवाचशिवजीने कहा—
शर्व उवाच<br>एष एव सुतस्तेऽस्तु नयनानन्दहेतुकः।<br>त्वया मात्रा कृतार्थस्तु वीरकोऽपि सुमध्यमे॥ ५४७<br>इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका।<br>वीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः॥ ५४८<br>सावरुह्य त्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः।<br>विजयोवाच गणपं गणमध्ये प्रवर्तिता॥ ५४९<br>एहि वीरक चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपितः।<br>किमुत्तरं वदत्यर्थे नृत्येरङ्गे तु शैलजा॥ ५५०<br>इत्युक्तस्त्यक्तपाषाणशकलो मार्जिताननः।<br>आहूतस्तु तयोद्भूतमूलप्रस्तावशंसकः॥ ५५१<br>देव्याः समीपमागच्छद् विजयानुगतः शनैः।<br>प्रासादशिखरात्फुल्लरक्ताम्बुजनिभद्युतिः॥ ५५२<br>तं दृष्ट्वा प्रस्रुतानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा।<br>गिरिजोवाच सस्नेहं गिरा मधुरवर्णया॥ ५५३**शिवजीने कहा—**सुमध्यमे! नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला यह वीरक ही तुम्हारा पुत्र हो और वीरक भी तुम-जैसी माताको पाकर कृतार्थ हो जाय। इस प्रकार कही जानेपर पर्वतराजकी कन्या पार्वतीने हर्षसे उत्सुक होकर तुरंत ही वीरकको बुला लानेके लिये विजयाको भेजा। तब विजया शीघ्र ही उस गगनचुम्बी अट्टालिकासे नीचे उतरकर गणोंके मध्यमें पहुँची और गणेश्वर वीरकसे बोली—'वीरक! यहाँ आओ, तुम्हारी चञ्चलतासे भगवान् शंकर क्रुद्ध हो गये हैं। तुम्हारे इस नाच-रंगके विषयमें माता पार्वती भी देखो क्या कहती हैं।' विजयाके ऐसा कहनेपर वीरकने पाषाणखण्डको फेंक दिया और वह अपने मुखको धोकर माताद्वारा बुलाये जानेके मूल कारणके विषयमें सोचता हुआ विजयाके पीछे-पीछे पार्वतीदेवीके निकट आया। खिले हुए लाल कमलपुष्पकी-सी कान्तिवाली पार्वतीने अट्टालिकाके शिखरपरसे जब वीरकको आते हुए देखा तो उनके स्तनोंसे अधिक मात्रामें स्वादिष्ट दूध टपकने लगा। तब गिरिजा स्नेहपूर्वक मधुर वाणीमें वीरकसे बोलीं॥ ५४७–५५३॥
उमोवाच<br>एह्येहि यातोऽसि मे पुत्रतां<br>देवदेवेन दत्तोऽधुना वीरक।<br>इत्येवमङ्के निधायाथ तं पर्यचुम्बत्<br>कपोले शनैः कलवादिनम्॥ ५५४<br>मूर्ध्यापाघ्राय सम्मार्ज्य गात्राणि<br>ते भूषयामास दिव्यैः स्रजैर्भूषणैः।<br>किङ्किणीमेखलानूपुरै-<br>र्माणिक्यकेयूरहारोरुमूलगुणैः ॥ ५५५<br>कोमलैः पल्लवैश्चित्रितैश्चारुभि-<br>र्दिव्यमन्त्रोद्भवैस्तस्य शुभ्रैस्ततो<br>भूरिभिश्चाकरोन्मिश्र-<br>सिद्धार्थकै रङ्गरक्षाविधिम् ॥ ५५६<br>एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं<br>मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभङ्गोञ्ज्वलैः॥ ५५७<br>गच्छ गच्छाधुना क्रीड सार्धं गणै-<br>रप्रमत्तो वस शुभ्रवर्जी शनै-**उमाने कहा—**वीरक! आओ, यहाँ आओ, देवाधिदेवने तुम्हें मुझे प्रदान किया है। अब तुम मेरे पुत्रस्वरूप हो गये हो। ऐसा कहकर माता पार्वती वीरकको अपनी गोदमें बैठाकर उस मधुरभाषी पुत्रके कपोलोंका चुम्बन करने लगीं। उन्होंने उसका मस्तक सूँघकर शरीरके सभी अङ्गोंको नहलाकर स्वच्छ किया। फिर किंकिणी, कटिसूत्र, नूपुर, मणिनिर्मित केयूर, हार और ऊरुमूलगुण (कच्छी) आदि दिव्य आभूषणोंसे उसे स्वयं विभूषित किया। तत्पश्चात् अत्यन्त सुन्दर विचित्र रंगके कोमल पल्लवों, दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित अनेकों माङ्गलिक सूक्तों तथा अनेक धातुओंके चूर्णोंसे मिश्रित सफेद सरसोंसे उसके अङ्गोंकी रक्षाका विधान किया। इस प्रकार उसे गोदमें लेकर मुखपर गोरोचनसे उज्ज्वल पत्रभंगीकी रचना करके उसके मस्तकपर माला डालकर कहा—'बेटा! अब जाओ और अपने साथी गणोंके साथ सावधान होकर खेलो। उनके साथ कपटरहित होकर निवास करो।
  • अध्याय १५४ * । ६४७
संस्कृतहिन्दी
व्यालमालाकुलाः शैलसानुद्रुम-<br>दन्तिभिर्भिन्नसाराः परे सङ्गिनः ॥ ५५८<br>जाह्नवीयं जलं क्षुब्धतोयाकुलं<br>कूलं मा विशेथा बहुव्याघ्रदुष्टे वने।<br>वत्सासंख्येषु दुर्गा गणेश्वेष्वेतस्मिन्<br>वीरके पुत्रभावोपतुष्टान्तःकरणा तिष्ठतु ॥ ५५९<br>स्वस्य पितृजनप्रार्थितं<br>भव्यमायातिभाविन्यसौ भव्यता।तुम्हारे दूसरे साथी व्यालसमूहोंसे व्याकुल और पर्वतशिखर, वृक्ष और गजराजोंसे परास्त हो रहे हैं। गङ्गाका जल अत्यन्त क्षुब्ध हो रहा है, उसने तटको जर्जर कर दिया है, अतः वहाँ तथा बहुत-से दुष्ट व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें मत प्रवेश करना। इन पुत्ररूप असंख्य गणेश्वरोंमें इस वीरकपर दुर्गादेवी सदा पुत्रभावसे संतुष्ट अन्तःकरणवाली बनी रहें। अपने पितृजनोंद्वारा प्रार्थित भावी अवश्य घटित होती है, अतः यह भव्यता तुम्हें भविष्यमें प्राप्त होगी' ॥ ५५८-५५९ १/२ ॥
सोऽपि निर्वर्त्य सर्वान् गणान् सस्मय-<br>माह बालत्वलीलारसाविष्ठधीः ॥ ५६०<br>एष मात्रा स्वयं मे कृतभूषणो-<br>ऽत्र एष पटः पटलैर्बिन्दुभिः।<br>सिन्दुवारस्य पुष्पैरियं मालती-<br>मिश्रिता मालिका मे शिरस्याहिता ॥ ५६१<br>कोऽयमातोद्यधारी गणस्तस्य<br>दास्यामि हस्तादिदं क्रीडनम्।तदनन्तर बालक्रीडाके रसमें निमग्नबुद्धि वीरक भी वहाँसे लौटकर सभी गणोंसे हँसते हुए बोला—'मित्रो! देखो, स्वयं माताने मेरा यह शृङ्गार किया है। उन्होंने ही यह गुलाबी बिंदियोंसे युक्त वस्त्र पहनाया है और मालती-पुष्पोंसे मिली हुई यह सिन्दुवार-पुष्पोंकी माला मेरे सिरपर रखी है। यह आतोद्य नामक बाजा धारण करनेवाला कौन गण है? मैं उसे अपने हाथसे वह खिलौना दूँगा।' उधर
दक्षिणात्पश्चिमं पश्चिमादुत्तर-<br>मुत्तरात्पूर्वमभ्येत्य सख्या युता प्रेक्षती ॥ ५६२<br>तं गवाक्षान्तराद्वीरकं शैलपुत्री बहिः<br>क्रीडनं यज्जगन्मातुरप्येष चित्तभ्रमः।<br>पुत्रलुब्धो जनस्तत्र को मोहमायाति<br>न स्वल्पचेता जडो मांसविण्मूत्रसङ्घातदेहः॥ ५६३सखीके साथ पार्वती कभी दक्षिणसे पश्चिम, कभी पश्चिमसे उत्तर और कभी उत्तरसे पूर्वकी ओर घूम-घूमकर गवाक्ष मार्गसे बाहर खेलते हुए वीरककी ओर निहार रही थीं। जब जगन्माता पार्वतीके चित्तमें (पुत्रको खेलते हुए देखकर) इस प्रकार व्यामोह उत्पन्न हो जाता है, तब भला स्वल्पबुद्धि, मूर्ख, मांस, विष्ठा और मूत्रकी राशिसे भरे हुए शरीरको धारण करनेवाला ऐसा कौन पुत्रप्रेमी जन होगा जिसे मोह न प्राप्त हो।
द्रष्टुमभ्यन्तरं नाकवासेश्वरै-<br>रिन्दुमौलिं प्रविष्टेषु कक्षान्तरम्।<br>वाहनात्यावरोहा गणास्तैर्युतो लोक-<br>पालास्त्रमूर्तों ह्ययं खड्गो विक्षड्गकरः ॥ ५६४<br>निर्ममः कृतान्तः कस्य केनाहतो ब्रूत<br>मौनेभवन्तोऽस्त्रदण्डेन किं दुःस्पृहाः।<br>भीममूर्त्त्याननेनास्ति कृत्यं गिरौ<br>य एषोऽस्त्रज्ञेन किं वध्यते ॥ ५६५इसी बीच देवगण भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करनेके लिये कक्षके भीतर प्रविष्ट हुए और प्रमथगण अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो गये। उनसे घिरे हुए वीरकने लोकपाल यमके अस्त्र खड्गको म्यानसे खींचकर कहा—'तुमलोग बतलाओ, निर्दय कृतान्त किस कारण किसका वध करना चाहता है? तुमलोग मौन क्यों हो? अस्त्रदण्डसे क्या अलभ्य है? भयंकर आकृतिवाले मेरे वर्तमान रहते इस पर्वतपर ऐसा कौन-सा कार्य है जो अस्त्रद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ५६०-५६५ १/२ ॥
मा वृथा लोकपालानुगचित्तता<br>एवमेवैतदित्युचुरस्मै तदा देवताः।<br>देवदेवानुगं वीरकं लक्षणा प्राह<br>देवी वनं पर्वता निर्झराण्यग्निदेव्यान्यथो ॥ ५६६वीरकके इस प्रकार कहनेपर देवताओंने उनसे कहा—'वीरक! तुम्हें इस प्रकार लोकपालोंके चित्तका अनुगमन नहीं करना चाहिये।' फिर लक्षणादेवी देवाधिदेव महादेवके अनुचर वीरकसे बोलीं—'तुमलोग प्राणियोंकी

वीरकद्वारा रोका जाना

६४८ * मत्स्यपुराण *


| भूतपा निर्झराम्भोनिपातेषु निमज्जत<br>पुष्पजालावनद्धेषु धामस्वपि शेत प्रोत्तुङ्ग।<br>नानाद्रिकुञ्जेष्वनुगर्जन्तु हेमा-<br>रुतास्फोटसंक्षेपणात्कामतः ॥ ५६७<br>काञ्चनोत्तुङ्गशृङ्गावरोहक्षितौ हेमरेणू-<br>त्करासङ्गद्युतिं खेचराणां वनाधायिनि।<br>रम्ये बहुरूपसम्पत्प्रकारे गणान्वासितं<br>मन्दरकन्दरे सुन्दरमन्दारपुष्पप्रवालाम्बुजे ॥ ५६८<br>सिद्धनारीभिरापीतरूपामृतं विस्तृतै-<br>र्नेत्रपात्रैरनुन्मेषिभिर्वीरकं ।<br>शैलपुत्री निमेषान्तरादस्मर-<br>त्पुत्रगृध्नी विनोदार्थिनी ॥ ५६९<br>सोऽपि तादृक्क्षणावाप्तपुण्योदयो<br>योऽपि जन्मान्तरस्यात्मजत्वं गतः<br>क्रीडतस्तस्य तृप्तिः कथं जायते<br>योऽपि भाविजगद्वेधसा तेजसः कल्पितः<br>प्रतिक्षणं दिव्यगीतक्षणो<br>नृत्यलोलो गणैशैः प्रणतः ॥ ५७०<br>क्षणं सिंहनादाकुले गण्डशैले<br>सृजद्रत्नजाले बृहत्सालताले।<br>क्षणं फुल्लनानातमालालिकाले<br>क्षणं वृक्षमूले विलोलो मराले ॥ ५७१<br>क्षणे स्वल्पपङ्के जले पङ्कजाढ्ये<br>क्षणं मातुरङ्के शुभे निष्कलङ्के।<br>परिक्रीडते बाललीलाविहारी<br>गणेशाधिपो देवतानन्दकारी<br>निकुञ्जेषु विद्याधरैर्गीतशीलः<br>पिनाकीव लीलाविलासैः सलीलः ॥ ५७२ | रक्षा करते हुए वन, पर्वत, निर्झर और अग्नियुक्त स्थानोंपर विचरण करते हुए झरनोंके जलप्रवाहमें मज्जन करो, पुष्पोंसे सुसज्जित भवनोंमें शयन करो और ऊँचे-ऊँचे विभिन्न पर्वतोंके कुँओंमें स्वेच्छानुसार झंझावातके अव्यक्त शब्दका अनुकरण करते हुए गर्जना करो। विनोदकी अभिलाषावाली पुत्रप्रेमी पार्वती ऊँचे स्वर्णमय शिखरोंकी ढालू भूमिसे युक्त, आकाशचारियोंकी रमणीय वनस्थलीरूप, अनेकों प्रकारकी सम्पत्तियोंसे परिपूर्ण तथा सुन्दर मन्दारपुष्प, प्रवाल और कमल-पुष्पोंसे सुशोभित मन्दराचलके खोहोंमें खेलते वीरकको जिसकी अङ्गकान्ति सुवर्णकी रेणु-सरीखी थी, सिद्धोंकी स्त्रियाँ जिसके रूपामृतका पान कर रही थीं और जो गणोंके साथ विराजमान था, क्षण-क्षणपर निमेषरहित विस्फारित नेत्रोंसे देखती हुई स्मरण करती रहती थीं। वीरकका भी उस समय जन्मान्तरका पुण्य उदय हो गया था, जिससे वह पार्वतीका पुत्र हो गया। ऐसी दशामें उसे खेलसे तृप्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? वह जगत्कर्ता ब्रह्माद्वारा तेजके भावी अंशसे कल्पित किया गया था। वह प्रतिक्षण दिव्य गीतोंको सुनता था और स्वयं भी चञ्चलतापूर्वक नृत्य करता था। गणेश्वर उसके सामने नतमस्तक रहते थे। वह चञ्चलतापूर्वक किसी क्षण सिंहनादसे व्याप्त, रत्नसमूहोंकी खानवाले तथा बड़े-बड़े साल और ताड़के वृक्षोंसे सुशोभित पर्वत-शिखरपर, किसी क्षण खिले हुए बहुत-से तमाल वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण काले दीखनेवाले वनोंमें, किसी क्षण राजहंसपर चढ़कर, किसी क्षण कमलसे भरे हुए थोड़े कीचड़ और जलवाले सरोवरमें तथा किसी क्षण माताकी निष्कलंक सुन्दर गोदमें बैठकर क्रीडा करता था। इस प्रकार देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला एवं गणेश्वरोंका भी अधिपति वह बाललीलाबिहारी वीरक निकुञ्जोंमें विद्याधरोंके साथ गान करता और शंकरजीकी तरह लीलाविलाससे युक्त हो क्रीडा करता था॥ ५६६–५७२॥ | | प्रकाशय भुवनाभोगी ततो दिनकरे गते।<br>देशान्तरं तदा पश्चाद् दूरमस्तावनीधरम् ॥ ५७३ | तदनन्तर भगवान् सूर्य सारे भुवनोंको प्रकाशित करनेके पश्चात् सायंकाल अस्ताचलकी ओर प्रस्थित हुए। | | उदयास्ते पुरो भावी यो हि चास्तेऽवनीधरः।<br>मित्रत्वमस्य सुदृढं हृदये परिचिन्त्यताम् ॥ ५७४ | उदयाचल और अस्ताचल—ये दोनों पर्वत पूर्वकालकी निश्चित योजनाके अनुसार स्थित हैं। इनमें सूर्यकी अस्ताचलके साथ सुदृढ़ मित्रता है—ऐसा विचारकर |

* अध्याय १५४ *६४९

| नित्यमाराधितः श्रीमान् पृथुमूलः समुन्नतः ।<br>नाकरोत् सेवितुं मेरुरुपहारं पतिष्यतः ॥ ५७५<br><br>जलेऽप्येषा व्यवस्थेति संशयेताखिलं बुधः ।<br>दिनान्तानुगतो भानुः स्वजनत्वमपूरयत् ॥ ५७६<br><br>संध्याबद्धाञ्जलिपुटा मुनयोऽभिमुखा रविम् ।<br>याचन्त्यागमनं शीघ्रं निवार्यात्मनि भाविताम् ॥ ५७७<br><br>व्यजृम्भदथ लोकेऽस्मिन् क्रमाद् वैभावरं तमः ।<br>कुटिलस्येव हृदये कालुष्यं दूषयन्मनः ॥ ५७८ | नित्य सूर्यद्वारा आराधित, शोभाशाली, स्थूल मूल भागवाले एवं समुन्नत मेरुने गिरते हुए सूर्यकी सेवा करनेके लिये कोई उपहार नहीं समर्पित किया। जलमें भी यही व्यवस्था है—इन सभी विषयोंपर बुद्धिमान् पुरुष संशय करेंगे। दिनके अवसानका अनुगमन करनेवाले सूर्यने अपनत्वकी पूर्ति की। संध्याके समय हाथ जोड़े हुए मुनिगण सूर्यके सम्मुख उपस्थित हो आत्मामें उत्पन्न हुई (बिछोहकी) भावनाको रोककर पुनः शीघ्र ही आगमनकी याचना कर रहे हैं। इस प्रकार सूर्यके अस्त हो जानेपर सारे जगत्‌में रात्रिका अन्धकार क्रमशः उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे कुटिल मनुष्यके हृदयमें पाप मनको दूषित करते हुए फैल जाता है॥ ५७५—५७८ ॥ | | ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्द्योतितभित्तिके ।<br>शयनं शशिसङ्घातशुभवस्त्रोत्तरच्छदम् ॥ ५७९<br><br>नानारत्नद्युतिलसच्चक्रचापविडम्बकम् ।<br>रत्नकिङ्किणिकाजालं लम्बमुक्ताकलापकम् ॥ ५८०<br><br>कमनीयचलल्लोलवितानाच्छादिताम्बरम् ।<br>मन्दिरे मन्दसञ्चारः शनैर्गिरिसुतायुतः ॥ ५८१<br><br>तस्थौ गिरिसुताबाहुलतामीलितकन्धरः ।<br>शशिमौलिसितज्योत्स्नाशुचिपूरितगोचरः ॥ ५८२<br><br>गिरिजाप्यसितापाङ्गी नीलोत्पलदलच्छविः ।<br>विभावर्या च सम्पृक्ता बभूवातितमोमयी ।<br>तामुवाच ततो देवः क्रीडाकेलिकलायुतम् ॥ ५८३ | तत्पश्चात् जिसकी दीवालें प्रभापूर्ण सर्पोंकी मणिरूपी दीपकोंसे उद्भासित हो रही थीं, ऐसे भवनमें शय्या बिछी थी, जिसपर चाँदनीकी राशि-जैसी उज्ज्वल चादर बिछी थी, नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्तिसे सुशोभित होनेके कारण वह इन्द्रधनुषकी विडम्बना कर रही थी, उसमें रत्ननिर्मित क्षुद्रघण्टिकाएँ तथा मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं और उसका ऊपरी भाग हिलते हुए कमनीय वितानसे आच्छादित था, ऐसी शय्यापर मन्दगतिसे चलते हुए भगवान् शंकर पार्वतीके साथ विराजमान हुए। उस समय उनका कंधा पार्वतीकी भुजलतासे संयुक्त था। चन्द्रभूषणकी उज्ज्वल एवं निर्मल प्रभा सर्वत्र फैल रही थी। कजरारे नेत्रोंवाली गिरिजाकी भी छवि नीले कमल-दलके समान थी। रात्रिसे संयुक्त होनेके कारण वे विशेषरूपसे तमोमयी दीख रही थीं। उस समय भगवान् शंकर पार्वतीसे क्रीडाकेलिकी कलासे युक्त वचन बोले ॥ ५७९—५८३ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भवमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥

१५८- वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शङ्करका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति

६५०* मत्स्यपुराण *

एक सौ पचपनवाँ अध्याय

भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शर्व उवाच<br>शरीरे मम तन्वङ्गि सिते भास्यसितद्युतिः।<br>भुजङ्गीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ ॥ १<br>चन्द्रातपेन सम्पृक्ता रुचिराम्बरया तथा।<br>रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे ॥ २<br>इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटीकुटिलानना ॥ ३शिवजीने (विवाहके बाद एक बार पार्वतीसे) कहा—कृशाङ्गी पार्वति! कृष्ण कान्तिसे युक्त तुम मेरे श्वेत शरीरमें लिपटनेपर चन्दन-वृक्षमें लिपटी हुई सीधी काली नागिन-जैसी दीखती हो। तुम कृष्णपक्षमें चाँदनीके पीछे काले आकाश तथा अँधेरी रात्रिकी तरह मेरी दृष्टिको दूषित कर रही हो। भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उनके गलेसे अलग हो गयीं। क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये। तब वे मुख और भौंहोंको टेढ़ी करके बोलीं॥ १—३॥
देव्युवाच<br>स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते।<br>अवश्यमर्थी प्राप्नोति खण्डनं शशिमण्डन ॥ ४<br>तपोभिर्दीर्घचरितैर्यच्च प्रार्थितवत्यहम्।<br>तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमानः पदे पदे ॥ ५<br>नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा नैव धूर्जटे।<br>सविषस्त्वं गतः ख्यातिं व्यक्तं दोषाकराश्रयः ॥ ६<br>नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भगस्य हि।<br>आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ॥ ७<br>मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामर्धिक्षिपन्।<br>यत्त्वं मामाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः ॥ ८<br>यास्याम्यहं परित्यक्त्वा चात्मानं तपसा गिरिम।<br>जीवन्त्या नास्ति मे कृत्यं धूर्तेन परिभूतया ॥ ९<br>निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं भवः।<br>उवाचाधिकसम्भ्रान्तिप्रणयोन्मिश्रया गिरा ॥ १०देवीने कहा—चन्द्रभूषण! सभी लोग अपने द्वारा की गयी मूर्खताका दुष्परिणाम भोगते हैं। स्वार्थी मनुष्य जनसमाजमें अवश्य ही अपमानित होता है। दीर्घकालिक तपस्याद्वारा मैंने जिस मनोरथकी प्रार्थना की थी, उसीके परिणामस्वरूप मुझे यह पग-पगपर तिरस्कार प्राप्त हो रहा है। जटाधारी शंकर! (आपके कथनानुसार) न तो मैं कुटिल हूँ और न विषम ही हूँ, अपितु आप स्वयं स्पष्टरूपसे विषयुक्त अर्थात् विषयी और दोषोंके समूह (अथवा चन्द्रमा)-के आश्रयरूपसे प्रसिद्ध हैं। मैं पूषाके दाँत और भगके नेत्र भी नहीं हूँ। बारह भागोंमें विभक्त भगवान् सूर्य मुझे भलीभाँति जानते हैं। अपने दोषोंद्वारा मुझपर आक्षेप करते हुए आप मेरे सिरमें पीड़ा उत्पन्न कर रहे हैं। आपने मुझे जो 'कृष्णा' नामसे सम्बोधित किया है सो आप भी तो 'महाकाल' नामसे विख्यात हैं। अतः अब मैं जीवनका मोह त्यागकर तपस्या करनेके लिये पर्वतपर जाऊँगी; क्योंकि आप-जैसे धूर्तसे अपमानित होकर जीवित रहनेसे मैं अपना कोई प्रयोजन नहीं समझ रही हूँ। तब पार्वतीके इस प्रकार क्रोधके कारण तीखे अक्षरोंसे युक्त वचनको सुनकर भगवान् शंकर अतिशय प्रेमसे सनी हुई वाणीमें इस प्रकार बोले॥ ४—१०॥
शर्व उवाच<br>अगात्मजासि गिरिजे नाहं निन्दापरस्तव।<br>त्वद्भक्तिबुद्ध्या कृतवांस्तवाहं नामसंश्रयम् ॥ ११शंकरजीने कहा—गिरिजे! तुम पर्वतकी पुत्री हो, अतः मैं तुम्हारी निन्दा करनेपर उतारू नहीं हूँ। यह तो मैंने तुम्हारे ऊपर भक्तिपूर्ण बुद्धिसे तुम्हारे नामका कारण बतलाया है।
* अध्याय १५५ *६५१

| विकल्पः स्वस्थचित्तेऽपि गिरिजे नैव कल्पना।<br>यद्येवं कुपिता भीरु त्वं तवाहं न वै पुनः॥ १२<br>नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते।<br>शिरसा प्रणतश्चाहं रचितस्ते मयाञ्जलिः॥ १३<br>स्नेहेनावमानेन निन्दितेनैति विक्रियाम्।<br>तस्मान्न जातु रुष्टस्य नर्मस्पृष्टो जनः किल॥ १४<br>अनेकैशचाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता।<br>कोपं तीव्रं न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता॥ १५<br>अवष्टब्धमथास्फाल्य वासः शङ्करपाणिना।<br>विपर्यस्तालका वेगाद्यातुमैच्छत शैलजा॥ १६<br>तस्या व्रजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः।<br>सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः॥ १७<br>हिमाचलस्य शृङ्गैस्तैर्मेघजालाकुलैर्नभः।<br>तथा दुरवगाह्योभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः॥ १८<br>काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं वनेभ्यो बहुधा गता।<br>कुटिलत्वं च वर्त्मभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि।<br>संक्रान्ति सर्वमेवैतत् तन्वङ्गि हिमभूधरात्॥ १९<br>इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलजा तदा।<br>कम्पकम्पितमूर्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा॥ २०<br>उमोवाच<br>मा सर्वान् दोषदानेन निन्दान्यान् गुणिनो जनान्।<br>तवापि दुष्टसम्पर्कात्संक्रांतं सर्वमेव हि॥ २१<br>व्यालेभ्योऽधिकजिह्मात्वं भस्मना स्नेहबन्धनम्।<br>हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्बोधित्वं वृषादपि॥ २२<br>तथा बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते।<br>श्मशानवासात्रिर्भीस्त्वं नग्नत्वान्न तव त्रपा॥ २३<br>निर्घृणत्वं कपालित्वाद् दया ते विगता चिरम्।<br>इत्युक्त्वा मन्दिरात् तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा॥ २४<br>तस्यां व्रजन्त्यां देवेशगणैः किलकिलो ध्वनिः।<br>क्व मातर्गच्छसि त्यक्त्वा रुदन्तो धाविताः पुनः॥ २५ | गिरिजे! मेरे स्वस्थ चित्तमें भी तुम्हें विकल्पकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। भीरु! यदि तुम इस प्रकार कुपित हो गयी हो तो अब मैं पुनः तुम्हारे साथ परिहासकी बात नहीं करूँगा। शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़ दो। देखो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाये हूँ। जो प्रेमयुक्त अवमानना तथा व्याजनिन्दासे क्रुद्ध हो जाता है, उस व्यक्तिके साथ कभी भी परिहासकी बात नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार महादेवजीने अनेकों चाटुकारिताभरी बातोंसे पार्वतीको समझाया, परंतु सतीका वह उत्कट क्रोध शान्त नहीं हुआ; क्योंकि उस व्यङ्गसे उनका मर्मस्थल विद्ध हो गया था। तत्पश्चात् पार्वती शंकरजीके हाथसे पकड़े हुए अपने वस्त्रको छुड़ाकर बाल बिखेरे हुए वेगपूर्वक वहाँसे चली जानेकी चेष्टा करने लगीं। क्रोधावेशसे जानेके लिये उद्यत हुई पार्वतीसे त्रिपुरारिने पुनः कहा—‘तुम सचमुच ही सभी अवयवोंद्वारा अपने पिताके सदृश उनकी कन्या हो। जैसे हिमाचलके मेघसमूहसे व्याप्त ऊँचे शिखरोंके कारण आकाश दुर्गम्य हो जाता है, उसी तरह तुम्हारा हृदय भी दुःखगाह्य हृदयोंसे भी अत्यन्त कठोर है। तुम्हारे सभी चिह्न बहुधा वनोंकी अपेक्षा कठिनतासे परिपूर्ण हैं। तुम्हारी चालमें पहाड़ी मार्गोंसे भी बढ़कर कुटिलता है। तुम्हारा सेवन बर्फसे भी अधिक कठिन है। सूक्ष्माङ्गी पार्वती! ये सभी गुण तुम्हारे शरीरमें हिमाचलसे ही संक्रमित हुए हैं। शिवजीद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतीका मस्तक क्रोधके कारण काँपने लगा और होंठ फड़कने लगे। तब वे पुनः शंकरजीसे बोलीं॥११—२०॥<br>उमाने कहा— भगवन्! आप अन्यान्य सभी गुणीजनोंमें दोष लगाकर उनकी निन्दा मत करें; क्योंकि आपमें भी तो सभी गुण दुष्टोंके संसर्गसे ही प्रविष्ट हुए हैं। आपमें सर्पोंके सम्पर्कसे अधिक टेढ़ापन, भस्मसे प्रेमहीनता, चन्द्रमासे हृदयकी कालिमा और वृषसे दुर्बोधता भर गयी है। आपके विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? वह तो केवल वचनका परिश्रम ही होगा। आप श्मशानमें निवास करनेके कारण निर्भीक हो गये हैं। नग्न रहनेके कारण आपमें लज्जा रह नहीं गयी है। कपाली होनेके कारण आप निर्मम हो गये हैं और आपकी दया तो चिरकालसे नष्ट हो गयी है। ऐसा कहकर पार्वती उस भवनसे बाहर निकल गयीं। उनको इस प्रकार जाती देखकर देवेशके गण (प्रमथ) किलकारी मारकर रोते हुए उनके पीछे दौड़े और कहने लगे—‘माँ! हमलोगोंको |

६५२* मत्स्यपुराण *

| विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदम्।<br>प्रोवाच मातः किंन्वेतत्क्व यासि कुपितान्तरा॥ २६<br><br>अहं त्वामनुयास्यामि व्रजन्तीं स्नेहवर्जिताम्।<br>नो चेत् पतिष्ये शिखरात् तपोनिष्ठे त्वयोज्झितः॥ २७<br><br>उन्नाम्य वदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना।<br>उवाच वीरकं माता शोकं पुत्रक मा कृथाः॥ २८<br><br>शैलाग्रात् पतितुं नैव न चागन्तुं मया सह।<br>युक्तं ते पुत्र वक्ष्यामि येन कार्येण तच्छृणु॥ २९<br><br>कृष्णेत्युक्त्वा हरेणाहं निन्दिता चाप्यनिन्दिता।<br>साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्॥ ३०<br><br>एष स्त्रीलम्पटो देवो यातायां मय्यनन्तरम्।<br>द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा॥ ३१<br><br>यथा न काचित् प्रविशेद्योषिदत्र हरान्तिकम्।<br>दृष्ट्वा परां स्त्रियं चात्र वदेथा मम पुत्रक॥ ३२<br><br>शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनन्तरम्।<br>एवमस्त्विति देवीं स वीरकः प्राह साम्प्रतम्॥ ३३<br><br>मातुराज्ञामृताह्लादप्लाविताङ्गो गतज्वरः।<br>जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य च मातरम्॥ ३४ | छोड़कर आप कहाँ जा रही हैं?' तत्पश्चात् वीरक देवीके दोनों चरणोंको पकड़कर बाष्पगद्गद वाणीमें बोला—'माँ! यह क्या हो गया ? आप क्रुद्ध होकर कहाँ जा रही हैं? तपोनिष्ठे! इस प्रकार स्नेह छोड़कर जाती हुई आपके पीछे मैं भी चलूँगा, अन्यथा आपके त्याग देनेपर मैं पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण दे दूँगा ॥ २१–२७॥<br><br>तदनन्तर माता पार्वती अपने दाहिने हाथसे वीरकके मुखको ऊपर उठाकर बोलीं—'बेटा! शोक मत करो। तुम्हारा पर्वतशिखरसे कूदना या मेरे साथ चलना उचित नहीं है। पुत्र! मैं जिस कार्यसे जा रही हूँ, वह तुम्हें बतला रही हूँ, सुनो। मेरे अनिन्द्य होनेपर भी शंकरजीने मुझे 'कृष्णा' कहकर मेरी निन्दा की है। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे गौर वर्णकी प्राप्ति कर सकूँ। मेरे चले जानेके बाद ये महादेव स्त्रीलम्पट न हो जायें, इसके लिये तुम्हें सभी छिद्रोंपर दृष्टि रखते हुए नित्य द्वारकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे यहाँ कोई स्त्री शंकरजीके निकट प्रवेश न करने पावे। बेटा! यहाँ किसी परायी स्त्रीको देखकर मुझे तुरंत सूचित करना। फिर उसके बाद जैसा उचित होगा, मैं शीघ्र ही उपाय कर लूँगी।' इसपर वीरकने देवीसे कहा—'माँ! ऐसा ही होगा।' इस प्रकार माताकी आज्ञारूपी अमृतके आह्लादसे आप्लावित अङ्गोंवाला वीरक शोकरहित हो माताके चरणोंमें प्रणाम कर अन्तःपुरकी रखवाली करनेके लिये चला गया॥ २८–३४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे देव्यास्तपोऽनुगमनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें देवीका तपके लिये अनुगमन नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५५॥


एक सौ छप्पनवाँ अध्याय

कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आडि दैत्यका पार्वतीरूपमें शंकरके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप

| सूत उवाच<br><br>देवीं सापश्यदायान्तीं सखीं मातृर्विभूषिताम्।<br>कुसुमामोदिनीं नाम तस्य शैलस्य देवताम्॥ १<br><br>सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा।<br>क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चैरालिङ्ग्योवाच देवता॥ २ | सूतजी कहते हैं—'ऋषियो! आगे बढ़नेपर पार्वतीनै शृङ्गारसे विभूषित कुसुमामोदिनी (देवी)-को आते देखा, जो पार्वतीकी माता मेनाकी सखी और पर्वतराजकी प्रधान देवता थीं। उधर पार्वतीको देखकर कुसुमामोदिनीका भी मन स्नेहसे व्याकुल हो उठा। तब उन देवताने पार्वतीका आलिङ्गन कर उच्चस्वरसे पूछा—'बेटी! कहाँ जा रही |

* अध्याय १५६ *६५३
सा चास्यै सर्वमाचख्यौ शंकरात्कोपकारणम्।<br>पुनश्चोवाच गिरिजा देवतां मातृसम्मताम्॥ ३<br><br>उमोवाच<br><br>नित्यं शैलाधिराजस्य देवता त्वमनिन्दिते।<br>सर्वतः संनिधानं ते मम चातीव वत्सला॥ ४<br><br>अतस्तु ते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं तदा धिया।<br>अन्यस्त्रीसम्प्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ ५<br><br>रहस्यत्र प्रयत्नेन चेतसा सततं गिरौ।<br>पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे॥ ६<br><br>ततोऽहं संविधास्यामि यत्कृत्यं तदनन्तरम्।<br>इत्युक्ता सा तथेत्युक्त्वा जगाम स्वगिरिं शुभम्॥ ७<br><br>उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रिसुता द्रुतम्।<br>अन्तरिक्षं समाविश्य मेघमालामिव प्रभा॥ ८<br><br>ततो विभूषणान्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी।<br>ग्रीष्मे पञ्चाग्निसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता॥ ९<br><br>वन्याहारा निराहारा शुष्का स्थण्डिलशायिनी।<br>एवं साधयती तत्र तपसा संव्यवस्थिता॥ १०हो?'' तत्पश्चात् गिरिजाने उन देवीसे शंकरजीके प्रति उत्पन्न हुए अपने क्रोधके सारे कारणोंका वर्णन किया और फिर मातृ-तुल्य हितैषिणी देवतासे इस प्रकार कहा॥ १—३॥<br><br>उमा बोलीं—'अनिन्दिते! आप मेरे पिता पर्वतराज हिमाचलकी देवता हैं, अतः आपका यहाँ नित्य निवास है। साथ ही मुझपर भी आपका अत्यन्त स्नेह है, इसलिये इस समय जो कार्य करना है उसे मैं आपके ध्यानमें ला रही हूँ। आपको इस पर्वतपर सावधान चित्तसे निरन्तर प्रयत्नपूर्वक ऐसी देखभाल करनी चाहिये कि यहाँ शिवजीके पास एकान्तमें कोई अन्य स्त्री प्रवेश न करने पाये। अनघे! यदि कोई स्त्री शंकरजीके पास प्रवेश करती है तो आपको मुझे तुरंत उसकी सूचना देनी चाहिये। उसके बाद जो कुछ करना होगा, उसका विधान मैं कर लूँगी। ऐसा कहे जानेपर वे 'तथेति'—ऐसा ही करूँगी' यों कहकर अपने मङ्गलमय पर्वतकी ओर चली गयीं। इधर गिरिराजकुमारी उमा भी तुरंत ही मेघसमूहमें चमकती हुई बिजलीकी तरह आकाशमार्गसे अपने पिताके उद्यानमें जा पहुँची। वहाँ उन्होंने आभूषणोंका परित्याग कर वृक्षोंका वल्कल धारण कर लिया। वे ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तपती थीं, वर्षा-ऋतुमें जलमें निवास करती थीं और जाड़ेमें शुष्क बंजरभूमिपर शयन करती थीं। वनके फल-मूल ही उनके आहार थे तथा वे कभी-कभी निराहार ही रह जाती थीं। इस प्रकार साधना करती हुई वे वहाँ तपस्यामें संलग्न हो गयीं॥ ४—१०॥
ज्ञात्वा तु तां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रान्तरे बली।<br>अन्धकस्य सुतो दृप्तः पितुर्वधमनुस्मरन्॥ ११<br><br>देवान् सर्वान् विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः।<br>आडिर्नामान्तरप्रेक्षी सततं चन्द्रमौलिनः॥ १२<br><br>आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः।<br>स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम्॥ १३<br><br>विचिन्त्यासीद्वरं दत्तं स पुरा पद्मजन्मना।<br>हते तदान्धके दैत्ये गिरिशेनामरद्विषि॥ १४<br><br>आडिश्चकार विपुलं तपः परमदारुणम्।<br>तमागत्याब्रवीद् ब्रह्मा तपसा परितोषितः॥ १५<br><br>किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि।<br>ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्यृत्वमहं वृणे॥ १६इसी बीच अन्धकासुरका पुत्र एवं बकासुरका भ्राता आडि नामक दैत्य जो बलवान्, घमंडी, रणमें दुःसह, देवताओंका शत्रु और निरन्तर शंकरजीके छिद्रान्वेषणमें निरत रहनेवाला था, पार्वतीको तपस्यामें संलग्न जानकर अपने पिताके वधका अनुस्मरण करते हुए युद्धस्थलमें सभी देवताओंको पराजित कर त्रिपुरहन्ता शंकरजीके नगरमें आ धमका। वहाँ आकर उसने वीरकको द्वारपर स्थित देखा। तब वह पूर्वकालमें ब्रह्माद्वारा दिये गये अपने वरदानके विषयमें सोच-विचार करने लगा। शंकरजीद्वारा देवद्रोही अन्धक दैत्यके मारे जानेपर आडिने बहुत दिनोंतक परम कठोर तप किया था। तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माने उसके निकट आकर कहा था—'दानवश्रेष्ठ आडि! तुम तपस्याद्वारा क्या प्राप्त करना चाहते हो?' तब उस दैत्यने ब्रह्मासे कहा था—'प्रभो! मैं अमरताका वरदान चाहता हूँ'॥ ११—१६॥

१५९- स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति

६५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत मूल (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
ब्रह्मोवाच<br>न कश्चिच्च विना मृत्युं नरो दानव विद्यते।<br>यतस्ततोऽपि दैत्येन्द्र मृत्युः प्राप्यः शरीरिणा ॥ १७<br>इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचाम्बुजसम्भवम्।<br>रूपस्य परिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसम्भव ॥ १८<br>तदा मृत्युर्मम भवेद्न्यथा त्वमरो ह्यहम्।<br>इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसम्भवः ॥ १९<br>यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति।<br>तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति ॥ २०<br>इत्युक्तोऽमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः।<br>तस्मिन् काले तु संस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः ॥ २१<br>परिहर्त्तुं दृष्टिपथं वीरकस्याभवत्तदा।<br>भुजङ्गरूपी रन्ध्रेण प्रविवेश दृशः पथम् ॥ २२<br>परिहृत्य गणेशस्य दानवोऽसौ सुदुर्जयः।<br>अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टोऽथ पुरान्तकम् ॥ २३<br>भुजङ्गरूपं संत्यज्य बभूवाथ महासुरः।<br>उमारूपी च्छलयितुं गिरिशं मूढचेतनः ॥ २४<br>कृत्वा मायां ततो रूपमप्रतर्क्यमनोहरम्।<br>सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वाभिज्ञानसंवृतम् ॥ २५<br>कृत्वा मुखान्तरे दन्तान् दैत्यो वज्रोपमान् दृढान्।<br>तीक्ष्णाग्रान् बुद्धिमोहेन गिरिशं हन्तुमुद्यतः ॥ २६तब ब्रह्मा ने कहा था—'दानव! इस सृष्टिमें कोई भी मनुष्य मृत्युसे रहित नहीं है। दैत्येन्द्र! शरीरधारीको किसी-न-किसी प्रकारसे मृत्यु प्राप्त होती ही है। ऐसा कहे जानेपर दैत्यसिंह आदिने पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा था—'पद्मसम्भव! जब मेरे रूपका परिवर्तन हो जाय तभी मेरी मृत्यु हो, अन्यथा मैं अमर बना रहूँ।' उसके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उस समय कमलयोनि ब्रह्माने प्रसन्न होकर उससे कहा था कि 'ठीक है, जब तुम्हारे रूपका दूसरा परिवर्तन होगा, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं होगी।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह महाबली दैत्यपुत्र आदि अपनेको अमर मानने लगा। उस समय उसने अपनी मृत्युके उस उपायका स्मरणकर वीरकके दृष्टिमार्गको बचानेके लिये सर्पका रूप धारण कर लिया और एक बिलमें प्रविष्ट हो गया। फिर वह परम दुर्जय दानव गणेश्वर वीरकके दृष्टिपथको बचाकर उनसे अलक्षितरूपसे भगवान् शंकरके पास पहुँच गया। तदनन्तर उस मोहित चित्तवाले महासुर आदिने शंकरजीको छलनेके लिये सर्पका रूप त्यागकर उमाका रूप धारण कर लिया। उसने मायाका आश्रय लेकर पार्वतीके ऐसे अकल्पनीय एवं मनोहर रूपका निर्माण किया था, जो सभी अवयवोंसे परिपूर्ण तथा सभी लक्षणोंसे युक्त था। फिर वह दैत्य मुखके भीतर वज्रके समान सुदृढ़ और तीखे अग्रभागवाले दाँतोंका निर्माण कर मूर्खतावश शंकरजीका वध करनेके लिये उद्यत हुआ॥ १७–२६॥
कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम्।<br>पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्बरभूषितः ॥ २७तदनन्तर वह पापी दैत्य सुन्दर रूप एवं चित्र-विचित्र आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो उमाका रूप धारण कर शंकरजीके निकट गया।
तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तदाऽऽलिङ्ग्य महासुरम्।<br>मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवान्तरैः ॥ २८उसे देखकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने उस महासुरको सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पार्वती मानते हुए उसका आलिङ्गन करके पूछा—
अपृच्छत् साधु ते भावो गिरिपुत्रि न कृत्रिमः।<br>या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनि ॥ २९<br>त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम्।<br>प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवंविधं त्वयि ॥ ३०'गिरिजे! अब तो मेरे प्रति तुम्हारा भाव उत्तम है न? बनावटी तो नहीं है? सुन्दरि! (ऐसा प्रतीत होता है कि) तुम मेरे अभिप्रायको जानकर ही यहाँ आयी हो; क्योंकि तुम्हारे बिना मैं त्रिलोकीको सूना-सा मान रहा था। अब जो तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आ गयी हो, तुम्हारे लिये ऐसा करना उचित ही है।'
* अध्याय १५६ *६५५

| इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदाभाषत् स्मयञ्शनैः।<br>न चाबुध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः॥ ३१<br><br>देव्युवाच<br>यातास्म्यहं तपश्चर्तुं वाल्लभ्याय तवातुलम्।<br>रतिश्च तत्र मे नाभूत्ततः प्राप्ता त्वदन्तिकम्॥ ३२<br><br>इत्युक्तः शङ्करः शङ्कां कांचिप्राप्यावधारयत्।<br>हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः॥ ३३<br><br>कुपिता मयि तन्वङ्गि प्रकृत्या च दृढव्रता।<br>अप्राप्तकामा सम्प्राप्ता किमेतत्संशयो मम॥ ३४<br><br>इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विधारयन्।<br>नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदङ्गे पद्मलक्षणम्॥ ३५<br><br>लोमावर्तं तु रचितं ततो देवः पिनाकधृक्।<br>अबुध्यद्दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः॥ ३६<br><br>मेढ्रे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमसूदयत्।<br>अबुध्यद्वीरको नैव दानवेन्द्रं निषूदितम्॥ ३७<br><br>हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत्॥ ३८<br><br>दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता।<br>श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना।<br>अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन विदूयता॥ ३९ | इस प्रकार कहे जानेपर दानवेन्द्र आडि मुसकराते हुए धीरे-धीरे बोला। वह त्रिपुरहन्ता शंकरजीद्वारा पार्वतीके शरीरमें लक्षित किये गये चिह्नको प्रायः नहीं जानता था॥ २७—३१॥<br><br>देवी (रूपधारी आडि)-ने कहा—'पतिदेव! आपके अतुलनीय पति-प्रेमकी प्राप्तिके अभिप्रायसे मैं तपस्या करने गयी थी, किंतु उसमें मेरा मन नहीं लगा, अतः पुनः आपके निकट लौट आयी हूँ। उसके ऐसा कहनेपर शंकरजीके मनमें कुछ शङ्का उत्पन्न हो गयी, परंतु उसे उन्होंने हृदयमें ही समाधान करके छिपा लिया। फिर वे मुसकराते हुए बोले—'सूक्ष्माङ्गि! तुम तो मुझपर कुपित होकर तपस्या करने गयी थी न? साथ ही तुम स्वभावसे ही सुदृढ़ प्रतिज्ञावाली हो, फिर बिना मनोरथ सिद्ध किये लौट आयी हो, यह क्या बात है? इससे तो मुझे संदेह हो रहा है।' ऐसा विचारकर शंकरजी पार्वतीके उस लक्षणका स्मरण करने लगे, जिसे उन्होंने पार्वतीके शरीरके बायें भागमें बालोंको घुमाकर पद्मके रूपमें बनाया था, परंतु वह उन्हें दिखायी न पड़ा।* तब पिनाकधारी महादेवने समझ लिया कि यह दानवी माया है। फिर तो उन्होंने अपने आकारको छिपाते हुए जननेन्द्रियमें वज्रास्त्रको अभिमन्त्रित करके उस दैत्यको मार डाला। इस प्रकार मारे गये दानवेन्द्र आडिकी बात वीरकको नहीं ज्ञात हुई। उधर इसके यथार्थ तत्त्वको न जाननेवाली हिमाचलकी देवता कुसुमामोदिनीने शंकरजीद्वारा स्त्रीरूपधारी दानवेश्वरको मारा गया देखकर अपने शीघ्रगामी दूत वायुद्वारा पार्वतीको इसकी सूचना भेज दी। वायुके मुखसे वह संदेश सुनकर पार्वती देवीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब वे दुःखी हृदयसे अपने पुत्र वीरकको शाप देते हुए बोलीं॥ ३२—३९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे आडिवधो नाम षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें आडिवध नामक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५६॥


* यह महा-सौभाग्यजनक चिह्न है। भगवान् विष्णु तथा अन्य भाग्यशालियोंके शरीरमें ऐसा चिह्न श्रीवत्स नामसे प्रसिद्ध है।

६५६* मत्स्यपुराण *

एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय

पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और वीरकद्वारा रोका जाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>मातरं मां परित्यज्य यस्मात् त्वं स्नेहविकलवात्।<br>विहितावसरैः स्त्रीणां शंकरस्य रहोविधौ॥ १<br>तस्मात् ते परुषा रूक्षा जडा हृदयवर्जिता।<br>गणेश क्षारसदृशी शिला माता भविष्यति॥ २<br>निमित्तमेतद् विख्यातं वीरकस्य शिलोदये।<br>सोऽभवत् प्रक्रमेणैव विचित्राख्यानसंश्रयः॥ ३<br>एवमुत्सृष्टशापाया गिरिपुत्र्यास्त्वनन्तरम्।<br>निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महाबलः॥ ४<br>स तु सिंहः करालास्यो जटाजटिलकन्धरः।<br>प्रोद्धूतलम्बलाङ्गूलो दंष्ट्रोत्कटमुखाटटः॥ ५<br>व्यावृत्तास्यो ललज्जिह्वः क्षामकुक्षिश्चिखादिषुः।<br>तस्याशु वर्तितुं देवी व्यवस्यत सती तदा॥ ६<br>ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः।<br>आजगामाश्रमपदं सम्पदामाश्रयं तदा।<br>आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा॥ ७देवीने कहा—गणेश्वर वीरक! चूँकि तुमने मुझ माताका परित्याग कर स्नेहसे विकल हो शंकरजीके एकान्तमें अन्य स्त्रियोंको प्रवेश करनेका अवसर दिया है, इसलिये अत्यन्त कठोर, स्नेहहीन, मूर्ख, हृदयरहित एवं राख-सदृशी रूखी शिला तुम्हारी माता होगी। वीरकका शिलासे उत्पन्न होनेमें यही कारण विख्यात है। आगे चलकर वही शाप क्रमशः विचित्र कथाओंका आश्रयस्थान बन गया। इस प्रकार पार्वतीके शाप दे देनेके पश्चात् क्रोध उनके मुखसे महाबली सिंहके रूपमें बाहर निकला। उस सिंहका मुख विकराल था, उसका कंधा जटाओंसे आच्छादित था, उसकी लम्बी पूँछ ऊपर उठी हुई थी, उसके मुखके दोनों किनारे भयंकर दाढ़ोंसे युक्त थे, वह मुख फैलाये हुए जीभ लपलपा रहा था, उसकी कुक्षि दुबली-पतली थी और वह किसीको खा जानेकी टोहमें था। यह देखकर पार्वतीदेवी शीघ्र ही उसपर आरूढ़ होनेकी चेष्टा करने लगीं। तब उनके मनोगत भावको जानकर भगवान् ब्रह्मा उस आश्रमस्थानपर आये जो सभी सम्पदाओंका आश्रयस्थान था। वहाँ आकर देवेश्वर ब्रह्मा गिरिजासे स्पष्ट वाणीमें बोले॥ १—७॥
ब्रह्मोवाच<br>किं पुत्रि प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते।<br>विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोऽस्मान्मदाज्ञया॥ ८<br><br>तच्छ्रुत्वोवाच गिरिजा गुरुं गौरवगर्भितम्।<br>वाक्यं वाचा विरोद्गीर्णवर्णनिर्णीतवाञ्छितम्॥ ९ब्रह्माने कहा—पुत्रि! अब तुम मेरी आज्ञा मानकर इस अत्यन्त कष्टकर तपस्यासे विरत हो जाओ। बताओ, तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो? मैं तुम्हें कौन-सी दुर्लभ वस्तु प्रदान करूँ? वह सुनकर गिरिजाने गौरवस्पद गुरुजन ब्रह्मासे अपने चिरकालसे निर्णीत मनोरथको स्पष्टाक्षरोंसे युक्त वाणीद्वारा व्यक्त करते हुए कहा॥ ८—९॥
देव्युवाच<br>तपसा दुष्करेणाप्तः पतित्वे शङ्करो मया।<br>स मां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान् भवः॥ १०<br>स्यामहं काञ्चनाकारा वाल्लभ्येन च संयुता।<br>भर्तुर्भूतपतेरङ्गेमेकतो निविशेऽङ्गवत्॥ ११देवी बोलीं—प्रभो! मैंने कठोर तपस्याके फलस्वरूप शंकरजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है, किंतु वे मुझे बहुधा 'श्यामवर्णा—काले रंगकी' कहकर अपमानित करते रहते हैं। अतः मैं चाहती हूँ कि मेरा वर्ण सुवर्ण-सा गौर हो जाय, मैं उनकी परम वल्लभा बन जाऊँ और अपने भूतनाथ पतिदेवके शरीरमें एक ओर उन्हींके अङ्गकी तरह प्रविष्ट हो जाऊँ।
* अध्याय १५७ *६५७

| तस्यास्तद् भाषितं श्रुत्वा प्रोवाच कमलासनः।<br>एवं भव त्वं भूयश्च भर्तुर्देहार्धधारिणी॥ १२<br><br>ततस्तत्याज भृङ्गाङ्गं फुल्लनीलोत्पलत्वचम्॥ १३<br><br>त्वचा सा चाभवद् दीप्ता घण्टाहस्ता त्रिलोचना।<br>नानाभरणपूर्णाङ्गी पीतकौशेयधारिणी॥ १४<br><br>तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलाम्बुजत्विषम्।<br>निशे भूधरजादेहसम्पर्कात्त्वं ममाज्ञया॥ १५<br><br>सम्प्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशा पुरा ह्यसि।<br>य एष सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद् वरानने॥ १६<br><br>स तेऽस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः।<br>गच्छ विन्ध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि॥ १७<br><br>पञ्चालो नाम यक्षोऽयं यक्षलक्षपदानुगः।<br>दत्तस्ते किङ्करो देवि मया मायाशतैर्युतः॥ १८<br><br>इत्युक्ता कौशिकी देवी विन्ध्यशैलं जगाम ह।<br>उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशान्तिकम्॥ १९ | पार्वतीके उस कथनको सुनकर कमलासन ब्रह्माने कहा—'ठीक है, तुम ऐसी ही होकर पुनः अपने पतिदेवके शरीरके अर्धभागको धारण करनेवाली हो जाओ।' ऐसा वरदान पाकर पार्वती ने अपने भ्रमर-सरीखे काले एवं खिले हुए नीले कमलके-से नीले चमड़ेको त्याग दिया। तब उनकी त्वचा उद्दीप्त हो उठी और वे तीन नेत्रोंसे भी युक्त हो गयीं। तदुपरान्त उन्होंने अपने शरीरको नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित कर पीले रंगकी रेशमी साड़ी धारण किया और हाथमें घण्टा ले लिया। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उस नीले कमलकी-सी कान्तिवाली देवीसे कहा—'निशे! तुम पहलेसे ही एकानंशा नामसे विख्यात हो और इस समय मेरी आज्ञासे पार्वतीके शरीरका सम्पर्क होनेके कारण तुम कृतकृत्य हो गयी हो। वरानने! पार्वतीदेवीके क्रोधसे जो यह सिंह प्रादुर्भूत हुआ है, वह तुम्हारा वाहन होगा और तुम्हारी ध्वजापर भी इस महाबलीका आकार विद्यमान रहेगा। अब तुम विन्ध्याचलको जाओ। वहाँ देवताओंका कार्य सिद्ध करो। देवि! जिसके पीछे एक लाख यक्ष चलते हैं, उस इस पञ्चाल नामक यक्षको मैं तुम्हें किंकरके रूपमें प्रदान कर रहा हूँ, यह सैकड़ों प्रकारकी मायाओंका ज्ञाता है।' ब्रह्माद्वारा ऐसा आदेश पाकर कौशिकी देवी विन्ध्यपर्वतकी ओर चली गयीं॥ १०—१८ १/२॥ | | प्रविशन्तीं तु तां द्वारादपकृष्य समाहितः।<br>रुरोध वीरको देवीं हेमवेत्रलताधरः॥ २०<br><br>तामुवाच च कोपेन रूपात्तु व्यभिचारिणीम्।<br>प्रयोजनं न तेऽस्तीह गच्छ यावन्न भेत्स्यसि॥ २१<br><br>देव्या रूपधरो दैत्यो देवं वञ्चयितुं त्विह।<br>प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स वै देवेन घातितः॥ २२<br><br>घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकण्ठेन कोपिना।<br>द्वारेषु नावधानं ते यस्मात् पश्यामि वै ततः॥ २३<br><br>भविष्यसि न मद्द्वाःस्थो वर्षपूगान्यनेकंशः।<br>अतस्तेऽत्र न दास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्॥ २४ | इधर उमा भी अपना मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त कर शंकरजीके पास चलीं। वहाँ द्वारपर हाथमें सोनेका डंडा धारण किये हुए वीरक सावधानीपूर्वक पहरा दे रहा था। उसने प्रवेश करती हुई पार्वतीको दरवाजेसे खींचकर रोक दिया और गौर रूपसे दूसरी स्त्री-सी प्रतीत होनेवाली उनसे क्रोधपूर्वक कहा—'तुम्हारा यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है, अतः जबतक मैं तुम्हें पीट नहीं दे रहा हूँ, उससे पहले ही भाग जाओ। यहीं महादेवजीको छलनेके लिये एक दैत्य माता पार्वतीदेवीका रूप धारण कर प्रविष्ट हो गया था, जिसे मैं देख नहीं पाया था, किंतु महादेवजीने उसे यमलोकका पथिक बना दिया, उसे मारनेके बाद नीलकण्ठ शिवजीने क्रुद्ध होकर मुझे आज्ञा दी है कि अबसे तुम द्वारपर असावधानी मत करना। तभीसे मैं अच्छी तरह सजग होकर पहरा दे रहा हूँ। द्वारपर मेरे स्थित रहते हुए तुम अनेकों वर्षसमूहोंतक प्रविष्ट न हो सकोगी, इसलिये मैं तुम्हें भवनमें प्रवेश नहीं करने दूँगा। तुम शीघ्र ही यहाँसे चली जाओ'॥ १९—२४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे वीरकशापो नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें वीरक-शाप नामक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५७॥

१६०- तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध

६५८* मत्स्यपुराण *

एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय

वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शंकरका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति

| वीरक उवाच | **वीरकने कहा—**कमललोचने! मेरी स्नेहवत्सला माता पार्वती ने भी मुझे ऐसा ही आदेश दिया है, अतः कोई भी परायी स्त्री भवनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। वीरकद्वारा ऐसा कही जानेपर पार्वतीदेवी मनमें विचार करने लगीं कि वायुने मुझे जिस स्त्रीके विषयमें सूचना दी थी, वह स्त्री नहीं थी, प्रत्युत वह कोई दैत्य था। क्रोधके वशीभूत हो मैंने व्यर्थ ही वीरकको शाप दे दिया। क्रोधसे प्रेरित हुए मूर्खलोग प्रायः इसी प्रकार अकार्य कर बैठते हैं। क्रोध करनेसे कीर्ति नष्ट हो जाती है और क्रोध सुस्थिर लक्ष्मीका भी विनाश कर देता है। इसी कारण तत्त्वार्थको निश्चितरूपसे न जानकर मैंने अपने पुत्रको ही शाप दे दिया। जिनकी बुद्धि विपरीत अर्थको ग्रहण करती है, उन्हें विपत्तियाँ मिलती हैं। ऐसा विचारकर पार्वती कमल-सी कान्तिवाले मुखसे लज्जाका नाट्य करती हुई वीरकसे इस प्रकार कहने लगीं॥ १–५॥ | | एवमुक्त्वा गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला।<br>प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने॥ १<br><br>इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा।<br>न सा नारीति दैत्योऽसौ वायुर्मे यामभाषत॥ २<br><br>वृथैव वीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया।<br>अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमीरितैः॥ ३<br><br>क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम्।<br>विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः॥ ४<br><br>संचिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा।<br>लज्जासज्जविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा॥ ५ | | | देव्युवाच | **देवी बोलीं—**वीरक! तुम अपने मनमें मेरे प्रति संदेह मत करो। मैं ही हिमाचलकी पुत्री, शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी और तुम्हारी माता हूँ। बेटा! मेरे शरीरकी अभिनव शोभाके भ्रमसे तुम शङ्का मत करो। यह गौर कान्ति मुझे ब्रह्माने प्रसन्न होकर प्रदान की है। मुझे यह दैत्यद्वारा निर्मित वृत्तान्त ज्ञात नहीं था, अतः शंकरजीके एकान्तमें स्थित रहनेपर किसी अन्य नारीका प्रवेश (तुम्हारी असावधानीसे) जानकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया है। वह शाप तो अब टाला नहीं जा सकता, किंतु उससे उद्धारका उपाय तुम्हें बतला रही हूँ। तुम मनुष्य-योनिमें जन्म लेकर वहाँ अपना मनोरथ पूरा करके शीघ्र ही मेरे पास वापस आ जाओगे॥ ६–९॥ | | अहं वीरक ते माता मा तेऽस्तु मनसो भ्रमः।<br>शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः॥ ६<br><br>मम गात्रच्छविभ्रान्त्या मा शङ्कां पुत्र भावय।<br>तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना॥ ७<br><br>मया शप्तोऽस्यविदिते वृत्तान्ते दैत्यनिर्मिते।<br>ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शङ्करे रहसि स्थिते॥ ८<br><br>न निवर्तयितुं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते।<br>शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्स त्वं कामसमन्वितः॥ ९ | | | सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर वीरक प्रसन्न मनसे उदय हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिवाली माता पार्वतीको सिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् बोला॥ १०॥ | | शिरसा तु ततो वन्द्य मातरं पूर्णमानसः।<br>उवाचोदितपूर्णेन्दुद्युतिं च हिमशैलजाम्॥ १० | |

* अध्याय १५८ *६५९

| वीरक उवाच<br>नतसुरासुरमौलिमिलन्मणि-<br>प्रचयकान्तिकरालनखाङ्किते।<br>नगसुते शरणागतवत्सले<br>तव नतोऽस्मि नतार्त्तिविनाशिनि॥ ११<br><br>तपनमण्डलमण्डितकन्धरे<br>पृथुसुवर्णसुवर्णनगद्युते।<br>विषभुजङ्गनिषङ्गविभूषिते<br>गिरिसुते भवतीमहमाश्रये॥ १२<br><br>जगति कः प्रणताभिमतं ददौ<br>झटिति सिद्धनुते भवती यथा।<br>जगति कां च न वाञ्छति शङ्करो<br>भुवनधृत्तनये भवतीं यथा॥ १३<br><br>विमलयौगविनिर्मितदुर्जय-<br>स्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले।<br>विदलितान्धकबान्धवसंहतिः<br>सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता॥ १४<br><br>सितसटापटलोद्धतकन्धरा-<br>भरमहामृगराजस्थिता।<br>विकलशक्तिमुखानलपिङ्गलायत<br>भुजौघ विपिष्टमहासुरा ॥ १५<br><br>निगदिता भुवनैरिति चण्डिका<br>जननि शुम्भनिशुम्भनिषूदनी।<br>प्रणतचिन्तितदानवदानव-<br>प्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि॥ १६<br><br>वियति वायुपथे ज्वलनोज्ज्वले-<br>ऽवनितले तव देवि च यद्वपुः।<br>तदजितेऽप्रतिमे प्रणमाम्यहं<br>भुवनभाविनि ते भववल्लभे॥ १७<br><br>जलधयो ललितोद्धतवीचयो<br>हुतवहद्युतयश्च चराचरम्।<br>फणसहस्रभृतश्च भुजङ्गमा-<br>स्त्वदभिधास्यति मय्यभयंकराः॥ १८<br><br>भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये<br>प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयम्।<br>करणजातमिहास्तु ममाचलं<br>नुतिलवाप्तिफलाशयहेतुतः ॥ १९ | वीरकने कहा—गिरिराजकुमारी! आपके चरण-नख प्रणत हुए सुरों और असुरोंके मुकुटोंमें लगी हुई मणिसमूहोंकी उत्कट कान्तिसे सुशोभित होते रहते हैं। आप शरणागतवत्सला तथा प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाली हैं। मैं आपके चरणोंमें नमस्कार कर रहा हूँ। गिरिनन्दिनि! आपके कन्धे सूर्य-मण्डलके समान चमकते हुए सुशोभित हो रहे हैं। आपकी शरीरकान्ति प्रचुर सुवर्णसे परिपूर्ण सुमेरु गिरिकी तरह है। आप विषैले सर्परूपी तरकससे विभूषित हैं, मैं आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। सिद्धोंद्वारा नमस्कार की जानेवाली देवि! आपके समान जगत्में प्रणतजनोंके अभीष्टको तुरंत प्रदान करनेवाला दूसरा कौन है? गिरिजे! इस जगत्में भगवान् शंकर आपके समान किसी अन्य स्त्रीकी इच्छा नहीं करते। आपने महेश्वर-मण्डलको निर्मल योगबलसे निर्मित अपने शरीरके तुल्य दुर्जय बना दिया है। आप मारे गये अन्धकासुरके भाई-बन्धुओंका संहार करनेवाली हैं। सुरेश्वरोंने सर्वप्रथम आपकी स्तुति की है। आप श्वेत वर्णकी जटा (केश)-समूहसे आच्छादित कंधेवाले विशालकाय सिंहरूपी रथपर आरूढ़ होती हैं। आपने चमकती हुई शक्तिके मुखसे निकलनेवाली अग्निकी कान्तिसे पीला पड़नेवाली लम्बी भुजाओंसे प्रधान-प्रधान असुरोंको पीसकर चूर्ण कर दिया है॥ ११—१५॥<br><br>जननि! त्रिभुवनके प्राणी आपको शुम्भ-निशुम्भका संहार करनेवाली चण्डिका कहते हैं। एकमात्र आप इस भूतलपर विनम्र जनोंद्वारा चिन्तना किये गये प्रधान-प्रधान दानवोंका वेगपूर्वक मर्दन करनेमें उत्साह रखनेवाली हैं। देवि! आप अजेय, अनुपम, त्रिभुवन-सुन्दरी और शिवजीकी प्राणप्रिया हैं, आपका जो शरीर आकाशमें, वायुके मार्गमें, अग्निकी भीषण ज्वालाओंमें तथा पृथ्वीतलपर भासमान है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। रुचिर एवं भीषण लहरोंसे युक्त महासागर, अग्निकी लपटें, चराचर जगत् तथा हजारों फण धारण करनेवाले बड़े-बड़े नाग—ये सभी आपका नाम लेनेवाले मेरे लिये भयंकर नहीं दीख पड़ते। अनन्य भक्तजनोंकी आश्रयभूता भगवति! मैं आपके चरणोंकी शरणमें आ पड़ा हूँ। आपके चरणोंमें प्रणत होनेसे प्राप्त हुए थोड़े-से फलके कारण मेरा इन्द्रियसमुदाय आपके चरणोंमें अटल स्थान प्राप्त करे। |

१६१- हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश

६६० * मत्स्यपुराण *

प्रशममेहि ममात्मजवत्सले <br> तव नमोऽस्तु जगत् त्रयसंश्रये। <br> त्वयि ममास्तु मतिः सततं शिवे <br> शरणगोऽस्मि नतोऽस्मि नमोऽस्तु ते॥ २०पुत्रवत्सले! मेरे लिये पूर्णरूपसे शान्त हो जाइये। त्रिलोकीकी आश्रयभूता देवि! आपको नमस्कार है। शिवे! मेरी बुद्धि निरन्तर आपके चिन्तनमें ही लगी रहे। मैं आपके शरणागत हूँ और चरणोंमें पड़ा हूँ। आपको नमस्कार है॥१६-२०॥
सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वीरकके इस प्रकार संस्तवन करनेपर पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं, तब वे अपने पति शिवजीके सुन्दर भवनमें प्रविष्ट हुईं। इधर द्वारपाल वीरकने शिवजीके दर्शनकी अभिलाषासे आये हुए देवोंको आदरपूर्वक ऐसा कहकर अपने-अपने घरोंको लौटा दिया कि ‘देवगण! इस समय मिलनेका अवसर नहीं है; क्योंकि भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीदेवीके साथ क्रीडा कर रहे हैं।’ ऐसा कहे जानेपर वे जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर देवताओंके मनमें उतावली उत्पन्न हो गयी, तब उन्होंने शंकरजीकी चेष्टाका पता लगानेके लिये अग्निको भेजा। वहाँ जाकर अग्निदेवने शुकका रूप धारण किया और गवाक्षमार्गसे भीतर प्रवेश करके देखा कि शंकरजी गिरिजाके साथ शय्यापर विराजमान हैं। उधर देवेश्वर शंकरजीकी दृष्टि शुकरूपी अग्निपर पड़ गयी, तब महादेव कुछ क्रुद्ध-से होकर अग्निसे बोले।
प्रसन्ना तु ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता। <br> प्रविवेश शुभं भर्तुर्भवनं भूधरात्मजा॥ २१ <br> द्वारस्थो वीरको देवान् हरदर्शनकाङ्क्षिणः। <br> व्यसर्जयत् स्वकान्येव गृहाण्यादरपूर्वकम्॥ २२ <br> नास्त्यत्रावसरो देवा देव्या सह वृषाकपिः। <br> निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतम्॥ २३ <br> गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः। <br> ज्वलनं चोदयामासुर्ज्ञातुं शङ्करचेष्टितम्॥ २४ <br> प्रविश्य जालरन्ध्रेण शुकरूपी हुताशनः। <br> ददृशे शयने शर्वं रतं गिरिजया सह॥ २५ <br> ददृशे तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणम्। <br> तमुवाच महादेवः किञ्चित्कोपसमन्वितः॥ २६
शर्व उवाच**शिवजीने कहा—**अग्ने! चूँकि तुमने ही यह विघ्न उपस्थित किया है, इसलिये इसका फल भी तुम्हें भोगना पड़ेगा। ऐसा कहे जानेपर अग्नि हाथ जोड़कर शंकरजीद्वारा आधान किये गये वीर्यको पी गये और उसे सभी देवताओंके शरीरमें विभक्त करके उन्हें पूर्ण कर दिया। तदनन्तर शंकरजीका वह तपाये हुए स्वर्णके समान कान्तिमान् वीर्य देवताओंका उदर फाड़कर बाहर निकल आया और शंकरजीके उस विस्तृत आश्रममें अनेकों योजनोंमें विस्तृत एवं निर्मल जलसे पूर्ण महान् सरोवरके रूपमें परिणत हो गया। उसमें स्वर्णकी-सी कान्तिवाले कमल खिले हुए थे और नाना प्रकारके पक्षी चहचहा रहे थे। तत्पश्चात् स्वर्णमय वृक्ष एवं अगाध जलसे सम्पन्न उस सरोवरके विषयमें सुनकर कुतूहलसे भरी हुई पार्वतीदेवी उस स्वर्णमय कमलसे भरे हुए सरोवरके तटपर गयीं और उसके कमलको सिरपर धारण करके जलक्रीडा करने लगीं। तत्पश्चात् पार्वतीदेवी सखीके साथ उस सरोवरके तटपर बैठ गयीं और उस सरोवरके कमलकी गन्धसे सुवासित स्वच्छ स्वादिष्ट जलको पीनेकी इच्छा करने लगीं।
यस्मात्तु त्वत्कृतो विघ्नस्तस्मात्त्वय्युपपद्यते। <br> इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्निरपिबद् वीर्यमाहितम्॥ २७ <br> तेनापूर्यंत तान् देवांस्तत्तत्कायविभेदतः। <br> विपाट्य जठरं तेषां वीर्यं माहेश्वरं ततः॥ २८ <br> निष्क्रान्तं तप्तहेमाभं वितते शङ्कराश्रमे। <br> तस्मिन् सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनम्॥ २९ <br> प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम्। <br> तच्छ्रुत्वा तु ततो देवी हेमद्रुममहाजलम्॥ ३० <br> जगाम कौतुकाविष्टा तत्सरः कनकाम्बुजम्। <br> तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा॥ ३१ <br> उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीयूता। <br> पातुकामा च तत्तोयं स्वादु निर्मलपङ्कजम्॥ ३२
* अध्याय १५८ *६६१

| अपश्यत् कृत्तिकाः स्नाताः षडर्कद्युतिसन्निभाः ।<br>पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वोपस्थिता गृहम् ॥ ३३<br><br>हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः ।<br>ततस्ता ऊचुरखिलं कृत्तिका हिमशैलजाम् ॥ ३४<br><br>कृत्तिका ऊचुः<br>दास्यामो यदि ते गर्भः सम्भूतो यो भविष्यति ।<br>सोऽस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मन्नाम्ना च वर्तताम् ।<br>भवेल्लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने ॥ ३५<br><br>इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसम्भवः ।<br>सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत् ॥ ३६<br><br>ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यामोऽस्य वै वयम् ।<br>उत्तमान्युत्तमाङ्गानि यद्येवं तु भविष्यति ॥ ३७<br><br>उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः ।<br>ततस्ता हर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः ॥ ३८<br><br>तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् ।<br>पीते तु सलिले तस्मिंस्ततस्तस्मिन् सरोवरे ॥ ३९<br><br>विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणां कुक्षिमुद्गतः ।<br>निष्चक्रामाद्भुतो बालः सर्वलोकविभासकः ॥ ४०<br><br>प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः ।<br>गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलः षडाननः ॥ ४१<br><br>दीप्तो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान् कनकच्छविः ।<br>एतस्मात् कारणाद् देवः कुमारश्चापि सोऽभवत् ॥ ४२ | इतनेमें ही उनकी दृष्टि उस सरोवरमें स्नान कर निकली हुई छहों कृत्तिकाओंपर पड़ी जो सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रही थीं तथा कमलके पत्तेके दोनेमें उस सरोवरके जलको लेकर घरकी ओर जानेके लिये उद्यत थीं। तब पार्वतींने उनसे हर्षपूर्वक कहा—'मैं कमलके पत्तेमें रखे हुए जलको देख रही हूँ।' यह सुनकर उन कृत्तिकाओंने पार्वतीसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ २७-३४॥<br><br>कृत्तिकाओंने कहा—शुभानने! यह जल हमलोग आपको दे देंगी, किंतु यदि आप यह प्रतिज्ञा करें कि इस जलके पान करनेसे जो गर्भ स्थित होगा, उससे उत्पन्न हुआ बालक हमलोगोंका भी पुत्र कहलाये और हमलोगोंके नामपर उसका नामकरण किया जाय। वह बालक सभी लोकोंमें विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने कहा—'भला जो मेरे समान सभी अङ्गोंसे युक्त होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होगा, वह आप लोगोंका पुत्र कैसे हो सकेगा?' तब कृत्तिकाओंने पार्वतीसे कहा—'यदि हमलोग इस बालकके उत्तम मस्तकोंकी रचना करेंगी तो यह वैसा हो सकता है।' उनके ऐसा कहनेपर पार्वतींने कहा—'अनिन्द्य सुन्दरियो! ऐसा ही हो।' तब हर्षसे भरी हुई कृत्तिकाओंने कमलके पत्तेमें रखे हुए उस जलको पार्वतीको समर्पित कर दिया और पार्वतींने भी उस सारे जलको क्रमशः पी लिया। उस जलके पी लेनेपर उसी सरोवरके तटपर पार्वतीदेवीकी दाहिनी कोखको फाड़कर एक अद्भुत बालक निकल पड़ा जो समस्त लोकोंको उद्भासित कर रहा था। उसकी शरीरकान्ति सूर्यके समान थी। वह स्वर्ण-सदृश प्रकाशमान तथा हाथोंमें निर्मल एवं भयावनी शक्ति और शूल धारण किये हुए था। उसके छः मुख थे। वह सुवर्णकी-सी छविसे युक्त हो उद्दीप्त हो रहा था और पापाचारी दैत्योंको मारनेके लिये उद्यत-सा दीख रहा था। इसी कारण वे देव 'कुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुए॥ ३५-४२॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने कुमारसम्भवो नामाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें कुमारसम्भव नामक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५८ ॥